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माॅब लिंचिंग, विषाक्त होते समाज का लक्षण मात्र है

  • 25 Jun, 2020

सुबह 7 बजे भइया बचा लो, भइया बचा लो हाॅस्टल में एम के पास शोर के साथ नींद खुली तो देखा 4th ईयर के सीनियर्स की भीड़ किसी लड़के को पीट रही थी। हाॅस्टल में यह आम बात थी और चूंकि बात सिनियर छात्रों की थी तथा मैं 1st ईयर का छात्र था जिसकी रैगिंग अभी चल ही रही थी। मेरी हिम्मत नहीं हुई मैं जा के देखूँ कौन पिट रहा है, जैसे ही मैं मुड़कर अपने कमरे में जाने को हुआ आकर भीड़ से उछलकर अनिल मुझसे लिपट गया, गिड़गिड़ाते हुए बोला भइया बचा लीजिये ये लोग मार देंगे मुझे। मैंने कोई मोबाइल नहीं चुराया है, अनिल हमारा पेपर वाला जो घंटो मेरे एम के में बैठकर अपने गाँव- घर और परिवार की कहानियाँ सुनाया करता, आज भी मुझे वो दृश्य याद है, अनिल के डर को मैं महसूस कर सकता था वो मानो मुझे ऐसे देख रहा था मैं ही उसकी आखिरी उम्मीद हूँ न जाने कहाँ से मुझमें इतनी हिम्मत आई ओर मैं सीनियर-जूनियर भूलकर सीनियर्स से भिड़ गया यह देख मेरे दोनों पार्टनर और फिर पूरा 1st ईयर सीनियर्स पर टूट पड़ा। अपना पाला कमजोर होते देख सीनियर्स बाद में देख लेने की धमकी देते हुए पीछे हट गए।

 हाॅस्टल में पिछले कई दिनों से लैपटाप और मोबाइल चोरी हो रहे थे और पूरा हाॅस्टल चोर को पकड़ने के लिये सरलाक होम्स बना फिर रहा था। इसी बीच जब अनिल एक सीनियर के कमरे में पेपर देने गया तो उसके टेबल पर उस समय का नोकिया का लेटेस्ट मॉडल N70 मोबाइल चार्ज हो रहा था जिसे उसने उत्सुकता वश उठा लिया, जिस सीनियर का मोबाइल अनिल ने उठाया था वह सो रहा था पर उसका रूम पार्टनर प्रकाश जाग रहा था, जिसके सामने ही अनिल ने फोन उठाया था। परंतु अनिल के फोन उठाने के कुछ सेकेंड के बाद ही प्रकाश अनिल पर मोबाइल चोरी का आरोप लगाते हुए चिल्लाने लगा और अगल-बगल के एम के लोगाें को इकट्ठा कर के अनिल को पीटने लगा। इस घटना के कुछ दिन पश्चात् ही होली का समय था लोग घर जाने के लिये अपना टिकट करा रहे थे, तब अधिकतर रेलवे टिकट रेलवे काउंटर से ही होते थे, इसी बीच प्रकाश के पार्टनर का काउंटर टिकट चोरी हो गया। जिसे कैंसिल करा कर पैसे लेते हुए टिकट कराने रेलवे स्टेशन गए कुछ और सीनियर्स ने प्रकाश को घेर लिया और अच्छी कुटाई के बाद हाॅस्टल में होने वाली चोरियों के पीछे उसी के हाथ होने की बात भी कुबूल करवाई।

आज जब पालघर की घटना के वीडियो देखा जिसमें अपनी जान बचाने के लिये एक सत्तर साल का बुर्जुग पुलिस वाले के पीछे छिपने की कोशिश कर रहा था तो बेबस अनिल की याद आ गई, बुर्जुग की रक्षा करना उसकी ज़िम्मेदारी थी उसने उसे उस क्रूर भीड़ में छोड़ दिया हो सकता है परिस्थितियाँ और भयानक हो जिसके लिये पुलिस वाले ने अपनी जान बचाने के लिये ऐसा किया हो लेकिन अवजाव लोगों के प्रति इतनी घृणा लोगों में क्यों आई।

हाॅस्टल की वो घटना एवं उसके बाद के मेरे अनुभव बताते हैं। हर बार इस प्रकार की हिंसक घटनाओं के लिये लोगों को प्रेरित किया जाता है जिसमें कुछ लोगों के निहित स्वार्थ होते हैं। परंतु इसके लिये उन्हें बहुत प्रयास नहीं करना पड़ता क्योंकि हमारे समाज का कुछ हिस्सा इतना मूढ़ एवं विषाक्त हो चुका है जैसे कोई बारूद का ढेर जिसमें केवल माचिस की तिल्ली भर लगानी है और आग अपने आप भड़क जाएगी।

यूरोप में 19वीं शताब्दी के मध्य तक समाज के प्रभावशाली लोगों के स्वार्थ पूर्ति के लिये लोगों में विधर्मी, डायन जैसी अफवाहें फैलाकर भीड़ द्वारा जला कर मार दिया जाता था और इसका शिकार केवल जनसामान्य ही नहीं बल्कि यूरोप की प्रगतिशीलता की नींव रखने वाले वैज्ञानिक एवं दार्शनिक भी हुए है। वैसे ही आज हमारा समाज अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता खोता जा रहा है।

इस जड़ता मूल में हम देखें तो सोशल मीडिया की भूमिका सर्वाधिक विध्वंशकारी है जिसने हमारी तार्किकता को कुंद कर दिया है और असुरक्षा की भावना को इतना गहरा बना दिया है की जाति-धर्म जैसे सामान्य पहचान के बिंदु में हम स्वयं के जानलेवा दुश्मन को ढूँढ लेते हैं और स्वयं को भीड़ में धकेल कर आक्रामकता की सारी हदें पार कर जाते हैं।

महाराष्ट्र के पालघर जैसी मॉबलिचिंग की घटनाएँ अकस्मात् घटने वाली कोई दुर्घटनाएँ नहीं है इनकी भूमिकाएँ स्वार्थी तत्त्वों द्वारा चाहे अनचाहे पहले ही लिखी जाती हैं। इन हृदय विदारक घटनाओं को रोकने के लिये हमे इसकी जड़ों पर आघात करना होगा नहीं तो यह क्रम कभी नहीं रुकेगा बस जगह और नाम बदलते रहेंगे और शासन-प्रशासन की जवाबदेही तय करने के साथ हमें व्यक्तिगत के रूप में स्वयं की जबावदेही भी तय करनी होगी हमें सोचना होगा की इस विषाक्त होते समाज में सौहार्द लाने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है, घृणा प्रसार, प्रोपगेंडा का उपकरण बनने से अपने आप को रोकना होगा, भीड़ हिंसा करने वाले लोग कोई आकाशगंगा से नहीं आते ये हमारे अपने बीच के लोग हैं यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उन्हें किसी भी हिंसक भीड़ का हिस्सा होने से रोकें।

[अरविंद सिंह]

(लेखक समसामयिक, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों एवं आर्थिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के साथ आर्थिक इकाई के रूप में मानव व्यवहार के अध्ययन में गहरी रुचि रखते हैं।)

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