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शिक्षा, शिक्षक एवं समाज : एक पुनर्दृष्टि

सितंबर माह शिक्षक समुदाय के लिए विशेष है क्योंकि प्रत्येक वर्ष भारत के पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस यानी 5 सितंबर को ‛शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है जिसकी शुरुआत सन् 1962 से हुई। दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग तारीखों पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। सन् 1994 से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। यह शिक्षकों की स्थिति से संबंधित 1966 की अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन/यूनेस्को की अनुशंसा को अपनाने की वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

यह शिक्षक दिवस विशेष है, क्योंकि ‛शिक्षक पर्व’ 2022 के लिए, यूजीसी ने सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को 5 से 9 सितंबर के बीच कार्यक्रमों के आयोजन हेतु एक अधिसूचना जारी की है। आयोग ने अधिसूचना में लिखा है कि “शिक्षक पर्व मनाने के पीछे का विचार युवा दिमाग और राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका तथा शिक्षण पेशे की गरिमा और शिक्षकों के योगदान को स्वीकार करना है।”

किसी भी समाज के निर्माण में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण होती है जैसा कि चाणक्य ने स्पष्ट कहा है “शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।” समाज में शिक्षक की महत्वता को रेखांकित करते हुए डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखा है कि “समाज में अध्यापक का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बौद्धिक परम्पराएँ और तकनीकी कौशल पहुंचाने का केंद्र है और सभ्यता के प्रकाश को प्रज्वलित रखने में सहायता देता है।” कोठारी आयोग ने भी अध्यापकों को ‛राष्ट्र-निर्माता’ की संज्ञा दी है।

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है इसलिए आज हमारे समक्ष कई प्रश्न हैं कि आखिरकार कैसी शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए जो हमारे समाज के अनुकूल हो? बदलते परिवेश में शिक्षक की क्या भूमिका है? विविधता और असमानता वाले भारतीय समाज में शिक्षा व्यवस्था को कैसे समावेशी बनाया जाए?

भारतीय समाज और शिक्षा-

भारतीय समाज में विविधताएँ हैं इसलिए भारतीय समाज और संस्कृति को समझने के लिए एक अंतर्दृष्टि की आवश्यकता पड़ती है। भारत के शैक्षणिक इतिहास को जानने के लिए इसके सांस्कृतिक प्रवाह को समझना होगा क्योंकि शिक्षा और समाज का शाश्वत संबंध रहा है। सभ्यता की शुरुआत से ही धर्म-दर्शन तथा शिक्षा भारतीय समाज का आधार रहा है। वैदिक काल से ही भारत शैक्षणिक स्तर पर समृद्ध रहा है। वेदों में शिक्षकों के गुण एवं कर्त्तव्य, शिष्य के गुण तथा कर्त्तव्य, शिक्षक और शिष्य का संबंध, शिक्षा की विधि, शिक्षण की विधि, शिक्षा सत्र तथा शिक्षा के विषय आदि पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। वैदिक काल से उपनिवेशीकरण के पूर्व तक भारत में अनौपचारिक शिक्षा प्रणाली प्रचलित रही है। गुरुकुल आधारित शिक्षा प्रणाली भारतीय परंपरा का प्रमुख अंग है। नालंदा और तक्षशिला की स्थापना तथा इसके प्रभाव से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की समृद्ध परंपरा को जाना जा सकता है। बौद्ध और जैन धर्म ने परंपरागत भारतीय शिक्षा प्रणाली में बदलाव किया, लेकिन यह स्पष्ट है कि प्राचीन शिक्षा प्रणाली धर्म पर आधारित थी। मध्यकालीन भारतीय समाज में शिक्षा प्रदान करने का प्रमुख माध्यम मदरसा रहा।

हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश ढांचे पर आधारित है। पुनर्जागरण और धर्म सुधार के बाद से ही ब्रिटिश प्रणाली पश्चिम के व्यक्तिवादी और उदारवादी मूल्यों से जुड़ी है इसलिए इसकी संरचना औपचारिक है। उपनिवेशवाद के दौर में भारत में औपचारिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत हुई। भारत में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना इसी ब्रिटिश प्रणाली के अनुरूप हुई। ब्रिटिश काल के दौरान विभिन्न प्रकार के आयोगों ने पूरे औपनिवेशिक काल में भारतीय शिक्षा प्रणाली की नींव रखी, जिसमें मैकाले मिनट, वुड डिस्पैच, सैडलर आयोग और 1904 की भारतीय शिक्षा नीति शामिल है। ब्रिटिश काल में शिक्षा प्रणाली की संरचना ब्रिटिश शासन के हितों को साधने वाली थी। 1835 में मैकाले के कथन से ही ब्रिटिश शिक्षा नीति का औपनिवेशिक चरित्र स्पष्ट होता है। उसने कहा, “हमें एक ऐसा वर्ग पैदा करना चाहिए जो हमारे और करोड़ों लोगों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिये (interpreter) का काम कर सके- ऐसे व्यक्तियों का वर्ग जो रंग और रक्त से भारतीय हो, किन्तु रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज़ हो।”

स्वतंत्र भारत ने सभी स्तरों पर शिक्षा में बहुआयामी विकास किया लेकिन गुणात्मक विकास की बजाय परिमाणात्मक विकास ज्यादा हुआ। शिक्षा का स्वरूप आमतौर पर उपनिवेशवादी ही रहा। यदि वर्तमान में हम पुनर्विलोकन करें तो इसमें क्रमिक रूप से बदलाव देखने को मिलता है। स्वतंत्रता के पश्चात 1948-49 में राधाकृष्णन ने विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (University Education Commission – UEC) का गठन किया। इसने स्वतंत्र भारत की शिक्षा प्रणाली को नवगठित संप्रभु राष्ट्र की जरूरतों और आकांक्षाओं के अनुकूल बनाने पर जोर दिया।

कोठारी आयोग के माध्यम से भारतीय शिक्षा प्रणाली की स्थापना हुई थी। इस समिति के परिणामों ने 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मार्ग प्रशस्त किया, जिसने भारतीय शिक्षा प्रणाली के भविष्य के विकास की नींव रखी। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Policy on Education, 1968) ने सांस्कृतिक और आर्थिक विकास के साथ-साथ राष्ट्रीय एकीकरण में सुधार के लिए “दृढ़तापूर्वक सुधार” और शैक्षिक अवसरों के बराबरी का आह्वान किया।

1985 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy of 1985) का मिशन शिक्षा में असमानताओं को दूर करना और समाज के सभी सदस्यों, विशेषकर हाशिए पर रहने वालों को समान शैक्षिक अवसर देना था। देश भर में प्राथमिक विद्यालयों को बेहतर बनाने के लिए “ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड (Operation Blackboard)” शुरू किया गया। इस शिक्षा नीति के द्वारा ही इग्नू (IGNOU) की स्थापना भी हुई। वर्ष 1992 में शिक्षा नीति, 1986 में संशोधन किया गया जिसके माध्यम से हमारी विस्तृत युवा आबादी की समकालीन जरूरतों और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक बदलाव किए गए।

स्वतंत्र भारत के संविधान में शिक्षा व्यवस्था से संबंधित विशिष्ट प्रावधान किए गए। संवैधानिक प्रावधानों के आलोक में ही 86वें संविधान संशोधन 2002 के माध्यम से निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार (अनु.21A) तथा नीति निर्देशक तत्व (अनु.45A) में शामिल किया गया। इन्हीं संवैधानिक प्रावधानों को मूर्त रूप देने के लिए सरकार ने निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 को पारित किया। अनिवार्य शिक्षा से तात्पर्य है कि यह राज्य का दायित्व है कि वह 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करे और उनकी अनिवार्य प्रवेश, उपस्थिति एवं प्रारंभिक शिक्षा को पूरा करना सुनिश्चित करे। उपरोक्त प्रावधानों की वजह से ही सर्व शिक्षा अभियान, 2001 जैसे कार्यक्रम का तेजी से विस्तार हुआ और सकारात्मक परिणाम सामने आए।

टी.एस.आर. सुब्रह्मण्यम और कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट ने भारत के लिए एक नई शिक्षा नीति तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। सुब्रह्मण्यम समिति ने मई 2016 में सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी। इसने सुझाव दिया कि सरकार को भारत की शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए कई सुधार और नवीन पहल करने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 द्वारा भारत की शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन किया गया। इसका उद्देश्य 21 वीं सदी के अनुकूल भारतीय शिक्षा व्यवस्था की संरचना को विकसित करना है। इसका प्रमुख उद्देश्य बच्चों को सिर्फ साक्षर नहीं बनाना है बल्कि उनमें सामाजिक और भावनात्मक कौशल का समुचित विकास करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 2030 तक स्कूली शिक्षा के सर्वव्यापीकरण का लक्ष्य रखा गया है। इसमें पाठ्यक्रम की संरचना के साथ-साथ अध्यापन के तौर तरीकों और आकलन व्यवस्था में भी बदलाव को इंगित किया गया है। यह एक वृहद दस्तावेज है जिस पर विमर्श जारी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर यह आरोप भी है कि संसाधनहीनता की स्थिति में हम कैसे अपने शैक्षणिक ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन ला सकते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रस्तावित सुधार केवल संघीय और राज्य सरकारों के बीच साझेदारी से ही लागू किए जा सकते हैं क्योंकि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है इसलिए भविष्य में, सहकारी संघवाद आवश्यक होगा।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समक्ष चुनौतियाँ

वैश्वीकरण के इस दौर में हमारा समाज एक अज्ञात भविष्य की ओर अग्रसर दिखाई देता है। बढ़ती जनसंख्या और सीमित संसाधनों के साथ हमारे देश को नई समस्याओं का सामना करना है। भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें ऐसे ज्ञान और दक्षता की आवश्यकता होगी जो हमारी समस्या समाधान में योगदान कर सके।

वर्तमान में भारत में 1000 से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं जिनमें 54 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 416 राज्य विश्वविद्यालय, 125 डीम्ड यूनिवर्सिटी, 361 निजी विश्वविद्यालय, 159 राष्ट्रीय महत्व के शोध संस्थान जिनमें अनेक आइआइटी एवं आइआइएम शामिल हैं। उपरोक्त संस्थानों से यदि कॉलेजों की संख्या को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या लाखों में पहुंचती है। लेकिन इतने शैक्षणिक और शोध संस्थानों तथा मानव संसाधन की प्रचुरता के बावजूद भारत में अभी ‛ज्ञान संस्कृति’ का विकास और विस्तार तीव्र गति से नहीं हो पाया है। हमारी बौद्धिक संपदा का व्यवहारिक उपयोग भी नाकाफी है। आज ‛ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) भारत की एक बड़ी समस्या है। 2011 की जनगणना के अनुसार 26% से अधिक भारतीय अभी भी निरक्षर हैं जो कि बेहद डरावना आंकड़ा हैं क्योंकि एक राष्ट्र के रूप में हमारी महात्त्वकांक्षाएँ इससे ज्यादा की मांग करती है। कोरोना संकट ने भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समक्ष कई चुनौतियाँ उत्पन्न की। इस संकट से यह जाना जा सकता है कि हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था को कितना तकनीकी कुशल बनाने की जरूरत है। आज शिक्षण संस्थाओं की स्थापना तथा प्रबंधन एक लाभकारी उद्योग बन गए हैं; इससे शिक्षा का बाजारीकरण हुआ है।

निष्कर्ष- किसी भी राष्ट्र के लिए 75 वर्ष न तो बहुत कम होते हैं और न ही बहुत ज्यादा। पिछले 75 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में हमने ऐतिहासिक उपलब्धियां प्राप्त की हैं तो कई ऐसे प्रश्न हैं जो हमारी शिक्षा व्यवस्था के समक्ष गंभीर चुनौती हैं। वैश्वीकरण और बाजारीकरण के दौर में हमारी शिक्षा व्यवस्था को भारतीय समाज के अनुकूल बनाने की जरूरत है। वर्तमान समय में विद्यार्थियों के संदर्भ में एक शिक्षक की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण होती जा रही है क्योंकि उसे न केवल बच्चों का बौद्धिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक विकास करना है बल्कि सामाजिक, चारित्रिक, एवं सांवेगिक विकास भी करना है।

शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में आज महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर के विचार भी बेहद प्रासंगिक हैं। जहां गांधी के ‛सर्वोदयी समाज’ में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण स्थान था वहीं डॉ अंबेडकर शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बराबरी का महत्वपूर्ण हथियार मानते थे।

विमल कुमार

विमल कुमार, राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। अध्ययन-अध्यापन के साथ विमल विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में समसामयिक सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन और व्याख्यान के लिए चर्चित हैं। इनकी अभिरुचियाँ पढ़ना, लिखना और यात्राएं करना है।

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