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श्रीलंका संकट : बदहाल स्थिति की पड़ताल

श्रीलंका में चल रहे आर्थिक संकट के बीच लोग अब देश छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं। अब तक सैकड़ों लोग देश छोड़कर जा चुके हैं और दूसरे देशों में पनाह लिए हुए हैं। श्रीलंका संकट से भारत भी लगातार प्रभावित हो रहा है। 2.2 करोड़ आबादी का देश श्रीलंका एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, जहाँ लाखों लोग भोजन, दवा, ईंधन और अन्य आवश्यक आधारभूत जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। श्रीलंका के 44 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब संसद ने प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति का चुनाव किया। रानिल विक्रमसिंघे 8वें राष्ट्रपति के रूप में चुने गए हैं। राजनीतिक स्थिरता प्राप्त होने के बाद पूर्व बदहाल आपातकालीन स्थिति में अब कुछ सकारात्मक परिवर्तन हो रहा है। स्कूल-कॉलेज खुल रहे हैं तथा आम जनजीवन सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहा है। लेकिन अतीत के कारणों और भविष्य की चुनौतियों का विश्लेषण करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि सब कुछ सामान्य होना इतना भी आसान नहीं। वर्तमान में श्रीलंका पर कुल विदेशी कर्ज 51 अरब अमेरिकी डॉलर है। जो कि गंभीर चिंता का विषय है। श्रीलंका की यह स्थिति न सिर्फ आंतरिक राजनीति को प्रभावित करेगी बल्कि इससे समूचा दक्षिण एशिया भी प्रभावित होगा। दक्षिण एशिया सामरिक और आर्थिक रूप से वैश्विक राजनीति का एक महत्वपूर्ण भाग है। दक्षिण एशिया में भारत और चीन जैसी दो बड़ी आर्थिक और राजनीतिक महाशक्तियां हैं। ऐसी स्थिति में अगर दक्षिण एशिया किसी भी प्रकार की अस्थिरता की ओर बढ़ता है तो इसके क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर गंभीर परिणाम होंगे।

श्रीलंका का आर्थिक संकट सिर्फ कुछ दिनों का ही परिणाम नहीं है। श्रीलंका के संकट को अतीत की पृष्ठभूमि में खोजा जा सकता है। श्रीलंका के संकट का सिर्फ एक ही आयाम भी नहीं है। श्रीलंका के वर्तमान भयावह संकट को समझने के लिए इसके इतिहास, भौगोलिक स्थिति, राजव्यवस्था की प्रकृति और व्यवहार को समझना बहुत आवश्यक है। श्रीलंका संकट के कारणों को वैश्विक परिस्थितियों में भी खोजा जा सकता है।

वर्तमान श्रीलंका संकट के कारण-

श्रीलंका की मौजूदा स्थिति देखकर किसी को भी हैरत हो सकती है कि अचानक से इतना बड़ा संकट कैसे आया। नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस द्वीपीय देश में अपेक्षाकृत राजनीतिक स्थायित्व रहा है। लंबे समय तक गृहयुद्ध की चपेट में रहने के बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था अपनी श्रेणी के तमाम देशों से बेहतर प्रदर्शन करती रही। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में भी श्रीलंका का प्रदर्शन बेहतर रहा है। तब एकाएक ऐसा क्या हुआ कि श्रीलंका कंगाली के कगार पर पहुंच गया? इसकी जाँच करें तो यही निकलेगा कि यह सब अचानक या एक दिन का परिणाम नहीं है। इसमें कुछ भूमिका तो कोविड महामारी की रही, जिस पर श्रीलंका या किसी और देश का कोई नियंत्रण नहीं था। इसके अलावा अपनी दयनीय स्थिति के लिए एक बड़ी हद तक श्रीलंका स्वयं भी जिम्मेदार है, जिसने अतार्किक नीतियां अपनाकर स्वयं को इस स्थिति में पहुंचा दिया।

राजनीतिक कारण

गोटबाया राजपक्षे के राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद से ही श्रीलंका में आर्थिक संकट की शुरुआत हुई। गोटबाया ने राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद अपने छोटे भाई महिंद्रा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाया और एक अन्य भाई वासिल राजपक्षे को वित्तमंत्री तथा अपने परिवार के अन्य सदस्यों को भी महत्वपूर्ण पदों पर स्थापित कर दिया। देश के शीर्ष पदों पर राजपक्षे परिवार के लोग काबिज हो गए और इनके द्वारा अतार्किक तथा मनमाने फैसले लिए गए। राष्ट्रपति चुनाव से पूर्व गोटबाया ने तमाम लोकलुभावन वादे किए और जीतने के लिए अन्य हथकंडे भी अपनाएं और चुने जाने के पश्चात करो में भारी कटौती कर दी जिससे सरकारी खजाना तेजी से खाली होने लगा। जीएसटी की दर 15 प्रतिशत से घटाकर 8 प्रतिशत और 2 प्रतिशत का नेशन बिल्डिंग टैक्स भी समाप्त कर दिया गया। राजपक्षे परिवार के पास किसी स्पष्ट कार्ययोजना का अभाव था। कमजोर विपक्ष की वजह से राजपक्षे परिवार की निरंकुशता बढ़ती गई। राजपक्षे परिवार ने किसी भी फैसले के लिए विशेषज्ञों की राय नहीं ली और न ही मंत्रिमंडल में खुलकर चर्चा को बढ़ावा दिया। गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए जब विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से संपर्क करने का सुझाव दिया तो सरकार ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसे विदेशी सलाह की जरूरत नहीं है। सरकारी भुगतान करने, महंगाई पर काबू करने के लिए नए नोटों की छपाई लगातार जारी रही जिससे 2 साल में मुद्रा की आपूर्ति में 42 प्रतिशत की वृद्धि हो गई। राजपक्षे परिवार की मजबूत स्थिति की वजह से भले ही शुरुआती विरोध नहीं हुआ लेकिन इनकी निरंकुशता के खिलाफ विपक्षी दल और आमजन में एक सामूहिक रोष इकट्ठा होता चला गया। जो संकटकाल में आक्रामक तरीके से अभिव्यक्त हुआ। सार्वजनिक रूप से अपने गलत फैसलों की स्वीकारोक्ति और नए मंत्रिमंडल के गठन के बाद भी श्रीलंका की जनता में सरकार के प्रति गुस्सा बरकरार है।

आर्थिक कारण-

वर्ष 2019 में ही एशियन डेवलपमेंट बैंक ने श्रीलंका को आगाह किया था कि उसका राष्ट्रीय खर्च उसकी राष्ट्रीय आमदनी से ज्यादा होता जा रहा है जिससे देश ‛एक घाटे वाली अर्थव्यवस्था’ में तब्दील हो जाएगा। यदि हम श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के स्वरूप को देखें तो यह मुख्य रूप से निर्यात, पर्यटन और प्रवासी कामगारों द्वारा प्रेषित धन पर आधारित है।

श्रीलंका की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रही है और यह आर्थिक संकट की एक बड़ी वजह है। ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर इकोनॉमिक कॉरपोरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के मुताबिक श्रीलंका ने 2020 में 1.2 अरब डॉलर मूल्य का पेट्रोलियम आयात किया था। श्रीलंका कपड़ों, दवाइयों के लिए कच्चा सामान और गेहूं से लेकर चीनी तक सबकुछ आयात करता है। 2020 में श्रीलंका ने 21.4 करोड़ डॉलर की कारों का आयात किया था। जबकि 30.5 करोड़ डॉलर के टेट्रा पैक दूध का आयात किया गया था। श्रीलंका ज़्यादातर सामान चीन और भारत से मंगाता है। अब न्यूनतम विदेशी मुद्रा भंडार की वजह से आयात करने में मुश्किल हो रही है जिससे घरेलू आधारभूत जरूरत की वस्तुएं महंगी होती जा रही हैं। 2018 में विदेशी मुद्रा भंडार 6.9 बिलियन डालर था जोकि 2022 में घटकर 2.2 बिलियन डालर हो गया है। व्यापार घाटा बढ़ने के चलते श्रीलंकाई रुपया डॉलर के मुक़ाबले लगातार कमजोर हो रहा है। 2022 के मार्च माह में मुद्रास्फीति की दर 25 प्रतिशत हो गई। यदि हम उदाहरण रूप में देखें तो भारत का ₹1 श्रीलंका के लगभग ₹4 के बराबर होता है। संकट के इस दौर में यदि देखा जाए तो 1 किलो चीनी या चावल का दाम वहां पर लगभग ₹290 है। गेहूँ 200 रुपये प्रति किलोग्राम, सब्जियों के दाम तो आसमान छू रहे हैं। कुछ रेस्टोरेंट्स में तो एक कप चाय की कीमत ₹100 तक पहुँच गई है। ऊर्जा संकट इतना बढ़ गया है कि श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री ने स्ट्रीट लाइट को बंद करने के निर्देश दिए। कुकिंग गैस के दाम में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। वहां एक सिलेंडर का मूल्य लगभग 4200 श्रीलंकन रुपया हो गया है। पत्रकारिता जगत पर भी इस संकट का असर पड़ा है। मुद्रण के लिए जरूरी संसाधनों की अनुलब्धता की वजह से समाचार पत्रों की छपाई में कठिनाई आ रही है। आज कालाबाजारी ने श्रीलंका के आर्थिक संकट को और बढ़ा दिया है। आयात और पर्यटन के स्तर पर रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी श्रीलंका संकट को प्रभावित किया है।

श्रीलंका के पर्यटन क्षेत्र का बाधित या बर्बाद होना भी इसके आर्थिक संकट का एक बड़ा कारण है। 2018 में श्रीलंका दुनियाभर के पर्यटन का सबसे लोकप्रिय स्थल था। लाखों की संख्या में विदेशी पर्यटक यहां पर आते थे। 2018 में रिकॉर्ड स्तर पर पर्यटक यहां आए। यदि आंकड़ों की बात करें तो 2018 में 2.3 मिलियन लोग श्रीलंका घूमने आए। श्रीलंका की जीडीपी का लगभग 12-13 प्रतिशत हिस्सा पर्यटन से जुड़ा हुआ है। ईस्टर बम धमाकों और कोरोना महामारी ने श्रीलंका के पर्यटन उद्योग को बर्बाद कर दिया।

अप्रैल 2019 में देशभर में सिलसिलेवार बम धमाके हुए। इन्हें ईस्टर बम धमाका कहा जाता है। अलग-अलग शहरों में तीन चर्च और तीन होटलों को निशाना बनाकर बम धमाके किए गए। इन बम धमाकों में कुल 269 लोग मारे गए जिसमें से 45 लोग विदेशी थे। इन बम धमाकों ने श्रीलंका के पर्यटन को बहुत नुकसान पहुंचाया। इन बम धमाकों का जिम्मेदार एक क्षेत्रीय इस्लामी आतंकवादी ग्रुप था। इन बम धमाकों की वजह से बड़े स्तर पर एंटी मुस्लिम हिंसा हुई। बहुत से मुसलमानों के घरों, दुकानों और गाड़ियों पर हमला किया गया। इन वजहों से धार्मिक तनाव लगातार बढ़ता गया और आंतरिक अस्थिरता का माहौल बरकरार रहा।

मार्च 2020 में आयी कोविड-19 महामारी श्रीलंका की वर्तमान संकट का एक बड़ा कारण बनी। महामारी की वजह से दुनिया भर का पर्यटन बंद हो गया और श्रीलंका इससे व्यापक रूप से प्रभावित हुआ। कोविड-19 की वजह से श्रीलंका का पर्यटन क्षेत्र लगभग खत्म सा हो गया जोकि जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा था। कोविड-19 महामारी के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र पर दबाव बढ़ता गया इस वजह से भी विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आई। महामारी ने चाय, रबर, मसालों और कपड़ों के निर्यात को भी नुकसान पहुँचाया।

कर दरों में कटौती भी श्रीलंका के आर्थिक संकट का एक बड़ा कारण है। गोटबाया राजपक्षे कर दरों में कटौती के वादे के साथ सत्ता में आए। राजपक्षे का वादा था कि वह वैट(वैल्यू एडेड टैक्स) को आधा करेंगे। श्रीलंका में 15 प्रतिशत वैट लगता था। उन्होंने कर दरों में कटौती की इसके पीछे वजह बताई गई की कर दरों में कटौती के बाद लोग खर्च करेंगे जिससे अर्थव्यवस्था मजबूत होगी लेकिन यह तर्क उल्टा पड़ गया। सही समय और सही योजना ना होने की वजह से यह श्रीलंका के आर्थिक संकट का कारण बना। श्रीलंका ने कर दरों में कटौती 1 दिसंबर 2019 को की और इसके 3 महीने बाद कोविड-19 महामारी का दौर आया और लॉकडाउन की स्थिति में यह अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हुआ। सरकार का राजस्व घाटा लगातार बढ़ता गया और श्रीलंका सरकार पर कर्ज का दबाव बढ़ता गया।

गोटबाया राजपक्षे का कृषि क्षेत्र में सुधार का निर्णय भी श्रीलंका के आर्थिक संकट का बड़ा कारण बना। शुरुआत में उन्होंने कहा कि अगले 10 वर्ष में वह श्रीलंका की खेती को पूरी तरह ऑर्गेनिक खेती के रूप में तब्दील कर देंगे। लेकिन एक दिन अचानक से फैसला लेकर पूरे देश में उर्वरक और कीटनाशक पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। इस फैसले की वजह उर्वरकों के आयात या निर्भरता को खत्म करना था। ऑर्गेनिक खेती के इस फैसले की वजह से उत्पादन में तेजी से गिरावट आई। श्रीलंका अपनी घरेलू आवश्यकता भर का चावल उत्पादन कर लेता था लेकिन इस फैसले की वजह से श्रीलंका को चावल भी आयात करना पड़ा। चाय उत्पादन में भी श्रीलंका की अच्छी स्थिति थी। यहां तक कि श्रीलंका चाय का निर्यात करता था। चाय का निर्यात सरकार के लिए विदेशी मुद्रा का एक महत्वपूर्ण स्रोत था लेकिन इस फैसले की वजह से चाय की खेती भी प्रभावित हुई।

ऑर्गेनिक खेती का फैसला निश्चित रूप से दूरगामी है लेकिन बिना किसी सुनियोजित रणनीति के अचानक से इसे लागू करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हुआ। ऑर्गेनिक खेती का फैसला चरणबद्ध तरीके से लिया जाता है यदि हम भारत में सिक्किम का उदाहरण लें तो आज यह राज्य 100 प्रतिशत ऑर्गेनिक खेती करने वाला राज्य है लेकिन इसके लिए 2003 से ही प्रयास शुरू किए गए और 2016 में सिक्किम पूर्ण रूप से ऑर्गेनिक खेती करने वाला राज्य बना। चरणबद्ध तरीके से लिया गया सिक्किम का ऑर्गेनिक खेती का फैसला ना सिर्फ अन्य क्षेत्रों के लिए उदाहरण बना बल्कि इसने पर्यटन को भी बढ़ावा दिया लेकिन इसकी मूल वजह एक सुनियोजित रणनीति थी जो कि श्रीलंका ने नहीं अपनाया।

विदेशी कर्ज श्रीलंका के आर्थिक संकट का एक बड़ा कारण है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार द्वारा लिया गया कर्ज देश के लिए एक बड़ी समस्या है। वर्ष 2009 में श्रीलंका जब 26 वर्षों से जारी गृहयुद्ध से उभरा तो युद्ध के बाद की उसकी जीडीपी वृद्धि वर्ष 2012 तक प्रति वर्ष 8-9% के उपयुक्त उच्च स्तर पर बनी रही थी। लेकिन वैश्विक कमोडिटी मूल्यों में गिरावट, निर्यात की मंदी और आयात में वृद्धि के साथ वर्ष 2013 के बाद उसकी औसत जीडीपी विकास दर घटकर लगभग आधी रह गई। गृहयुद्ध के दौरान श्रीलंका का बजट घाटा बहुत अधिक था और वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने उसके विदेशी मुद्रा भंडार को लगभग समाप्त कर दिया था, जिसके कारण देश को वर्ष 2009 में IMF से 2.6 बिलियन डॉलर का ऋण लेने के लिये विवश होना पड़ा था। वर्ष 2016 में श्रीलंका एक बार फिर 1.5 बिलियन डॉलर के ऋण के लिये IMF के पास पहुँचा, लेकिन IMF की शर्तों ने श्रीलंका के आर्थिक स्वास्थ्य को और भी बदतर कर दिया।

अब एडीबी, चीन व अन्य देशों के साथ-साथ श्रीलंका अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के कर्ज से दबा हुआ है। इसमें बुनियादी ढाँचे के विकास के नाम पर चीन द्वारा ऊंची ब्याज दर पर मिला कर्ज भी है। चीन ने भारत को घेरने की योजना ‛स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ के लिए श्रीलंका को साधन बनाया। श्रीलंका के चीन के कर्जजाल में फंसने की शुरुआत बीआरआई (बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव) से हुई । दरअसल बीआरआई के हिस्से के रूप में श्रीलंका को भारी निवेश और ऋण मिला जिससे वह कर्ज के जाल में फँसता गया। श्रीलंका पर चीन का कर्ज इस तरह बढ़ता गया कि उसका हंबनटोटा जैसा महत्वपूर्ण बंदरगाह लीज पर चीन के हाथों में चला गया। श्रीलंका को चीनी फर्टिलाइजर कंपनी के भुगतान को खारिज करने पर उसके पीपल्स बैंक को भी ब्लैक लिस्ट में डाला गया। संकट के इस दौर में अब चीन श्रीलंका की कोई विशेष मदद नहीं कर रहा है। चीन ने श्रीलंका को दिए अपने क़र्ज़ की शर्तो में भी ढील देने से इन्कार कर दिया। उसने कूटनीतिक चुप्पी का रास्ता अख्तियार किया है। अब चीन का रुख कर्जमाफी की तरफ भी नहीं है। इस प्रकार से चीन पर आर्थिक निर्भरता ने श्रीलंका के संकट को बढ़ाया है।

समाधान-

रानिल विक्रमसिंघे का कार्यकाल नवंबर 2024 तक ही है इसलिए उनके पास सुधार के लिए बहुत कम वक्त है। उनके समक्ष सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है कानून व्यवस्था को बहाल करना। विक्रमसिंघे की छवि राजपक्षे परिवार के करीबी के रूप में रही है इसलिए उन्हें निष्पक्ष और स्वतंत्र फैसले लेने होंगे जो राजपक्षे परिवार से प्रभावित ना हों। इसके अतिरिक्त श्रीलंका आर्थिक नीतियों में मूलभूत बदलाव लाए, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा कृषि पर विशेष ध्यान दें। जैसे ही कुछ आवश्यक वस्तुओं की कमी समाप्त होती है, देश के आर्थिक सुधार के लिये उपाय करना चाहिए। मौजूदा संकट से बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों के साथ ही युद्ध प्रभावित उत्तरी और पूर्वी प्रांतों के आर्थिक विकास के लिये एक रोडमैप बनाने हेतु सरकार को तमिल राजनीतिक नेतृत्व के साथ हाथ मिलाना चाहिए। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए घरेलू कर राजस्व को बढ़ाना और उधारी को सीमित करने के लिये सरकारी व्यय को कम करने जैसे उपयुक्त कदम उठाने होंगे। रियायत और सब्सिडी संबंधी व्यवस्था के पुनर्गठन के लिये रणनीतिक कदम उठाना चाहिए। पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा देने और दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए एक सकारात्मक माहौल और रणनीति बनानी चाहिए।

भारत की भूमिका-

आज जब श्रीलंका घोर आर्थिक और राजनीतिक संकट से घिरा हुआ है तो भारत ने श्रीलंका को खाद्य उत्पादों, दवाओं एवं अन्य जरूरी चीजों की खरीद के लिए एक अरब डालर की ऋण सुविधा प्रदान करने की घोषणा की है। यह घोषणा 17 मार्च को की गई और इसी दिन दोनों देशों के बीच इस पर हस्ताक्षर भी किए गए। जनवरी और फरवरी में ही भारत श्रीलंका को करीब 6,500 करोड़ रुपये का क़र्ज़ दे चुका। बीते दिनों भारत ने 40,000 टन चावल भी श्रीलंका भेजा। इसके साथ ही वहां ईंधन की भारी किल्लत को देखते हुए बड़ी मात्रा में डीजल भी भिजवाया गया है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत के लिए पड़ोसी प्रथम है और भारत श्रीलंका के साथ खड़ा है। एस. जयशंकर ने आश्वस्त किया कि भारत हर स्थिति में श्रीलंका के साथ है और हर संभव तरीके से मुश्किल हालात से उबरने में उसकी मदद करेगा।

श्रीलंका और भारत की सीमाएं बहुत दूर नहीं हैं और एक पड़ोसी के नाते यह भारत की जिम्मेदारी भी है कि वह मुश्किल में फंसे पड़ोसी देश की मदद करे, लेकिन इसके साथ ही भारत को सतर्क भी रहना होगा कि वहां यदि हालात और बिगड़ते हैं तो शरणार्थी संकट खड़ा हो सकता है जिसकी शुरुआत आंशिक रूप से देखने को मिली भी। जरूरी मदद के साथ भारत को श्रीलंका संकट को वैश्विक एवं बिम्सटेक जैसे क्षेत्रीय मंचों पर प्रभावी तरीके से उठाना भी चाहिए। इससे न सिर्फ भारत को कूटनीतिक बढ़त हासिल होगी बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कद भी बढ़ेगा। चीन से श्रीलंका का मोहभंग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी उपस्थिति और प्रभाव को नियंत्रित करना भी भारत के हित में है।

विमल कुमार

विमल कुमार, राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। अध्ययन-अध्यापन के साथ विमल विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में समसामयिक सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन और व्याख्यान के लिए चर्चित हैं। इनकी अभिरुचियाँ पढ़ना, लिखना और यात्राएं करना है।

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