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दृष्टि आईएएस ब्लॉग

कर्मक्षेत्र का द्वंद्व और जीवन की राह

जीवन की सतत गतिशीलता के बीच हम यह सोचना भूल जाते हैं कि हमारा प्रवाह किस दिशा में हो रहा है और इस प्रावहशीलता के क्या मायने हैं। क्या जीवन हमें जी रहा है या हम जीवन को जी रहे हैं? क्या जिंदगी हमारे मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों के सहारे आगे बढ़ रही है या फिर बस यूँ ही क्षणिक आवेग हमें संचालित कर रहे हैं? और जब हम इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने लगते हैं तभी हम अपने बाह्य जगत से अंतर्जगत की तरफ मुड़ते हैं और यहीं से शुरुआत होती है अंतर्द्वंद्व की। द्वंद्व हमारे सैद्धांतिक और व्यावहारिक जीवन के बीच; द्वंद्व हमारी इच्छाओं, आकांक्षाओं, सामाजिक मान्यताओं और रूढ़ियों के बीच; द्वंद्व हमारी तात्कालिक और वास्तविक इच्छाओं के बीच। यह क्रम निरंतर चलता ही रहता है। मन अपने तर्क गढ़ता है तथा हृदय अपनी आवाज को बुलंद करता है।

कई बार हम पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, कर्म-कुकर्म, करणीय-अकरणीय के चक्कर में फँसकर निष्क्रिय से हो जाते हैं और यही निष्क्रियता अकर्मण्यता को जन्म देती है। पर सच तो यही है कि व्यक्ति जब इतना विचार करेगा, कर्म-विपाक में पड़ेगा तो वह कोई भी काम नहीं कर पाएगा। तो क्या विचार करना ही छोड़ दिया जाए या फिर बिना विचारे कर्म किया जाए? ऐसी परिस्थिति में तो मनुष्य की विवेकशीलता, संवेदनशीलता और तमाम बौद्धिक तथा आत्मिक योग्यताओं पर प्रश्न चिह्न लग जाएगा। तो फिर, किया क्या जाए? क्या उद्यमशीलता को छोड़ दिया जाए और पाप-पुण्य पर विचार किया जाए? अगर हम पाप और पुण्य पर विचार करें, अच्छे और बुरे पर नजर डालें तो हमें लगता है कि हर अच्छा, कहीं-न-कहीं बुरा होता है और हर बुराई हमेशा बुरी नहीं होती।

इस दृश्यमान जगत् की सारी चीजें दोहरी प्रकृति के साथ जीवित हैं और इसी प्रकृति का विश्लेषण हमें अपने विवेक से करना होता है। पुनः प्रश्न उठता है कि विवेक क्या है? तो जो नीर-क्षीर विभाजक है वही विवेक है अर्थात अच्छे-बुरे का विभेदक। इस प्रकार, हम पुनः अच्छे और बुरे पर आ जाते हैं। तमाम विचारकों की बातों का अगर मनन किया जाए तो हमें पता चलेगा कि हम किस चक्कर में पड़ गए हैं! अच्छा होना, किसकी नजर में, समाज की नजर में! और यह समाज जब स्वयं अच्छा नहीं है तो क्यों हम समाज का बोझ लेकर जीएँ। वास्तव में बात समाज की भी नहीं है, बात खुद की है क्योंकि कई बार समाज में रहकर भी व्यक्ति अकेलापन और अपराधबोध महसूस करता है और कई बार अकेले में ही जीवन को जीवंतता से जीता है। तो कौन-सी राह पकड़ें; कैसे जीवन-यापन करें - कुछ समझ में नहीं आता। वास्तव में यही नासमझी तो द्वंद्व है और यही द्वंद्व तो जीवन है। जीवन में द्वंद्व, हताशा, निराशा, उत्साह, आवेग - ये सभी न हों तो जीवन कितना शुष्क और नीरस लगेगा! किंतु जीवन जीने का सूत्र भी यही है कि द्वेष-द्वंद्व आदि निराशाजन्य भावनाओं में रहकर भी उन्हें अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिये। जीवन कितना अस्थायी और क्षणभंगुर है- यह हम सब जानते हैं परंतु सच तो यह है कि हम इसकी शाश्वतता के प्रति मोह भी नहीं छोड़ पाते।

इच्छा ही तो जीवन है और इच्छाओं की पूर्ति हेतु ही तो सारे उद्यम संपन्न किये जाते हैं। सृजन से लेकर विसर्जन तक की सारी प्रक्रियाएँ इच्छा के कारण हैं; सारी सृष्टि- जड़ और चेतन इच्छामय है और इस इच्छा का दमन सृष्टि की नियमावली के विरुद्ध है। अतः इच्छाओं की पूर्ति हेतु उद्यम करें परंतु पुनः प्रश्न उठेगा अच्छा और बुरा का, तो इसके विश्लेषण में न पड़ा जाए अपितु कर्म किया जाए और इसके लिये गीता में निरासक्त कर्म का विवरण भी है परंतु यह निरासक्ति बड़ी मुश्किल है और इसकी प्राप्ति भावनाओं के नियमन से ही हो सकती है क्योंकि भावनाओं का नियंत्रण और दमन अत्यंत खतरनाक और प्राणघातक भी हो सकता है।

कर्म करने का सबसे बेहतर तरीका है कि उसे प्रभु के चरणों में अर्पित कर दें - जो भी किया मैंने नहीं किया, आपने किया है, और इसलिये हे ईश्वर, मैं जो भी करूँ अच्छा करूँ - ऐसी बुद्धि और शक्ति दें। पुनः ‘अच्छा’ शब्द विभ्रमकारी है। अच्छा से सीधा अर्थ है आपके हृदय की प्रफुल्लता, खुशी और संतुष्टि। समर्पण, प्रभु के चरणों में समर्पण! यह कैसी बात है? और जो प्रभु के अस्तित्व में ही विश्वास नहीं करता वह क्या करे? कहाँ जाए? सवाल तो अत्यन्त ही जायज है और इसका जवाब है कि जो किसी भी साकार अथवा निराकार शक्ति में विश्वास नहीं रखता निश्चित रूप से वह ‘स्वयं प्रभु’ है, अतः अपने सारे कार्य वह स्वयं विश्लेषित करे। अगर कोई कार्य होगा तो परिणाम भी अवश्य आएगा और कार्य तथा परिणाम दोनों के लिये वह स्वयं उत्तरदायी होगा।

आजकल एक प्रश्न अनपढ़ से लेकर पढ़े-लिखे लोगों के मन में भी अनवरत घूम रहा है - जो कुमार्ग पर चल रहे हैं और बुरा आचरण कर रहे हैं वे ही फलित हो रहे हैं, तो हम अच्छा आचरण क्यों करें? निश्चित रूप से यह प्रश्न हमारे अंतर्मन पर गहरा चोट करता है और हमें गंभीरतापूर्वक सोचने पर विवश करता है। इसी प्रश्न को युद्धिष्ठिर ने एक बार लोमस ऋषि से पूछा था तो उन्होंने जवाब दिया कि बुरे कर्म करने वाले अपने पूर्व जन्म के संचित पुण्यों के आधार पर उन्नत दिखते हैं परन्तु जैसे ही उनका यह संचित कर्म समाप्त होता है उन्हें नाश को प्राप्त होना पड़ता है। फिर एक प्रश्न उठता है कि जो लोग पुनर्जन्म में विश्वास ही नहीं करते और जिनके लिये यह भौतिक लोक ही सत्य है तो वे क्या करेंगे? निश्चित रूप से वे अपने इहलोक को सुखद बनाने के लिये अपने स्वार्थवश हर प्रकार के कार्य करेंगे। अब प्रश्न यह भी उठता है कि हम तथाकथित अच्छे कर्म जो केवल समाज की दृष्टि में ही अच्छे हैं- क्यों करें, हम क्यों न अपने मन की करें? इसका उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता है कि हमें अपने मन की करने की पूरी स्वतंत्रता है, निश्चय ही हमें उन सभी कार्यों को करना चाहिये जो हमारी अंतरात्मा कहे।

यहाँ आते-आते आप सोच रहे होंगे कि प्रश्नों के इस मायाजाल में समाधान की दिशा क्या हो? तो इसके उत्तर में यही कि द्वंद्व से रहित जीवन संभव नहीं है इसलिये प्रवृत्ति और निवृत्ति के मध्य में चलते हुए संतुलित जीवन क्षेत्र का चुनाव किया जाना चाहिये। व्यक्तिगत स्वतंत्रता व सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन और आदर्श व व्यावहारिकता के समन्वय से क्रमशः जीवन द्वंद्व को साधा जा सकता है।

विवेक विशाल

(लेखक इतिहास के व्याख्याता हैं)

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