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दृष्टि आईएएस ब्लॉग

छोटे पार्टिकल्स के बड़े कारनामे

  • 06 Mar, 2024

रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहां करे तरवारि ।।

कितनी सुन्दर बात कही है रहीम जी ने कि बड़ी वस्तुओं को देख छोटी वस्तुओं का अनादर करना उचित नहीं है, बल्कि हर वस्तु का अपना महत्त्व होता है। जहाँ सुई की आवश्यकता होती है, वहां तलवार काम नहीं आते। आज यह दोहा अपने सामाजिक प्रासंगिकता से अलग प्रौद्योगिकी के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों के लिये भी उतना ही सटीक साबित होता है । तकनीकी रूप से कुछ पदार्थ अपने आकार में भले ही छोटे होते हैं लेकिन उनकी ये लघुता और गुण उन्हें बड़े कारनामे दिखाने में सक्षम बनाते हैं। इनके द्वारा विज्ञान के क्षेत्र में वो कारनामे किये जा रहे हैं, जिन्हें बड़े आकार वाले पदार्थ करने में सक्षम नहीं हैं। नैनो टेक्नोलॉजी के तहत भी ऐसे ही छोटे पार्टिकल्स पर कार्य किया जाता हैं, जिनका आकार 100 नैनोमीटर से भी कम होता है। आजकल इस तकनीक की सहायता से बायो साइंस, मेडिकल साइंस एवं इलेक्ट्रॉनिक्स आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रूप से परिवर्तन संभव हो पाया है। इसके अंतर्गत पदार्थों के अणुओं और परमाणुओं की ऐसी इन्जीनियरिंग की जाती है, जिसके परिणामस्वरूप भौतिकी, रसायन, बायो इन्फोर्मेटिक्स एवं बायो टेक्नोलॉजी जैसे विषयों का आपस में अंतर-जुड़ाव संभव हो पाता है।

‘नैनो’ एक ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ होता है सूक्ष्म, छोटा या बौना। उसी प्रकार नैनो पदार्थ (nano mater।als) भी अति सूक्ष्म आकार वाले तत्वों से निर्मित होते हैं। इन पदार्थों में अपने मूल पदार्थ के सभी गुण मौजूद होते हैं। नैनोसाइंस और नैनोटेक के तहत परमाणुओं और अणुओं की क्रियाविधि को समझते हुए उन्हें नियंत्रित कर वांछित कार्य संपन्न कराये जाते हैं। जब भी यह शब्द हम सुनते हैं तो हमेशा यह जिज्ञासा रहती है कि इसके पीछे कौन सी अवधारणा कार्य करती है और इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई है । “There ।s Plenty of Room at the Bottom” यह कथन 29 दिसंबर 1959 को कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में भौतिकशास्त्री रिचर्ड फेनमैन द्वारा दिए गए एक आख्यान का एक हिस्सा है, जिसने आगे चलकर नैनोतकनीकी के आधार को निर्मित किया। इसके एक दशक पश्चात अत्याधुनिक मशीनिंग अन्वेषण के तहत प्रोफ़ेसर नोरियो तनिगुची द्वारा ‘नैनोटेक्नोलॉजी’ शब्द का प्रयोग किया गया।

यह समझने योग्य बात है कि वैसे तो पूरी दुनिया ही एक प्रकार से परमाणुओं से निर्मित है लेकिन हम इन्हें अपनी आँखों द्वारा देख पाने में सक्षम नहीं होते । लेकिन स्कैंनिंग टनलिंग माइक्रोस्कोप (STM) और परमाणु बल माइक्रोस्कोप (AFM) के आविष्कार के साथ इन्हें देख पाना संभव हुआ और इसके साथ ही नैनोटेक्नोलॉजी का भी जन्म हुआ। इस तकनीक की सहायता से नैनो आकार के पदार्थ को नियंत्रित कर कई अनुप्रयोग किये जा सकते हैं जो सामान्य रूप से संभव नहीं । आगे चलकर अमेरिकी वैज्ञानिक के. एरिक ड्रेक्स्लर के दो पुस्तकों इंजन्स ऑफ क्रिएशन (1986) और नैनोसिस्टम (1992) ने इस क्षेत्र में क्रान्ति ला दी, जिसकी वजह से आज इस क्षेत्र में तीव्र गति से कार्य संपादित हो रहे हैं ।

इस प्रकार अब हम ये तो समझ चुके हैं कि नैनो टेक्नोलॉजी वह विज्ञान है जिसमें मानव जीवन में सुधार हेतु उपयोग में आने वाली वस्तुओं का निर्माण परमाणु या अणु के स्तर पर किया जाता है । आज ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जो नैनोटेक्नोलॉजी के अनुप्रयोगों से अछूता हो।

नैनोतकनीकी के व्यापक अनुप्रयोग और उपयोग की अपार संभावनाएं मौजूद हैं जिनमें से कुछ के बारे में हम यहाँ चर्चा करेंगे-

  • चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा - नैनोकणों को शरीर में सीधे रोगग्रस्त कोशिकाओं तक पहुंचा कर टारगेटेड उपचार को संभव बनाया गया है जिससे दवा का दुष्प्रभाव कम होता है। पुनार्योजी चिकित्सा और उत्तक इंजीनियरिंग में भी इसकी अपार क्षमता है।
  • कृषि और फसल उत्पादन - इसकी सहायता से नैनो रसायन और जैविक तत्वों के उपयोग से फसलों की सम्वर्धनशीलता में सुधार किया जा सकता है। नैनो सेंसर और उसके विश्लेषण द्वारा भूमि की नमी, फसलों को जल आपूर्ति और मौसम के परिवर्तन का अध्ययन संभव है। कृषि में जीनोम एडिटिंग नैनो टेक्नोलॉजी के प्रयोग द्वारा फसलों की उपज में सुधार और रासायनिक फर्टिलाइजर्स पर निर्भरता एवं खर-पतवार में कमी लायी जा सकती है। इन सबके साथ ही जलवायु सह्य पोषक तत्वों से युक्त उच्च पैदावार वाली फसल किस्मों को भी प्राप्त किया जा सकता है।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रौद्योगिकी- नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से प्रोसेसर के सूक्ष्मीकरण द्वारा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को हल्का और उनके क्षमता में विस्तार किया जा सकता है। इससे बिजली खपत में कमी और लंबे जीवनकाल वाली बैटरियों का विकास संभव हो पाया है। नैनोटेक्नोलॉजी ने सौर सेल्स की प्रगति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
  • पर्यावरण और ऊर्जा - नैनोमटेरियल द्वारा मानव स्वास्थ्य और पशु जीवन को प्रभावित करने वाले लेड जैसे प्रमुख जल प्रदूषकों का निष्कासन संभव है। यह कुशल ऊर्जा उत्पादन को भी सक्षम बनाती है।
  • वस्त्र उद्द्योग- इस तकनीक के प्रयोग द्वारा वस्त्रों के रंगों और गुणों में परिवर्तन कर उपयोगी अधिक टिकाऊ कपड़ों का निर्माण संभव है। नैनो सिल्वर एक ऐसा ही नैनो पदार्थ है ।
  • यहां नैनोटेक्नोलॉजी के प्रयोग द्वारा कुछ उपयोगी नवाचार पर भी प्रकाश डालना जरुरी है, जो इस प्रकार हैं -कयूबिट-टेक, सिंथो-नैनोमेड, क्रोनो-नैनोसेल, प्लाज्मा-नैनोकोट,एयरो-नैनोग्राफिन, क्वांटम–एक्सआर , बायो-नैनोजेन,नैनो-फार्माक्रोनो,नैनोमिसेल्स आदि ।

अब बात अगर नैनो टेक्नोलॉजी की हो रही हो और ‘क्वांटम डॉट्स’ पर चर्चा न की जाए तो बात कुछ अधूरी सी रह जायेगी। क्वांटम डॉट्स भी नैनो पदार्थ ही होते हैं लेकिन वे अर्धचालक पदार्थों के नैनोक्रिस्टल होते हैं, जिनका व्यास ‘बोर एक्साइटोनिक त्रिज्या’ से कम होता है। एक छोटे से सघन जगह में व्यवस्थित किये गए अर्धचालक पदार्थों के नैनोक्रिस्टल का व्यास जब बोर एक्साइटोनिक त्रिज्या (इलेक्ट्रानों के मध्य की औसत दूरी) से कम हो जाता है तो ये नैनो पदार्थ क्वांटम भौतिकी के कारण विशिष्ट रासायनिक या भौतिक गुण प्रस्तुत करने लगते हैं, जिन्हें हम ‘क्वांटम डॉट्स’ कहते हैं, जो 10 नैनोमीटर से कम आकार वाले होते हैं।

गौरतलब है कि प्रत्येक क्वांटम डॉट्स एक छोटे आकार वाले उस क्वांटम बॉक्स की तरह होते हैं, जिसमें कुछ हज़ार परमाणुओं को इस तरह से व्यवस्थित किया जाता है, जिससे उनके इलेक्ट्रान्स एक-दूसरे के बहुत करीब स्थित हो जाए । ऐसी व्यवस्था में इन परमाणुओं को घूर्णन हेतु कम जगह प्राप्त होने के कारण यह डॉट क्वांटम यांत्रिकी (quantum mechan।cs) के नियम का अनुपालन करने लगता हैं । इससे पूरा डॉट एक परमाणु के समान व्यवहार करने लगता है जिस वजह से इन्हें क्वांटम परमाणु भी कहा जाता है। ऐसी स्थिति में इन क्रिस्टलों में कई नए गुण विकसित हो जाते है।

इसे इस उदाहरण द्वारा भी समझा जा सकता है कि मेट्रो रेल यात्रा के दौरान हममें से कई लोगों को ऐसी भीड़ का सामना करना पड़ता है, जब जगह की अत्यधिक कमी के कारण हम रिंग होते अपने फोन को भी उठा पाने में सक्षम नहीं होते, तब ऐसी स्थिति में झुंझलाहट का होना स्वाभाविक होता है। यही स्थिति हमें क्वांटम डॉट्स के परमाणुओं के संदर्भ में भी देखने को मिलती है । अगर किसी पात्र में परमाणुओं को कम घनत्व में रखा जाए तो वे एक निश्चित रूप रेखा में व्यवहार करते हैं लेकिन यदि उन्हें एक साथ सघन रूप से पैक कर दिया जाए, जहाँ जगह का अभाव हो, तो उनका एक नया और अलग व्यवहार देखने को मिलता है जो ‘क्वांटम डॉट्स’ कहलाते हैं ।

एलेक्सी आई.एकिमोव, लुईस ई. ब्रूस और मौंगी जी. बावेंडी को इन्ही क्वांटम डॉट्स के उस व्यवहार की खोज एवं संश्लेषण हेतु रसायन विज्ञान के लिये 2023 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इन क्वांटम डॉट्स की एक और विशेषता है, यदि इन क्वांटम डॉट्स पर प्रकाश डाला जाये तो ये अपने आधार पर उस प्रकाश को एक अलग आवृति (या रंग) पर पुनः अवशोषित या पुनः उत्सर्जित करने लगते हैं । छोटे डॉट्स उच्च आवृति (नीला रंग) और बड़े डॉट्स निम्न आवृति (लाल रंग) का प्रकाश उत्सर्जित करते हैं । समान पदार्थों से बने अलग-अलग आकार के क्वांटम डॉट्स की प्रतिक्रिया भी भिन्न भिन्न होगी । इन कारणों से क्वांटम डॉट्स के ट्रांजिस्टर, लेज़र, मेडिकल इमेजिंग और क्वांटम कंप्यूटिंग के कई अनुप्रयोग देखने को मिलते हैं। इसके और भी कई महत्वपूर्ण अनुप्रयोग हैं जिन्हें निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है -

  • विद्धुत सिग्नलों को प्राप्त कर क्वांटम डॉट्स की श्रृंखला द्वारा विभिन्न रंगों वाली रौशनी के उत्सर्जन से LED टीवी स्क्रीन का निर्माण किया जा सकता है ।
  • मिश्रण में क्वांटम डॉट्स के प्रयोग से रासायनिक प्रतिक्रिया को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • क्वांटम डॉट्स से निर्मित सौर सेल्स की थर्मोडाईनेमिक क्षमता 66 प्रतिशत तक बढ़ जाती है ।
  • सर्जरी के दौरान एक ट्यूमर को सटीकता से हटाने में क्वांटम डॉट्स महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • क्वांटम डॉट्स जल से हाइड्रोजन को अलग करने वाली प्रतिक्रियाओं में तेजी ला सकता है ।
  • टेलीकम्यूनिकेशन में क्वांटम डॉट्स मल्टीप्लेक्स़र की भूमिका निभा सकता है।

यहाँ इन छोटे-छोटे पार्टिकल्स के बड़े-बड़े कारनामे देख सहज ही कबीर जी का एक विख्यात दोहा याद आता है,जो इस दुनिया में छोटी वस्तुओं के महत्त्व और उनकी उपयोगिता को दर्शाता है-

चींटी लै सक्कर चली, हाथी के सर धूरी
लघुता ते प्रभुता मिले, प्रभुता ते प्रभु दूरी

और बात भी कितनी सही है कि आकार और पद के द्वारा किसी की काबलियत निर्धारित नहीं की जा सकती। चींटी भले ही आकार में छोटी होती है लेकिन विनम्रता के कारण उसे शक्कर मिलता है और हाथी को उसके अहंकार के कारण धूल। हमारे नैनो पार्टिकल्स भी अपनी इन्हीं खूबियों के कारण आज तकनीक के क्षेत्र में सर्वोपरि स्थान पाए हुए हैं ।

हालांकि नैनो टेक्नोलॉजी की इतनी अधिक खूबियों को देखते हुए यह भी जानना आवश्यक कि हमारे देश में सरकार द्वारा इस असीम संभावनाओं वाले क्षेत्र में क्या प्रयास किये जा रहे हैं और हमारे देश में इस प्रौद्योगिकी की स्थिति क्या है। देखा जाए तो नैनो टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता से भारत के पास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का अच्छा उपयोग हो सकता है और रक्षा एवं आतंकवाद विरोधी क्षेत्रों में भी भारत को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिल सकती है। इसी को देखते हुए वर्ष 2001 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तत्वाधान में ‘नेशनल नैनोसाइंस एंड नैनोटेक्नोलॉजी इनिशिएटिव (NST।)’ लांच किया गया था, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र में अनुसन्धान हेतु बुनियादी ढांचे के निर्माण को बढ़ावा देना था। वर्ष 2007 में इस क्षेत्र से जुड़े पहलुओं को बढ़ावा देने के लिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा नैनो मिशन की शुरुआत की गयी। भारत द्वारा किये गए प्रयासों के कारण ही भारत में प्रकाशित पेपर्स की संख्या और पेटेंट आवेदनों में भी वृद्धि देखी गयी जो स्पष्ट रूप से नैनो मिशन पहल की ओर संकेत करता है। इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Me।tY) द्वारा देश में नैनोइलेक्ट्रॉनिक्स अनुसन्धान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिये कई पहल किये गए हैं, जिसके तहत देश के प्रमुख संस्थानों में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के प्रमुख नैनोइलेक्ट्रानिक्स केंद्र स्थापित किये गए ।

देखा जाए तो नैनो प्रोद्योगिकी में भारत के लिये काफी संभावनाएं हैं लेकिन एक बहुआयामी दृष्टिकोण को अपनाकर ही इसका महत्तम लाभ उठाया जा सकता है,जिसके तहत -

  • इस क्षेत्र की फंडिंग में वृद्धि करते हुए दीर्घकालीन निधियन पर ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि उच्च प्रभाव वाले अनुसन्धान कार्यक्रमों को समायोजित किया जा सके।
  • पूरे भारत में विभिन्न अनुसन्धान केन्द्रों को मिलकर काम करना चाहिए ताकि इन सामूहिक प्रयासों का बेहतर परिणाम मिल सके।
  • नई परियोजनाओं के प्रशासनिक पहलुओं को व्यवस्थित करने की आवश्यकता है।
  • इन अनुसन्धान सुविधाओं में शामिल होने के लिये उच्च क्षमता वाले कार्यबल को आकर्षित करने हेतु इस क्षेत्र के प्रशिक्षित लोगों के पारिश्रमिक में वृद्धि आवश्यक है।
  • नैनोटेक्नोलॉजी में अपार संभावनाओं के बावजूद अनुसन्धान में निजी क्षेत्र का निवेश संबंधी योगदान कम रहा है, जिसे बढाने की आवश्यकता है

भारत में प्राकृतिक संसाधनों, स्वच्छ जल, खाद्य सुरक्षा और कम लागत वाली डायनोस्टिक मशीनरी की बढ़ती मांग को पूरा करने की दिशा में नैनो टेक्नोलॉजी उपयोगी सिद्ध हो सकता है और इस दिशा में हो रहे विकास में सुधार की भी काफी गुंजाइश है लेकिन भारत द्वारा नैनोतकनीकी अनुसंधान पर जो व्यय किया जाता है, वह अभी भी जापान, अमेरिका, फ़्रांस और चीन जैसे देशों के अनुसंधान खर्च का मात्र एक अंश है। यद्यपि लोग नैनो विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बहुत सकारात्मक रूप में देखते है लेकिन इस क्षेत्र में स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी करने वाले छात्रों की संख्या अभी भी बहुत कम है और साथ ही कैरियर की संभावनाएं अभी बेहद सीमित हैं, जिसे तत्काल संबोधित किये जाने की आवश्यकता है।

नैनो टेक्नोलॉजी हमारे जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित करती है, जिसमें विभिन्न सामग्री और विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी, चिकित्सा और स्वास्थ्य,पर्यावरण और ऊर्जा भंडारण, रासायनिक और जैविक प्रौद्योगिकी एवं कृषि शामिल है। वैश्विक स्तर पर उन धारणीय प्रणालियों के विकास की मांग की जा रही है, जो तकनीकी रूप से ज्यादा बेहतर हैं। यह 21वीं सदी के ज्ञान समाज का नया आयाम है, जहाँ विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण को साथ-साथ चलना होगा । इस प्रकार नए युग का मॉडल चार आयामों यथा जैव-नैनो-सूचना-पर्यावरण पर आधारित होगा। हालांकि सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों में पहले ही विकास देखा जा चुका है और अब नैनो टेक्नोलॉजी को भविष्य का क्षेत्र माना जा रहा है जो चिकित्सा, इलेक्ट्रानिक्स और पदार्थ विज्ञान के क्षेत्र में असीम अनुप्रयोग क्षमता के कारण माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और कई क्षेत्रों का स्थान ले सकता है ।

चूँकि भारत के पास प्रचुर मात्रा में कुशल कार्यबल है इसलिए वह नैनो टेक्नोलॉजी में वैश्विक नेता बनने का लक्ष्य रख सकता है। इन नवीनतम आधुनिक तकनीक की सहायता से हम भारत की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र के रूप में कर सकते हैं, जिसमें शहरी-ग्रामीण विभाजन कम हो, ऊर्जा और जल का समान वितरण और पहुँच हो, सर्वोत्तम स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता हो और जहाँ सामाजिक या आर्थिक भेदभाव के कारण किसी मेधावी छात्र को मूल्य प्रणाली वाली शिक्षा से वंचित न किया जाए तथा जहाँ गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ अपराध न हो।

हालांकि इससे प्राप्त होने वाले लाभों के साथ-साथ इसके जिम्मेदार कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये इसके उपयोग से जुड़ी चुनौतियों और नैतिक विचारों से निपटना भी आवश्यक है। यह तय करना होगा कि क्या मानव जाति के पास उसके स्वयं के कल्याण हेतु विज्ञान का उपयोग करने हेतु संतुलित बुद्धि हैं। आज के समय में प्रौद्योगिकी को नजरअंदाज करना संभव नहीं, लेकिन इसका लाभ उठाने के लिये इसका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। इस संबंध में उद्योग जगत का मानना है कि इस क्षेत्र के विनियमन को लेकर एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है ताकि स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों के विनियमन के साथ अन्य क्षेत्रों को विकास के लिये खुली छूट मिल सके। अंत में नैनो टेक्नोलॉजी की इतनी खूबियों और संभावनाओं को देखते हुए अब हम एक बात तो कह ही सकते हैं कि-

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर
‘देखन में छोटे लगै, घाव करे गंभीर

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