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हरिवंश राय बच्चन

"स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुँचा देता मधुशाला।"


हरिवंश राय बच्चन अपने काव्य संग्रह मधुशाला के परिशिष्ट में उन लोगों की जिज्ञासा का जवाब देते है जो ये मानते हैं कि वो भी मदिराप्रेमी हैं। ये पंक्तियाँ एक कवि के रूप में उनके तेवर को बखूबी दर्शाती है। बच्चन जी ने जिस दौर में कविता लिखना शुरू किया था, वो छायावादी कविता का युग था। इस दौर की कविताएँ अतिशय सुकुमार्य और माधुर्य से परिपूर्ण थी। इन कविताओं की अतीन्द्रिय और अति वैयक्तिक सूक्ष्मता से और इसकी लक्षणात्मक अभिव्यंजनात्मक शैली से हरिवंश राय बच्चन उकता गए थे।

बच्चन जी को उर्दू की गज़लें लुभाती थी। दरअसल इन गज़लों में चमक और लचक थी जो सीधे पाठक के हृदय को स्पर्श करती थी। इस समय देश में स्वतंत्रता आंदोलन भी जोरों पर था। अंग्रेजो के अत्याचारी शासन से देश में अवसाद और खिन्नता पसरी हुई थी। इसी दौर में बच्चन साहब ने छायावाद की लाक्षणिक वक्रता से परे संवेदनासिक्त अभिधा के माध्यम से काव्यात्मक प्रस्तुति दी। उनकी कविताओं में जहाँ एक तरफ गेयता है तो दूसरी तरफ इसकी भाषा एकदम सहज और जीवंत है जो पाठकों को बरबस अपना बना लेती है। उनके इस प्रयोग को हिंदी काव्यप्रेमियों ने भी खूब सराहा। देखते ही देखते हरिवंश राय बच्चन लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गए।

आत्म अनुभूति को ही काव्य का आधार बनाने वाले हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की रानीगंज तहसील के बाबू पट्टी गाँव मे प्रताप नारायण श्रीवास्तव एवं सरस्वती देवी के यहाँ हुआ था। हरिवंश राय श्रीवास्तव को बचपन में उनके घर वाले 'बच्चन' उपनाम से बुलाते थे। आगे चलकर यही बच्चन उपनाम उनके मूल नाम के साथ जुड़ गया।

हरिवंश राय बच्चन ने शुरूआती शिक्षा गाँव की ही पाठशाला से ग्रहण करने के बाद उच्च शिक्षा हेतु तत्कालीन इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) को प्रस्थान किया। यहाँ पर उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। इसी विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में परास्नातक करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन चले गए। यहाँ पर उन्होंने अंग्रेजी साहित्य के नामी गिरामी कवियों की कविताओं का सांगोपांग किया।

महान अंग्रेजी साहित्यकार डब्लू बी यीट्स की रचनाओं पर उन्होंने शोध कार्य भी किया। इसी शोध कार्य पर उन्होंने अपनी पीएचडी को भी पूरा किया। इस दौरान वे अध्यापन कार्य और कविताओं का लेखन भी कर रहे थे। वर्ष 1941 और वर्ष 1952 के मध्य की अवधि में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य भी किया। इसके साथ ही उन्होंने विदेश मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत हिंदी विभाग में भी कार्य किया। वर्ष 1966 में उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया।

अगर हरिवंश राय बच्चन की काव्य यात्रा पर प्रकाश डालें तो उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण कृति है- मधुशाला। वर्ष 1935 में प्रकाशित मधुशाला ने बच्चन जी की लोकप्रियता में चार चाँद लगा दिए। उन्होंने एक ऐसे विषय पर कविता लिखने का साहस किया जिस पर आम आदमी बातें करने से भी कतराता है। सियासी गहमागहमी के इस दौर में मधुशाला की ये काव्य पंक्तियाँ बेहद मानीखेज है-

"मुसलमान औ' हिन्दू हैं दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!"

मधुशाला के सहज शिल्प की प्रेरणा उन्हें उमर खय्याम की रूबाइयों से मिली। हरिवंश राय बच्चन के पुत्र और हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की मधुशाला के संदर्भ में दी गई ये टिप्पणी भी इस रचना की प्रासंगिकता को बताती है-

"मेरा मानना है कि पूरी ‘मधुशाला’ सिर्फ मदिरा के बारे में नहीं, अपितु जीवन के बारे में भी महीन व्याख्या करती है।"

हरिवंश राय बच्चन के 'मधुबाला', 'मधुशाला' और 'मधुकलश' नाम से तीन काव्य संग्रह शीघ्र ही प्रकाशित हुए। हिन्दी साहित्य में इसे कहा गया है। हालांकि इस काव्य पद्धति के एकमात्र कवि हरिवंश राय बच्चन ही है क्योंकि उनकी भाँति सार्वजनीनता, आत्मक्रेन्दीयता को काव्य में लाना बेहद जटिल कार्य है।

दरअसल बच्चन जी का काव्य स्वतः स्फूर्त और नितांत वैयक्तिक है। उन्होंने जीवन की सारी नीरसताओं को स्वीकार करते हुए भी उससे मुँह न मोड़ा है बल्कि अपनी काव्य साधना के माध्यम से ये प्रयास किया है कि वे इसी नीरसता में सरसता की खोज कर लें। उनका मानना था कि एक मनुष्य के नीरस जीवन मे भी कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं जो उसे आनंद का अनुभव कराते हैं। अपने काव्य में वे इन्हीं तत्त्वों को खोजते भी हैं।

हरिवंश राय बच्चन के निजी जीवन में घटी घटनाओं ने ही समआनंदभाव को उनके व्यक्तित्व का प्रमुख आयाम बनाया है। वर्ष 1926 में उनका विवाह श्यामा देवी के साथ हो जाता है। वैवाहिक जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती, इससे पूर्व ही उनकी पत्नी को क्षय रोग हो जाता है। अंततः वर्ष 1936 में लंबी बीमारी के कारण श्यामा देवी का निधन हो जाता है।

यह घटना बच्चन जी को अंदर तक हिला कर रख देती है। अपने भोगे हुए यथार्थ को वो काव्यात्मक प्रस्तुति देते हैं और वर्ष 1939 में 'एकांत संगीत' नाम से उनका काव्य संग्रह प्रकाशित होता है। हरिवंश राय बच्चन के भीतर की पीड़ा को उनकी इन पंक्तियों के माध्यम से समझा भी जा सकता है-

"संघर्ष में टूटा हुआ,
दुर्भाग्य से लूटा हुआ,
परिवार से छूटा हुआ, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं !

भटका हुआ संसार में,
अकुशल जगत व्यवहार में,
असफल सभी व्यापार में, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं !

खोया सभी विश्वास है,
भूला सभी उल्लास है,
कुछ खोजती हर साँस है, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं !"

इस काव्य संग्रह के प्रकाशित होने के दो वर्ष बाद यानी साल 1941 में हरिवंश राय बच्चन, तेजी सूरी से विवाह करते हैं। तेजी सूरी की रंगमंच और गायन में बेहद रूचि थी। हरिवंश राय बच्चन को अपने जीवन के संघर्ष का एक ओर साथी मिल जाता है। जिंदगी के रपटीले रास्ते अब सहज प्रतीत होने लगते हैं। इसी दौर में वे 'नीड़ का निर्माण फिर-फिर' की रचना करते हैं-

"नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!"

हरिवंश राय बच्चन को 'दो चट्टानें' काव्य संग्रह के लिए वर्ष 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। बच्चन जी ने इस काव्य संग्रह में मानव मन की सोई हुई चेतना को जाग्रत करने का प्रयास किया है। इस काव्य संग्रह की पंक्तियाँ युवाओं को सन्मार्ग दिखाती है-

"क्‍यों कि जीना और मरना
एकता ही जानती है,
वह बिभाजन संतुलन का
भेद भी पहचानती है।"

बच्चन जी को उनकी आत्मकथा 'क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं' हेतु के.के बिड़ला फाउंडेशन के द्वारा दिये जाने वाले सरस्वती सम्मान से भी पुरस्कृत किया गया है। इस काव्य संग्रह की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत है-

"अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी घड़ियों को किन-किन से आबाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

याद सुखों की आँसू लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

दोनो करके पछताता हूँ,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूँ,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!"

हरिवंश राय बच्चन की कविताओं की लोकप्रियता का प्रमुख कारण इनकी गेयता है। इसके साथ ही बच्चन जी ने सामान्य बोलचाल की भाषा को काव्य की भाषा बनाया। उन्होंने कवि सम्मेलन की परंपरा को लोकप्रिय बनाया। श्रोताओं के साथ उनके सहज जुड़ाव ने भी एक कवि के रूप में उनकी पहचान को और प्रासंगिक बनाया।

2003 में 18 जनवरी को हरिवंश राय बच्चन ने अंतिम सांस ली। उनके निधन के कुछ वर्षों बाद अमिताभ बच्चन ने अपने पिता की कुछ मनपसंद कविताओं का चुनाव किया और इन्हीं कविताओं को भारतीय ज्ञानपीठ ने 'कविताएँ बच्चन की चयन अमिताभ बच्चन का' नाम से प्रकाशित किया है। इसी पुस्तक में अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताओं के स्वयं से जुड़ाव के संबंध में एक टिप्पणी करते हैं -

''मैं यह नहीं कह सकता कि मुझे उनकी सभी कविताएँ पूरी तरह समझ में आ जाती हैं। पर यह जरूर है कि उस वातावरण में रहते-रहते, उनकी कवितायेँ बार-बार सुनते-सुनते, उनकी जो धुनें हैं, उनके जो बोल हैं, वह अब जब भी पढ़ता हूँ तो बिना किसी कष्ट के ऐसा लगता है की यह मैं सदियों से सुनता आ रहा हूँ, और मुझे उस कविता की धुन गाने या बोलने में कोई तकलीफ़ नहीं होती। मैंने कभी बैठकर उनकी कविताएँ रटी नहीं हैं। वह तो ऑटोमैटिक मेरे अंदर से निकल पड़ती हैं।''

  संकर्षण शुक्ला  

संकर्षण शुक्ला उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले से हैं। इन्होने स्नातक की पढ़ाई अपने गृह जनपद से ही की है। इसके बाद बीबीएयू लखनऊ से जनसंचार एवं पत्रकारिता में परास्नातक किया है। आजकल वे सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के साथ ही विभिन्न वेबसाइटों के लिए ब्लॉग और पत्र-पत्रिकाओं में किताब की समीक्षा लिखते हैं।

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