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भारत में वन्यजीव संरक्षण की आवश्यकता, प्रयास और प्रमुख चुनौतियाँ

कल्पना कीजिये कि आप किसी घर में रह रहे हैं और कोई बाहरी आकर आपको आपके घर से बेदखल कर देता है। इतना ही नहीं, अब आप के रहने के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना न बचा हो। ऐसे में आप क्या करेंगे? या तो आप उस बाहरी से लड़ेंगे या फिर कहीं और जाएँगे। वर्तमान में वन्यजीवों के पर्यावास में मानव के बढ़ते हुए हस्तक्षेप के कारण न सिर्फ वन्यजीवों की जान पर आफत आई है बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष में भी इजाफा हुआ है। इसीलिए वन्यजीवों के संरक्षण की महती आवश्यकता है।

यदि वन्यजीवों की बात करें तो यह गैर-पालतू जानवरों की प्रजातियों को संदर्भित करता है, हालांकि अब इसमें वे सभी जानवर शामिल हैं जो मानव हस्तक्षेप से मुक्त वातावरण में वनों में अभिवृद्धि हेतु मौजूद हैं। इन वन्यजीवों की विविध प्रजातियों का एक निश्चित भूगोल में एक साथ रहते हुए परिस्थितिकी संतुलन में योगदान देने से जैव विविधता भी मजबूत होती है। जैव विविधता से तात्पर्य है- किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता। इसका संबंध पौधों के प्रकार, प्राणियों तथा सूक्ष्म जीवाणुओं से है। उनकी आनुवंशिकी और उनके द्वारा निर्मित पारितंत्र से है। यह पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवधारियों की परिवर्तनशीलता, एक ही प्रजाति तथा विभिन्न प्रजातियों में परिवर्तनशीलता तथा विभिन्न पारितंत्रों में विविधता से संबंधित है। जैव विविधता सजीव संपदा है।

इस तरह यदि हम देखे तो वन्यजीवों का सुरक्षित पर्यावास ही मानव के अस्तित्व को सततता प्रदान करेगा। इसीलिए सरकारें सांस्थानिक स्तर पर भी इस संबंध में प्रयास करती हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून द्वारा वन्यजीव विज्ञान को प्रोत्साहित किया जाता है ताकि वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में उचित काम हो सकें। यह संस्थान विभिन्न क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा, शोध और प्रशिक्षण को बढ़ावा देता है। इसके अलावा यह संस्थान वन्यजीव के संरक्षण के संबंध में सरकार का सलाहकारी निकाय भी है।

खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर स्थित प्रजातियों जैसे- बाघ, शेर, गिद्ध आदि जिनके अस्तित्व पर खतरा है, के संरक्षण हेतु सरकार द्वारा विशेष प्रयास किये जाते हैं। इनके संरक्षण से न सिर्फ इन प्रजातियों को सुरक्षित पर्यावास सुनिश्चित होता है बल्कि इनके द्वारा अपने रहन-सहन, खान-पान के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले एक बड़े क्षेत्र का संरक्षण भी स्वमेव सुनिश्चित हो जाता है। सरकार ने विभिन्न वन्यजीव संरक्षण परियोजनाओं के माध्यम से वन्यजीवों और उनके आवासों को संरक्षित किया है।

इस दिशा में सरकार द्वारा सर्वप्रथम वर्ष 1970 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश(वर्तमान उत्तराखंड) के अंतर्गत आने वाले केदारनाथ अभ्यारण्य में 'कस्तूरी मृग परियोजना' आरम्भ की गई। इस में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ का भी सहयोग लिया गया। इसके बाद वर्ष 1973 में बाघ परियोजना की शुरूआत की गई। यह पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु शुरू की विभिन्न परियोजनाओं में से एक सफलतम परियोजना है। भारत का प्रोजेक्ट टाइगर भारत में बाघों की आबादी को बढ़ाने में बेहद सफल रहा है। वर्ष 2021 की बाघ गणना में लगभग 2967 बाघों का अनुमान लगाया गया है। प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत विभिन्न टाइगर रिजर्व के माध्यम से बाघों को संरक्षित किया जाता है।

इसके साथ ही सरकार द्वारा वर्ष 1973 में गिर सिंह परियोजना को भी शुरू किया गया। इसके अलावा वर्ष 1975 में कछुआ संरक्षण परियोजना, घड़ियाल प्रजनन परियोजना आदि को भी शुरू किया गया। वर्ष 1992 में हाथी परियोजना की शुरूआत की गई। इसके अंतर्गत हाथियों के सघन पर्यावासों को एलिफैंट रिजर्व की मान्यता प्रदान की गई। जैव विविधता के संतुलन के लिए बेहद आवश्यक इन वन्यजीवों के विशेष संरक्षण प्रयासों के अतिरिक्त सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों को वन्यजीव अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क आदि के रूप में भी मान्यता प्रदान की जाती है। वर्तमान में देश भर में 106 राष्ट्रीय पार्क है।

राष्ट्रीय पार्क, वन्यजीव अभ्यारण्य के अतिरिक्त कुछ क्षेत्रों को जीवमंडल आरक्षित क्षेत्रों के रूप में भी मान्यता प्रदान की गई है। यूनेस्को विश्व नेटवर्क द्वारा भी भारत के 12 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों को मान्यता प्रदान की गई है। पर्यावरण संरक्षण के इन सरकारी प्रयासों के अतिरिक्त भारत में सिविल सोसाइटी और व्यक्तिगत स्तर पर भी विभिन्न पर्यावरणीय संरक्षण के आंदोलनों को चलाया गया। इनमें वर्ष 1970 के दशक में उत्तराखंड में प्रारंभ हुआ चिपको आंदोलन, वर्ष 1980 के दशक में शुरू हुआ जंगल बचाओ आंदोलन, वर्ष 1983 में कर्नाटक में शुरू हुआ एप्पिको आंदोलन, वर्ष 1985 में हुआ नर्मदा आंदोलन, वर्ष 1986 में ओडिशा में हुआ बलियापाल आंदोलन, वर्ष 1990 के दशक में उत्तराखंड में हुआ टिहरी आंदोलन और वर्ष 1994 में उत्तराखंड में ही हुआ मैती आंदोलन आदि प्रमुख है।

पर्यावरण संरक्षण को सामुदायिक और व्यक्तिगत स्तर पर प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न सरकारों, गैर सरकारी संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु पुरस्कार भी प्रदान किये जाते है। इनमें राइट लाईवलीहुड पुरस्कार, गोल्डमैन पुरस्कार, इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार, अंतरराष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन पुरस्कार और सासाकावा पुरस्कार आदि प्रमुख है। यदि भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद की बात की जाए तो इनमें जादव पायेंग, सलीम अली, राजेंद्र सिंह, मेधा पाटकर, किंकरी देवी, महेश चंद्र मेहता, एम.एस स्वामीनाथन, रवींद्र कुमार सिन्हा और कैलाश सांखला आदि प्रमुख हैं।

भारत में स्थानीय समाज द्वारा वन और वन्यजीवों की पूजा भी की जाती है, इन्हें देव वन या पवित्र उपवन कहा जाता है। इनमें से सरना (बिहार, झारखंड), गुम्पा वन (अरुणाचल प्रदेश),देवराय (गोवा), गमखाप (मणिपुर), देवारा (कर्नाटक) , जोहरा थाकुरामा(ओडिशा), कोविल काडु(पुडुचेरी), शिफिन(हिमाचल प्रदेश) और स्वामी शोला(तमिलनाडु) आदि प्रमुख हैं। इसके साथ ही भारत सरकार द्वारा जैव विविधता की अभिवृद्धि हेतु विभिन्न नीतियों और कानूनों को भी लाया गया है।

इनमें राष्ट्रीय वन नीति, 1988, राष्ट्रीय पर्यावरण कार्ययोजना, 1994, वन्यजीव संरक्षण नीति, 2002, राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 आदि प्रमुख है। इसके साथ ही पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पर्यावरण (संरक्षण ) अधिनियम, 1986, जैव विविधता अधिनियम, 2002 और राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 आदि प्रमुख अधिनियम हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत कुल 6 अनुसूचियाँ है जो अलग-अलग तरह से वन्यजीवों को सुरक्षा प्रदान करता है। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण से संबंधित विभिन्न सरकारी संस्थाओं द्वारा भी वन्यजीवों के संरक्षण हेतु प्रयास किये जाते है। इनमें राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो, भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण संस्थान आदि प्रमुख हैं।

यदि वन्यजीव संरक्षण के समक्ष चुनौतियों की बात की जाए तो इनमें मानव-वन्यजीव संघर्ष, कैनाइन डिस्टेम्पर वायरस, पारिस्थितिकी संवेदी क्षेत्रों में निर्माण कार्य और जलवायु परिवर्तन आदि प्रमुख है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का सिर्फ 5 प्रतिशत हिस्सा ही संरक्षित क्षेत्र के रूप में विद्यमान है। यह क्षेत्र वन्यजीवों के पर्यावास की दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। एक ओर संरक्षित क्षेत्रों का आकार बेहद छोटा है, वहीं दूसरी ओर रिज़र्व में वन्यजीवों को पर्याप्त आवास उपलब्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त बड़े वन्यजीवों जैसे- बाघ, हाथी, भालू, आदि के शिकारों के पनपने के लिये भी पर्याप्त परिवेश उपलब्ध नहीं हो पाता। उपर्युक्त स्थिति के कारण वन्यजीव भोजन आदि की ज़रूरतों के लिये खुले आवासों अथवा मानव बस्तियों के करीब आने को मजबूर होते हैं। यह स्थिति मानव-वन्यजीव संघर्ष को जन्म देती है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आँकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत दुनिया के सबसे तेज़ी से विकास कर रहे देशों में शामिल रहा है। वैश्विक बाज़ार में भारत की इस बढ़त ने देश के सुदूर हिस्सों में भी विकास कार्यों में तेज़ी प्रदान की है। परंतु कई बार विकास-कार्यों, अवसंरचना निर्माण के दौरान पारिस्थितिकी के क्षरण को रोकने के लिये आवश्यक मापदंडों का पालन नहीं किया जाता, जो कि वन्यजीव पारिस्थितिकी के संरक्षण में एक बड़ी चुनौती है। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन ने भी वन्यजीवों के पर्यावास को क्षति पहुँचाई है। इसी कारण वन्यजीवों का मानव की रिहायशी बस्तियों की ओर पलायन हुआ है। वन्यजीवों के प्रभावी संरक्षण हेतु इन चुनौतियों से निपटने की बेहद आवश्यकता है।

  संकर्षण शुक्ला  

संकर्षण शुक्ला उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले से हैं। इन्होने स्नातक की पढ़ाई अपने गृह जनपद से ही की है। इसके बाद बीबीएयू लखनऊ से जनसंचार एवं पत्रकारिता में परास्नातक किया है। आजकल वे सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के साथ ही विभिन्न वेबसाइटों के लिए ब्लॉग और पत्र-पत्रिकाओं में किताब की समीक्षा लिखते हैं।

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