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मॉरल पुलिसिंग

अपने भौगोलिक परिस्थितियों के परिदृश्य में विभिन्न प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित भिन्नताओं या विशेषताओं के साथ-साथ उनके अपने व्यक्तिगत नियम और विचार निर्मित होते हैं। यह नितांत वैयक्तिक भी हो सकते हैं और उस भौगोलिक स्थितियों के सापेक्ष सामाजिक भी। जैसे ही भौगोलिक परिदृश्य में परिवर्तन होगा उनके अपने–अपने सामाजिक–सांस्कृतिक नियम, वेशभूषा, भाषा और व्यवहार में भी परिवर्तन होता है। एक आर्थिक और भौगोलिक वातावरण में निर्मित पहनावा जरूरी नहीं है कि वह दूसरे भी वातावरण में स्वीकार हो। ठीक ऐसे ही खान–पान और व्यवहार भी वातावरण और भौगोलिक स्थितियों के सापेक्ष निर्मित होते हैं। यह स्थिति प्राकृतिक भिन्नता पर निर्भर होती है। प्राकृतिक भिन्नताएं ही मानव के व्यवहार से लेकर उसके खान–पान, वेशभूषा और भाषा–व्यवहार को निर्मित और प्रभावित करती रहीं हैं और इन्हीं मानव निर्मित विशेषताओं का अपने आप में बद्ध होकर लौकिक और अंतिम माना जाना और इसके एवज में दूसरे अथवा किसी अन्य भौगोलिक-सामाजिक समूह या व्यक्तियों को मनाने के लिए बाध्य करना ही मॉरल पुलिसिंग की स्थिति को दर्शाता है।

सवाल यह है कि आखिर मॉरल पुलिसिंग होती क्या है, इसकी क्या सटीक व्याख्या हो सकती है, इसके अपने संदर्भ क्या है, इसके निहितार्थ क्या है? सामान्यतः मॉरल पुलिसिंग व्यक्ति, समूह या समाज के द्वारा एक पूर्व निर्मित धारणा, व्यवहार, नियम, पहनावा आदि के आधार पर किसी अन्य व्यक्ति या समूह को मानसिक अथवा भौतिक आधार पर चोट पहुंचाने से माना जाता है। क्योंकि समाज में पूर्व निर्मित नियम कथित मर्यादा को बनाएं रखने के लिए जानें जाते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति या समूह के द्वारा इन कथित पूर्व निर्मित मर्यादित नियमों, व्यवहार, धारणाएं और पहनावे से इतर अपने आप को निगमित, संचालित या प्रदर्शित करना सामाजिक मर्यादा भंग करने के तौर पर माना जाता है। ऐसे में सामाजिक नियमों को अंतिम मान बैठे समूह इन गतिविधियों को भावनात्मक स्तर पर विश्लेषित करते हैं न कि तार्किक स्तर पर और ऐसे ही समूह इन गतिविधियों को मर्यादा भंग करने के लिए व्यक्तियों या समूह को कारण मानते हैं।

एक आंकड़े के अनुसार लगभग 30 प्रतिशत लोग मॉरल पुलिसिंग को सही मानते हैं। वे किसी समूह द्वारा मॉरल पुलिसिंग करने को समाज के लिए सही ठहराते हैं। वैसे तो हमारे समाज में मॉरल पुलिसिंग बहुत सामान्य हो चुकी धारणा है। यह लगभग स्वीकृत हो चुका है कि मॉरल पुलिसिंग करना एक अपराध नहीं है, लेकिन यह बात सत्य नहीं है। आप भारतीय संविधान में वर्णित या नागरिक को दिए गए उनके मूल अधिकार निजता और चयन की आजादी के मानदंडों को रोक नहीं सकते। यह व्यक्ति के निजता और चयन के आजादी के खिलाफ है जोकि संविधान में वर्णित अनुच्छेद 19 के तहत मूल अधिकार भी हैं। इस हिसाब से किसी व्यक्ति की मॉरल पुलिसिंग करना उसके मूल अधिकारों का हनन हुआ।

मॉरल पुलिसिंग का मुख्य कारण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक है। इसके साथ ही साथ जो विभिन्नताएं समाज के स्तर पर दृष्टिगोचर होती हैं। कभी-कभी समूह उनको भी मॉरल पुलिसिंग का आधार बनाता है। जैसे की भारत में अधिकतर मॉरल पुलिसिंग जिसे अक्सर हम अराजक समूह कहते हैं के मन में भारतीय संस्कृति, प्रथा और परंपरा की शुद्धता का एकतरफा मनोवैज्ञानिक पक्ष हावी रहता है जो व्यक्ति या व्यक्ति के समूह को भाषण, अभिवृति और समाज में कैसे व्यवहार करना है, को लेकर नियम बनाता है।

मॉरल पुलिसिंग में सामाजिक कारण भी होता है। इसमें एक सामाजिक समूह अपने समाज में निर्मित सामाजिक नियमों, मानदंडों, विशेषताओं, विचार, व्यवहार और एक तय प्रक्रियाओं जैसे कि खान–पान, पहनावा आदि को दूसरे भिन्न समुदाय पर थोपने की कोशिश करता है या फिर उसको लेकर रक्षात्मक मुद्रा में रहता है या फिर वह समाज के तय और मान्य-मानदंडों को किसी भी आधार पर टूटने नहीं देना चाहता।

मॉरल पुलिसिंग के धार्मिक आधार में समूह अपने धर्म के विश्वास, आस्था, प्रथा, कार्य को दूसरे धर्म के अनुयायी को मनाने के लिए बाध्य करता है या फिर उसको लेकर रक्षात्मक मुद्रा में रहता है। वह धर्म के सभी परंपराओं को दैवीय नजर से देखता है, धार्मिक आधार पर होती मॉरल पुलिसिंग में समूह को अपने धर्म की सभी विशेषताएं अंतिम और अन्य धर्म से उच्च अथवा शुद्धता के भावात्मक पक्ष से लबारेज रहती है और मॉरल पुलिसिंग जब राजनीतिक आधार पर की जाती है तो समूह अपने विचार, पूर्व निर्मित राजनीतिक अवधारणाएं आदि को किसी अन्य राजनीतिक परिदृश्य में लागू करने की कोशिश करता है।

अन्य प्रकार में लिंग के आधार पर भी मॉरल पुलिसिंग को देखा जा सकता है मसलन सामाजिक विकास के साथ ही साथ निर्मित होते लिंग आधारित पहनावे और कार्य जोकि अब एक धारणा में निर्मित कर दिए गए हैं। ऐसे में किसी लड़के का बर्तन धुलना या किसी लड़की का जींस पहनना व्यक्तियों और समूह के लिए मॉरल पुलिसिंग करना सामान्य हो चुका है।

हालांकि यह समस्या हर समुदाय और हर देश-काल की है। मसलन की अमेरिका में शिक्षा संस्थाओं में मॉरल पुलिसिंग का कारण नियम (Rules and regulations) हैं। जैसे कि ड्रेस कोड(पहनावा), फैशन और बाल को लेकर हैं। वहीं अरब समुदाय में मॉरल पुलिसिंग सांस्कृतिक और धार्मिक (Cultural behaviour and religion practice) है। जैसे कि महिलाओं के पहनावे को लेकर और धार्मिक मान्यताओं को लेकर। भारत में मॉरल पुलिसिंग विशेषकर सांस्कृतिक आधार (Cultural protection and Western influence) पर की जाती है जैसे कि संस्कृति के रक्षा के नाम पर और पाश्चात्य सभ्यता से अपसंस्कृति के नाम पर और इसके शिकार भारत में 18 से 30 वर्ष के युवक और युवतियां होती हैं।

भारतीय परिदृश्य में शिक्षा संस्थानों में मॉरल पुलिसिंग कपड़े, पहनावे और लिंग के आधार पर की जाती है और यह लगभग सामान्य स्थिति है। जैसे लड़के और लड़कियों को एक साथ न बैठने देना, संस्थाओं का अपना एक तय ड्रेस कोड आदि। इसके इतर ऐसा भी देखा गया है कि भारत में कुछ राजनीतिक दल अथवा उससे जुड़े समूह मॉरल पुलिसिंग को बढ़ावा देते हैं। ऐसे समूह संस्कृति के रक्षा के नाम पर किसी व्यक्ति के चयन और स्वतंत्रता को बाधा पहुंचाते हैं। वोट बैंक के नाम पर किसी दूसरे समुदाय की मॉरल पुलिसिंग करते हैं।

मॉरल पुलिसिंग और नागरिक अधिकार: कभी-कभी मॉरल पुलिसिंग में व्यक्ति की निजता और उसके चयन को आधार बनाकर किया जाता है। ऐसे में भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार जोकि व्यक्ति के निजता और उसके व्यक्तिगत चयन को सुरक्षा प्रदान करता है, का उल्लंघन माना जाएगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऐसे ही एक मामले में जो दो युवक और युवतियों के सार्वजनिक वातावरण में प्रेम संबंधों के इजहार करने पर पुलिस द्वारा अपराधी करार दिया गया था, उसको निजी और व्यक्तिगत मसला करार देते हुए बरी कर दिया।

मॉरल पुलिसिंग का शिकार व्यक्ति न सिर्फ मानसिक आघात का सामना करता है अपितु कभी-कभी वह अपनी निजता भंग होने के डर से आत्महत्या तक भी कर लेता है, हालांकि अभी इस आधार पर कोई शोध नहीं हुआ है कि मॉरल पुलिसिंग से कितना प्रभाव व्यक्तियों के मन पर पड़ता है और कितने लोग इसके एवज में आत्महत्या कर लिए लेकिन यह बात तो स्वीकृत हो चुकी है कि मॉरल पुलिसिंग से व्यक्तियों के मन पर नकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ता है। कभी-कभी मॉरल पुलिसिंग के एवज में कुछ समूह किसी व्यक्ति को शारीरिक तौर पर दंडित भी कर देते हैं। ऐसे ही कुछ मामलों में व्यक्ति की मौत तक हो गई है। अक्सर ऐसा देखने में आता है कि कुछ अराजक समूह किसी दूसरे समुदाय अथवा विचारधारा की संपत्ति को आर्थिक क्षति भी पहुंचाते हैं। कभी-कभी आगजनी की घटनाएं और दंगे भी हो जाते हैं।

कुछ मसलों में मॉरल पुलिसिंग अपने जघन्यतम् स्थिति तक भी पहुँच जाती है। जैसे ऑनर किलिंग, जिसमें परिवार समाज के दबाव में आकर अपने ही सदस्य खासकर बेटी अथवा महिला की हत्या तक कर देता है। कुछ मसलों में व्यक्ति मॉरल पुलिसिंग का शिकार होकर अवसाद में भी चल जाता है। कभी-कभी अति-आलोचना का भी सामना करना पड़ता है।

वैसे तो मॉरल पुलिसिंग अभी हमारे देश में सामान्य है इसको अपराध नहीं माना जाता लेकिन एक सभ्य, प्रगतिशील और आधुनिक राष्ट्र और समाज बनाने के लिए मिलकर मॉरल पुलिसिंग के नकारात्मक और पूर्वाग्रह से युक्त वातावरण में शिक्षा का प्रसार करके मॉरल पुलिसिंग के संभावित अपराध को कम किया जा सकता हैं। हमें सिर्फ शिक्षा के द्वारा यह बताना है कि तुम्हारी व्यक्तिगत निजता और चयन भारतीय संविधान में मौलिक आधार पर प्रदत्त किए गए हैं और किसी व्यक्ति के द्वारा तुम्हारे मौलिक अधिकारों का हनन अपराध है।

समाज और व्यक्तियों को जागरूक करके भी मॉरल पुलिसिंग को कम किया जा सकता है। बस हमें बतौर जागरूकता यह बताने की जरूरत है कि दूसरे के पहनावे, खान–पान, संस्कृति, धर्म और विचार–व्यवहार की रक्षा करना मानवीय और सतत विकासात्मक परिवर्तन है। ऐसा करके हम नए मूल्यों, आधुनिक प्रणालियों और विभिन्न विविधताओं को अपने समाज में जगह देकर समाज को विकास की राह पर ले जा सकते हैं।

पुलिस को ट्रेनिंग देकर भी, जिससे कि पुलिस मॉरल पुलिसिंग को असंवैधानिक मानकर उचित कार्यवाही करे, लोगों के व्यक्तिहत चयन और उनके निजता का सम्मान करे, पीड़ित व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करे न कि उनके निजी जानकारी को परिवार के साथ साझा करके एक पूर्वाग्रह से फिर से व्यक्ति की मॉरल पुलिसिंग करे। क्योंकि लोग जब पुलिस व्यवस्था से सहज हो जाएंगे तो वे बेहिचक अपने ऊपर हुई मॉरल पुलिसिंग की शिकायत थाने में दर्ज कर सकेंगे जिससे की हमारे पास न सिर्फ मॉरल पुलिसिंग से संबंधित आँकड़े रहेंगे अपितु लोग अपने अधिकारों को लेकर जागरूक भी होंगे।

घर पर भी परिवार और समुदाय के द्वारा अपने बच्चों को मॉरल पुलिसिंग, जोकि एक अमानवीय और रूढ़ सोच अथवा विचार को दर्शाता है, के नकारात्मक पक्षों को बताकर बच्चों को जागरूक कर सकते हैं। भीड़ और समूह के बारे में तथ्य और उसके साइकॉलोगी पक्ष पर जन-जागरूकता बढ़ाकर भी मॉरल पुलिसिंग की स्थिति को कम किया जा सकता है क्योंकि भीड़ और समूह की एक पूर्वनिर्मित धारणा या पूर्वाग्रह होता है जिसके मनोविज्ञान के फलीभूत भीड़ अथवा समूह किसी व्यक्ति की हत्या भी कर सकती है। अन्य आभासी माध्यमों जैसे कि सोशल मीडिया, समाचार पत्रों इत्यादि के माध्यम से जन-जागरूकता अभियान चलाकर भी मॉरल पुलिसिंग की जघन्यता को कम किया जा सकता है और समाज में विविधता की स्वीकृति के लिए एक सकारात्मक वातावरण निर्मित किया जा सकता है।

  दीपक कुमार  

दीपक कुमार मूलत: उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले से हैं। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक एवं परास्नातक की पढ़ाई की है। वर्तमान में ये दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। दीपक विभिन्न विषयों पर लेखन कार्य करते हैं।

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