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पूंजीवादी प्रणाली और राजनीतिक- सामाजिक स्वतंत्रता के बीच संबंध

पुस्तक : कैपिटलिज़्म एंड फ्रीडम

लेखक : मिल्टन फ्रीडमैन

विषय : अर्थव्यवस्था व विचार

प्रसिद्ध पूंजीवादी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम’ अर्थव्यवस्था की शास्त्रीय पूंजीवादी प्रणाली और राजनीतिक तथा सामाजिक स्वतंत्रता के बीच अनिवार्य संबंध को स्थापित करती है। इस पुस्तक की मूल स्थापना ही यही है कि आर्थिक स्वतंत्रता यानी मुक्त बाजार तथा मुक्त विनिमय प्रणाली के बिना राजनीतिक एवं सामाजिक स्वतंत्रता संभव नहीं है। इस स्थापना को सिद्ध करने के लिये फ्रीडमैन स्वतंत्रता को अलग-अलग खाँचों में रखकर देखते हैं तथा उनकी तुलना मुक्त एवं बंद आर्थिक प्रणाली के संदर्भ में करते हैं। वे बताते हैं कि आर्थिक स्वतंत्रता किस प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता को प्रभावित करती है। उनके अनुसार जब तक उत्पादन तथा बाजार पर सरकार का नियंत्रण है, व्यक्ति राजनीतिक रूप से भी अपना मत तथा असहमति व्यक्त करने के लिये स्वतंत्र नहीं हो सकता। वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सरकार द्वारा ही संचालित होगा। इस क्रम में वे मुद्रा पर नियंत्रण, विदेशी व्यापार, राजकोषीय नीतियाँ, शिक्षा में सरकार की भूमिका, पूंजीवाद और भेदभाव, सामाजिक उत्तरदायित्व, आय का वितरण, समाज कल्याण, गरीबी उन्मूलन जैसी महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं पर पूंजीवादी नजरिये से विचार करते हैं।

इस पुस्तक की भूमिका की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी के प्रसिद्ध वक्तव्य से होती है, “Ask not what your country can do for you-ask what you can do for your country.’ (यह मत पूछें कि आपका देश आपके लिये क्या कर सकता है- पूछें कि आप अपने देश के लिये क्या कर सकते हैं।) इस वक्तव्य को आधार बनाकर फ्रीडमैन व्यवस्था में सरकार के हस्तक्षेप की जमकर खबर लेते हैं। वे कहते हैं, ‘आपका देश आपके लिये क्या कर सकता है’ इस वाक्यांश में निहित है कि सरकार संरक्षक है तथा नागरिक संरक्षित, और यह स्थिति एक स्वतंत्र व्यक्ति के स्वयं पर विश्वास और कुछ कर सकने की क्षमता के विपरीत है। आगे, ‘आप अपने देश लिये क्या कर सकते हैं’ वाक्यांश से प्रतिध्वनित होता है कि सरकार स्वामी या देवता है, और नागरिक, सेवक या मतदाता। स्वतंत्र व्यक्ति के लिये देश अलग-अलग व्यक्तियों का एक समूह है जो मिलकर इसका निर्माण करते हैं, यह उन व्यक्तियों से ऊपर कोई भिन्न अस्ति नहीं है। सरकार केवल एक उपकरण है जिसके माध्यम से हम अपनी स्वतंत्रताओं को जीते हैं, इससे अधिक सरकार का महत्त्व नहीं होना चाहिये। फ्रीडमैन के अनुसार, सरकार के सारे रूप व्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण के अनुकूल नहीं हैं। और चूँकि समाजवाद में व्यक्ति पर सरकार का हस्तक्षेप अधिक-से-अधिक होता है इसलिये यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अनुकूल नहीं है। इसलिये फ्रीडमैन ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ को एक विरोधाभासी पद मानते हैं।

मुक्त समाज में सरकार की भूमिका के बारे में फ्रीडमैन कहते हैं कि सरकार की भूमिका वही करने में सीमित होनी चाहिये जो बाजार अपने लिये नहीं कर सकता, उदाहरण के लिये, जिस प्रकार एक अंपायर की भूमिका खेल के नियमों को निर्धारित करने, मध्यस्थता करने तथा लागू करने के लिये होती है। समाज में सरकारी गतिविधि का उद्देश्य अधिकतम व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षित करना है। यद्यपि फ्रीडमैन साथ में यह भी उल्लेख करते हैं कि यहाँ उनकी टिप्पणियाँ विशेष रूप से जिम्मेदार और समझदार वयस्कों तक ही सीमित हैं। बच्चों और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों की स्वतंत्रता की सीमाओं को सामान्य स्वतंत्रता की सीमाओं के रूप में नहीं गिना जाता है।

तकनीकी एकाधिकार और पड़ोस का प्रभाव

फ्रीडमैन बताते हैं कि सरकारी गतिविधि उन स्थितियों को रोकने और उनसे निपटने के लिये आवश्यक होगी जो व्यक्तियों के बीच मुक्त विनिमय को मुश्किल या असंभव बनाती हैं। वे इस प्रकार की जिन दो स्थितियों का वर्णन करते हैं, वे हैं- तकनीकी एकाधिकार और पड़ोस का प्रभाव (Technical Monopoly And Neighbourhood Effect)। एकाधिकार तब होता है जब एक व्यक्ति या संस्था का किसी वस्तु या सेवा पर पूर्ण नियंत्रण होता है। इसका अर्थ है कि ऐसी स्थिति जब व्यक्तियों को प्रदाता चुनने की कोई वास्तविक स्वतंत्रता नहीं हो। पड़ोस का प्रभाव तब होता है जब एक व्यक्ति के कार्यों से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे अन्य लोग बच नहीं सकते। फ्रीडमैन इसके लिये नदियों और झीलों के प्रदूषण का उदाहरण देते हैं। यदि कोई व्यक्ति ऊपरी नदी में कचरा फेंकता है तो अनुप्रवाह क्षेत्र (Downstream Area) के लोगों के पास इससे निपटने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। जबकि प्रदूषक दूसरों को अपने पानी के प्रदूषण के लिये क्षतिपूर्ति करने में सक्षम हो सकता है, लेकिन यह डाउनस्ट्रीम में रहने वाले लोगों के पास विकल्पों की कमी के कारण पैसे के लिये पानी की गुणवत्ता के मुक्त आदान-प्रदान के रूप में नहीं गिना जाएगा।

आगे फ्रीडमैन वित्त के नियंत्रण में सरकार की भूमिका के बारे में बात करते हैं। वे बताते हैं कि चूँकि मुक्त-बाजार अत्यंत अस्थिर होता है और इससे आर्थिक विकास की दर को निरंतर बनाए रखना मुश्किल होता है इसलिये लोग वित्त, व्यय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित मुद्दों पर सरकार को नियंत्रण देने की बात करते हैं। इस मामले में फ्रीडमैन का तर्क है कि पैसे के नियमन में सरकार का उद्देश्य केवल निजी व्यक्तियों और समूहों को मुक्त आदान-प्रदान में संलग्न होने के लिये एक स्थिर ढाँचा प्रदान करना होना चाहिये। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय और व्यापार व्यवस्था के मामले में फ्रीडमैन किसी भी प्रकार के कृत्रिम हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। वे ब्रेटन वुड्स प्रणाली के अंत और सभी मुद्रा नियंत्रणों और व्यापार बाधाओं, यहाँ तक कि ‘स्वैच्छिक’ निर्यात कोटा के अंत की बात करते हैं तथा एक अस्थायी विनिमय दर प्रणाली की वकालत करते हैं। फ्रीडमैन का कहना है कि ‘व्यापार संतुलन समस्या’ का यही एकमात्र सही समाधान है। आगे फ्रीडमैन अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय और व्यापार व्यवस्था में सोने की भूमिका पर चर्चा करते हैं क्योंकि यह पैसे के मूल्य से संबंधित है। वे सुझाव देते हैं कि अमेरिकी सरकार को अपनी वित्तीय गतिविधियों के एक निश्चित प्रतिशत का समर्थन सोने के भंडार से करना चाहिये।

राजकोषीय नीति के बारे में फ्रीडमैन का कहते हैं कि सरकारी खर्च में वृद्धि से आमतौर पर आर्थिक विकास और विस्तार नहीं होता है। फ्रीडमैन का यह तर्क उस समय प्रचलित कीन्स के आर्थिक मॉडल के विपरीत था जो द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-45) के बाद की अवधि में प्रचलित था। कीन्स का मानना था कि आर्थिक मंदी उपभोक्ता खर्च और कुल मांग के व्यावसायिक निवेश घटकों में कमी के कारण होती है। सरकारें खर्च और कर नीतियों को समायोजित करके व्यापार चक्र को स्थिर कर सकती हैं और आर्थिक उत्पादन को नियंत्रित कर सकती हैं। फ्रीडमैन इस दृष्टिकोण का खंडन करते हैं। उनके अनुसार, सरकारी खर्च में वृद्धि किसी भी समस्या को ठीक करने के लिये बहुत धीमी गति से लागू होती है। इसके अलावा, सरकारें उन समस्याओं जिनके कारण शुरुआती खर्च में वृद्धि हुई थी, के समाधान हो जाने के बावजूद आमतौर पर अपने खर्च में कमी नहीं करती हैं। फ्रीडमैन सरकारी खर्च को राजकोषीय नीति के एक अनगढ़ उपकरण के रूप में चित्रित करते हैं, जिसका शायद ही कभी उपयोग किया जाना चाहिये।

शिक्षा में सरकार की भूमिका और वाउचर प्रणाली

शिक्षा में सरकार की भूमिका के बारे में फ्रीडमैन प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा के लिये सरकारी सब्सिडी की वकालत करते हैं, परंतु वे व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) में सरकारी सब्सिडी का विरोध करते हैं। इसके पीछे वे पुनः पड़ोस के प्रभाव (Neighbourhood Effect) तथा अभिभावकीय चिंता (Paternalistic Concern) का तर्क देते हैं। वे लिखते हैं, एक स्थिर और लोकतांत्रिक समाज नागरिक के स्तर पर बिना न्यूनतम साक्षरता और ज्ञान तथा व्यापक स्तर पर बिना एकसमान मूल्यों की स्वीकृति के असंभव है। शिक्षा दोनों ही मामलों में बराबर योगदान कर सकती है। परिणामस्वरूप, बच्चे की शिक्षा से होने वाला लाभ न केवल उसे या उसके माता-पिता को प्राप्त होता है बल्कि यह समाज के अन्य सदस्यों को भी प्राप्त होता है। इसे ही ‘पड़ोसी का प्रभाव’ (Neighbourhood Effect) कहा जाता है। उनके अनुसार, यदि किसी समाज के अधिकांश लोगों को पढ़ने, लिखने और बुनियादी गणित सीखने का अवसर प्रदान नहीं किया जाता है तो इसका नकारात्मक प्रभाव सभी नागरिकों पर पड़ेगा, इसलिये इसमें सार्वजनिक सब्सिडी जरूरी है। परंतु साथ ही वे उन्नत शिक्षा (Advance Education) तथा व्यावसायिक शिक्षा में सब्सिडी का विरोध भी करते हैं। वे लिखते हैं, यदि उन्नत शिक्षा (Advance Education) तथा व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) में भी सब्सिडी जारी रहती है तो इससे शेष समाज को लाभ कम होने लगता है। इसके पीछे फ्रीडमैन का तर्क है कि उन्नत शिक्षा या व्यावसायिक शिक्षा का लाभ व्यक्तिगत रूप से शिक्षार्थी तक ही सीमित होता है तथा इसका अत्यंत कम लाभ शेष समाज को मिलता है, इसलिये इस पर सार्वजनिक सब्सिडी का कोई औचित्य नहीं है। सरकार द्वारा शिक्षा के वित्तपोषण के लिये फ्रीडमैन करों द्वारा जुटाए गए धन से वित्तपोषित सरकारी स्कूलों की बजाय, वाउचर प्रणाली अपनाने का सुझाव देते हैं। फ्रीडमैन लिखते हैं, सरकारें न्यूनतम स्तर की शिक्षा को वित्तपोषित करने के लिये अभिभावकों को एक वाउचर उपलब्ध करवा सकती हैं जो प्रति बच्चा एक निर्दिष्ट अधिकतम राशि के मूल्य का होगा और जिससे सरकार द्वारा अनुमोदित किसी भी शिक्षण संसथान में शैक्षणिक सेवाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। इससे माता-पिता अपनी स्वेच्छा और चयन द्वारा वाउचर की इस राशि को या इसमें अतिरिक्त राशि जोड़कर बच्चे के लिये अपनी पसंद की संस्था चुनने तथा शैक्षणिक सेवाएँ क्रय करने के लिये स्वतंत्र होंगे। ये शैक्षणिक सेवाएँ लाभ के लिये संचालित निजी उद्यमों द्वारा भी प्रदान की जा सकती हैं या गैर-लाभकारी संस्थानों द्वारा भी। इसके अलावा संस्थानों के स्तर पर सरकार की भूमिका केवल स्कूल के लिये कुछ न्यूनतम मानक सुनिश्चित करने तक सीमित होनी चाहिये, जैसे शिक्षण कार्यक्रमों में न्यूनतम समान (Common) विषयवस्तु को शामिल करना; केवल उतने ही स्तर पर जितना कि सरकार न्यूनतम स्वच्छता मानकों को सुनिश्चित करने के लिये रेस्तरां का निरीक्षण करती है।

पूंजीवाद और असमानता

फ्रीडमैन का मानना है कि एक मुक्त बाजार पूंजीवादी समाज त्वचा का रंग, लिंग, धर्म, सामाजिक समूह तथा विकलांगता जैसे हर प्रकार के भेदभाव को कम करता है। पूंजी की संकल्पना ही भेदभाव की शून्यता पर आधारित है। इसे साबित करने के लिये वे कई उदाहरण देते हैं। वे लिखते हैं, ‘अमेरिकी गृहयुद्ध’ के बाद दक्षिणी राज्यों ने नीग्रो समुदायों पर कानूनी प्रतिबंध लगाने के लिये कई उपाय किये। इनमें से एक उपाय जो कभी किसी पैमाने पर नहीं किया गया, वह था वास्तविक या व्यक्तिगत संपत्ति के स्वामित्व पर प्रतिबंध लगाना। इससे निजी संपत्ति में एक बुनियादी विश्वास परिलक्षित होता है, जो इतना मजबूत था कि उसने नीग्रो के खिलाफ भेदभाव करने की प्रवृत्ति को खत्म कर दिया। इसका परिणाम हुआ कि इसने नीग्रो के लिये और अधिक प्रगति का अवसर प्रदान किया। वे आगे लिखते हैं कि रोटी खरीदने वाले को नहीं पता होता है कि वह एक गोरे आदमी द्वारा उगाए गए गेहूँ से बनी है या एक नीग्रो द्वारा, एक ईसाई द्वारा उगाए गए गेहूँ से या एक यहूदी द्वारा। इसका परिणाम यह होता है कि गेहूँ का उत्पादनकर्त्ता अपने संसाधनों का प्रभावी उपयोग करने की स्थिति में होता है, उसे इस बात से अंतर नहीं पड़ता कि उसके यहाँ काम करने वाले का रंग, धर्म या चरित्र क्या है।

आगे फ्रीडमैन आय के वितरण पर बात करते हैं और आय समानता को लेकर उठाई जा रही कृत्रिम सरकारी पहलों पर अपना मतभेद व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार, वास्तविक अर्जित आय में असमानता मुक्त बाजार के विनिमय की एक आवश्यक विशेषता है, और इस प्रकार की आय असमानता समग्र रूप में कहीं अधिक समानता और स्वतंत्रता को बढ़ावा देती है। आय समानता क्या है और यह सामान्य समानता से कैसे संबंधित है, इस बारे में गलतफहमी के कारण आय पुनर्वितरण के प्रयास अप्रभावी होते हैं। विभिन्न नौकरियों की जटिलता और आकर्षण के अनुसार वास्तविक आय अनिवार्य रूप से भिन्न होती है। यदि किसी व्यक्ति के लिये कोई कार्य कठिन और अनाकर्षक दोनों है, तो वे इसे करने के लिये उच्च वेतन या अधिक लाभों की मांग करेंगे। इसलिये, मजदूरी को नियंत्रित करना व्यक्तियों को उनकी सेवाओं को उस दर पर बेचने से रोकता है जो वे उसके लिये उचित समझते हैं।

आय पुनर्वितरण के एक प्रमुख उपकरण के रूप में फ्रीडमैन कराधान प्रणाली में आमूल बदलाव की बात करते हैं। उनका दावा है कि यह गणितीय आधार पर प्रदर्शित किया जा सकता है कि संयुक्त राज्य में प्रगतिशील कर प्रणाली (Progressive Tax/Graduated-rate tax System) द्वारा एकत्रित कर की राशि एक समान दर कर प्रणाली (Flat-Rate Tax System) द्वारा एकत्र की जाने वाली राशि से कम है। इसके अतिरिक्त, वे यू-एस- टैक्स कोड में उन सभी खामियों और अपवादों को चिह्नित करते हैं जिसका फायदा उठाकर लोग अपने आय स्तर से कम आयकर का भुगतान करते हैं जिससे प्रगतिशील कर प्रणाली अप्रभावी हो जाती है तथा इससे कराधान से बचने के तरीके खोजने के लिये उपयोग किये जाने वाले समय और संसाधनों की बर्बादी भी होती है। ध्यातव्य है कि प्रगतिशील कर दर प्रणाली से तात्पर्य ऐसी कर प्रणाली से है जहाँ आय के आधार पर कर की दरों में अंतर होता है तथा अधिक आय पर अधिक कर दर का प्रावधान होता है; जबकि एक समान कर दर प्रणाली ऐसी कर प्रणाली है जिसमें सभी आय वर्ग के लोगों के लिये एक समान कर की दर का प्रावधान होता है। फ्रीडमैन प्रगतिशील कर प्रणाली की बजाय एक समान कर दर प्रणाली को अपनाने की वकालत करते हैं तथा इसे कराधान से संबंधित सभी खामियों और अपवादों को खत्म करने का एकमात्र उपाय बताते हैं। इसके अतिरिक्त फ्रीडमैन कराधान पर आधारित विभिन्न प्रकार के सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों की बात करते हैं तथा इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समाज कल्याण के उपाय, जैसे- सार्वजनिक आवास, न्यूनतम मजदूरी कानून, कृषि मूल्य समर्थन और सामाजिक सुरक्षा आदि अपने उद्देश्यों को पाने में असफल तो हैं ही बल्कि वे अपने लक्ष्यों के विपरीत परिणाम भी प्राप्त कर सकते हैं। इस क्रम में वे एक-एक कर सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों की चर्चा करते हैं तथा उनसे संबंधित समस्याओं को भी चिह्नित करते हैं। सार्वजनिक आवास कार्यक्रम के बारे में वे लिखते हैं कि सार्वजनिक आवास को किसी भी प्रकार से ‘पड़ोस के प्रभाव’ से उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसका केवल एक उद्देश्य समझ आता है और वह है लोगों को आवास देकर उनके साथ एक अभिभावकीय रवैये को स्थापित करना। उन्हें जताना कि इन परिवारों को किसी भी अन्य चीज से अधिक आवास की आवश्यकता है, भले ही वे इस बात पर सहमत नहीं हों। वे आगे लिखते हैं कि सार्वजनिक आवासों के निर्माण के क्रम में जितने आवासों का निर्माण किया जाता है उससे कहीं अधिक आवासों को तोड़ दिया जाता है। सार्वजनिक आवास से घरों में रहने वाले लोगों की संख्या पर कोई अंतर नहीं पड़ता। इससे केवल एक आवास इकाई में रहने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। वे लोगों को सार्वजनिक आवास उपलब्ध कराने की बजाय उन्हें नकद पैसे देने पर अधिक जोर देते हैं ताकि लोगों के पास चयन की स्वतंत्रता हो और वे अगर उस पैसे का उपयोग आवास खरीदने में न करना चाहें तो उन पर कर दे सकें।

आगे वे न्यूनतम-मजदूरी कानून के बारे में बताते हैं कि ये कानून बेरोजगारी को बढ़ाते हैं और इसलिये हर नौकरी चाहने वाले को एक अच्छा जीवन सुनिश्चित करने में असफल होते हैं। इसी तरह कृषि समर्थन मूल्य के बारे में फ्रीडमैन का मत है कि यह सभी उपभोक्ताओं के लिये भोजन की कीमतें बढ़ाता है लेकिन औसत किसान की कुल आय में वृद्धि नहीं करता है। फ्रीडमैन का निष्कर्ष है कि चूँकि ये सभी कार्यक्रम, सामान्य आबादी द्वारा भुगतान किये जाने वाले करों द्वारा वित्तपोषित हैं, इसलिये ये व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार अपनी आय का उपयोग करने से रोकते हैं। वृद्धावस्था और उत्तरजीवी बीमा (OASI) पर फ्रीडमैन का तर्क है कि सामाजिक सुरक्षा के वे सारे वांछित प्रभाव सभी को सरकार द्वारा प्रबंधित सामाजिक सुरक्षा खरीदने की आवश्यकता के बिना प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके अलावा, सभी नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा खरीदने के लिये बाध्य करने की कानूनी आवश्यकता राज्य की एक अभिभावकीय प्रवृत्ति है जो यह मानती है कि आमतौर पर लोग बुढ़ापे के लिये पर्याप्त बचत करने में असफल रहेंगे, भले ही उनके पास इसके लिये अवसर हो और इसलिये उन्हें ऐसा करने के लिये मजबूर होना चाहिये। फ्रीडमैन शिकायत करते हैं कि भले ही राष्ट्रीयकृत सामाजिक सुरक्षा वांछित प्रभावों को प्राप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका हो, जो कि यह नहीं है, लेकिन तर्कसंगत रूप से वयस्क नागरिकों पर लागू कोई भी अभिभावकीय नीति व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्त्व देने वाली उदारवादी व्यवस्था के लिये अस्वीकार्य है। और सबसे अंत में फ्रीडमैन गरीबी उन्मूलन के प्रचलित सिद्धांतों तथा उसके उपायों पर बात करते हैं।

फ्रीडमैन बताते हैं कि गरीबी को कम करने के लिये सभी को अपना योगदान देने की आवश्यकता है और इसमें सरकारी उपाय भी शामिल हैं। सरकारी सहायता के रूप में फ्रीडमैन सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों की बजाय एक ‘नकारात्मक कर प्रणाली’ की बात करते हैं। नकारात्मक कर प्रणाली से तात्पर्य ऐसी कर प्रणाली से है जिसमें एक निश्चित आय से नीचे के लोगों को नकारात्मक कर देना होगा, यानी सरकार द्वारा उनकी आय के आधार पर उन्हें नियत दर से कर राशि प्रदान की जाएगी। सामान्य शब्दों में समझें तो यह एक प्रकार का प्रत्यक्ष नकद भुगतान होगा जिसके बारे में फ्रीडमैन पीछे बात करते आए हैं। फ्रीडमैन का मुख्य जोर इस बात पर है कि इससे व्यक्ति के पास चयन का अधिकार सुरक्षित रहेगा और वे प्रदत्त राशि का अपने विवेक के अनुसार प्रयोग कर सकेंगे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि इससे राज्य नागरिक के प्रति अभिभावकीय रवैया नहीं अपना सकेगा, और व्यक्ति एवं राज्य के बीच का संबंध संरक्षक तथा संरक्षित का न होकर एक दूसरे के पूरक के रूप में होगा, जो एक उदारवादी व्यवस्था का मूल है।

पुरुषोत्तम प्रतीक'

(लेखक ‘दृष्टि करेंट अफेयर्स टुडे’ के कार्यकारी संपादक हैं)

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