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क्योंकि आर्थिक-आक्रामकता सैन्य-आक्रामकता से अधिक प्रभावी होती है।

  • 22 Jan, 2020

सीमाओं के विस्तार का जोखिमयुक्त अतिवादी रवैया आक्रामकता है। सीमाएँ हमारे इर्द-गिर्द अनगिनत रूपों और प्रकारों में मौजूद हैं। हमारा जीवन संघर्ष कुछ और नहीं बल्कि इन सीमाओं के अधिकतम अतिक्रमण का प्रयास ही है। आक्रामकता के आदिम-मूर्त प्रकारों में सैन्य आक्रामकता शेष सभी दृश्य आक्रामकताओं पर भारी रही है।

वस्तुतः विश्व का इतिहास सैन्य आक्रामकता के उदाहरणों से भरा पड़ा है। सैन्य आक्रामकता के कारण समय के साथ बदलते रहे हैं। सभ्यता की शुरुआत में जहाँ सैन्य आक्रामकता का प्रमुख उद्देश्य जल, ज़मीन और खाद्यान्नों पर नियंत्रण करना था, वहीं मध्य युग में सैन्य आक्रामकता का प्रयोग संसाधनों पर नियंत्रण के साथ-साथ धर्म प्रसार और मशहूर होने के लिये किया गया।

इस समय तक व्यापार और अर्थव्यवस्था यद्यपि उन्नत अवस्था में थी, पर यहाँ आर्थिक आक्रामकता के प्रमाण नहीं मिलते। वस्तुत: मध्यकाल तक सैन्य गतिविधियाँ प्रमुख थीं, जो आर्थिक गतिविधियों के विस्तार-क्षेत्र का निर्धारण करती थीं, पर यूरोप में पुनर्जागरण के बाद की दशाओं ने इस समीकरण को लगभग उलट दिया। महत्त्वाकांक्षी और जोखिम लेने वाले हज़ारों यूरोपीय व्यापारी समुद्री रास्तों से दुनिया के तमाम देशों में मुनाफा कमाने निकले और फिर दुनिया वैसी न रही। व्यापारिक गतिविधियाँ महत्त्वपूर्ण होने लगीं। इतनी महत्त्वपूर्ण कि सैन्य गतिविधियाँ अब उनके विस्तार का कारण नहीं, बल्कि प्रभाव और माध्यम बनने लगीं। आधुनिक भारत का इतिहास तो इसके उदाहरणों से पटा पड़ा है।

यद्यपि पहली मर्तबा हमें यह काल आर्थिक आक्रामकता का चरमकाल लग सकता है, पर वास्तव में यह शैशवकाल था। असल बात तो यह है कि आर्थिक आक्रामकता समय के साथ और प्रभावी ही हुई है। यद्यपि, समय के साथ इसने अपने सहयोगी बदले हैं, पर आज भी इसकी पुरानी सहायिका [सैन्य-आक्रामकता], पूरी विश्वसनीयता के साथ सहयोग हेतु तैयार ही रहती है। वस्तुत: आज भी आर्थिक आक्रामकता से हुआ लाभ सैन्य शक्ति का पोषण करता है और सैन्य आक्रामकता व्यापारिक आक्रामकता की संरक्षक है।

सरल शब्दों में समझें तो इन दोनों का संबंध साहूकार और लठैत का है, जबकि ‘कांस्पिरेंसी थ्योरी’ और वामपंथी रुझान के लोगों की व्याख्या के अनुसार सैन्य आक्रामकता आर्थिक आक्रामकता की महज़ संरक्षिका ही नहीं, उत्प्रेरक और एजेंट भी है।

इन सारी बातों के चलते हमें सैन्य आक्रामकता को कम आँकने की जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिये। भले ही सैन्य आक्रामकता का आर्थिक आक्रामकता के साथ घनिष्ठ संबंध है और काफी हद तक सैन्य आक्रामकता की नियंत्रक भी वही है, पर मुक्त अवस्था में सैन्य आक्रामकता की विभीषिका एवं प्रभाव की व्याख्या करने के लिये दो विश्वयुद्ध पर्याप्त हैं, जो राष्ट्रवाद के बहाने लड़े गए।

सैमुअल हंटिंगटन के सभ्यताओं के आपसी संघर्ष के सिद्धांत के अनुसार सभी सभ्यताएँ आपस में प्रतिद्वंद्वी हैं। आर्थिक आक्रामकता और सैन्य आक्रामकता इस द्वंद्व के दो प्रमुख हथियार हैं। वस्तुत: सैमुअल हंटिंगटन ने दुनिया भर की सभी संस्कृतियों को 9 प्रमुख भागों में बाँटा है और कहा है कि असल संघर्ष तो इन संस्कृतियों का एक-दूसरे पर हावी होने के लिये है। इस हिसाब से देखा जाए तो सभी सभ्यताओं का असल उद्देश्य वैश्वीकरण को अधिकाधिक अपने-अपने पक्ष में भुना लेना है। यदि इस सिद्धांत को महत्त्व दिया जाए तो वैश्वीकरण की सबसे करीबी सहयोगी आर्थिक आक्रामकता है। अब सैन्य आक्रामकता का महत्त्व यहाँ काफी कम हो गया है।

वैश्वीकरण और आर्थिक आक्रामकता की जुगलबंदी का एक अच्छा उदाहरण शीतयुद्ध के दिनों में विश्व भर में स्वतंत्रता के अमेरिकी प्रतीक नीली जींस के प्रति लोगों की दीवानगी है। उन दिनों विश्व की दोनों महाशक्तियों सोवियत संघ और अमेरिका के बीच अत्यधिक तनाव की स्थिति थी, लेकिन नीली जींस सोवियत संघ समेत विश्व भर के युवाओं में इस कदर लोकप्रिय हुई कि सोवियत संघ में भी इसकी जमकर स्मगलिंग की गई। राजधानी मॉस्को में खुला अमेरिकी रेस्तराँ मैक्डोनाल्ड उन दिनों सोवियत संस्कृति पर अमेरिकी संस्कृति के विजय का प्रतीक बना, जो काम गोली न कर सकी, बाज़ार ने कर दिखाया।

आर्थिक-आक्रामकता या उग्र-बाज़ारवाद और वैश्वीकरण में परस्पर सहजीविता का संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पोषक तो हैं ही, ज़रूरत पड़ने पर दोनों आपस में चोला भी बदलते हैं। वैश्वीकरण के नाम पर सक्षम देश अपनी कला एवं संस्कृति के सभी अवयवों का विश्व भर में निर्यात करते हैं। ये रेडियो सिग्नल भेजने की तरह हैं, जिसके रडार जितने सक्षम होंगे, उसके सिग्नल उतने ही प्रभावी होंगे और शेष अपनी-अपनी कमज़ोरी के अनुसार क्षीण होते जाएंगे। कला और संस्कृति का यह निर्यात एक दृष्टि से उग्र बाज़ारवाद की ज़मीन तैयार करता है। इस निर्यात के द्वारा देश अपने विचारों से शेष विश्व को प्रभावित और सहमत करने का प्रयास भी करते हैं।

अमेरिकी सुपर हीरो स्पाइडरमैन जब बुलंद आवाज़ में कहता है- ‘विद ग्रेट पावर, कम्स ग्रेट रिस्पॉन्सबिलिटी’ (बड़ी ताकत के साथ बड़ी ज़िम्मेदारी आती है) तब वो सिर्फ चरित्र की ही बात नहीं कर रहा होता, वो उस समय विश्व भर में फैली अमेरिकी दादागिरी को औचित्यपूर्ण साबित कर रहा होता है कि हाँ, अमेरिका सक्षम है, इसलिये उसे विश्व भर के मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिये। हम समझ भी नहीं पाते कि कब हम स्पाइडरमैन की इस बात से सहमत हो जाते हैं।

पर स्पाइडरमैन यहीं नहीं रुकता। वह अपनी फिल्मों में अमेरिकी राष्ट्रवाद की बातें करता है। अमेरिका को सबसे महान बताता है, जोकि अमेरिकी उत्पादों को विश्व भर में सम्मान और ऊँची कीमत दिलाने का एक सफल प्रयास भी है। इन उत्पादों में गीत-संगीत-मनोरंजन-भोजन और बैंक समेत लड़ाकू विमान तक शामिल हैं।

वास्तविकता तो यह है कि अब विश्व भर के सभी देश दरअसल ब्रांड और कंपनी बन चुके हैं, जो अलग-अलग उत्पादों के क्रेता, विक्रेता और उत्पादक हैं। अब सैन्य आक्रामकता भी दरअसल हथियारों के बाज़ार में आई (या लाई गई) तेज़ी का ही परिणाम है। डेटरेंस या शक्ति-संतुलन के फॉर्मूले के आधार पर आई ये तेज़ी दरअसल आर्थिक आक्रामकता का एक छोटा-सा उत्प्रेरक और संरक्षक भर है। ऐसे में स्पष्ट है कि आर्थिक आक्रामकता की तुलना में सैन्य आक्रामकता निश्चित रूप से कम प्रभावशाली है। फिर भी हमें किसी तरह की आक्रामकता को स्थायी रूप से कम नहीं आँकना चाहिये तथा उससे सावधान रहना ही चाहिये।

आखिर हम एक आक्रामक बंदूकधारी को एक महत्त्वाकांक्षी व्यापारी से कम कैसे आँक सकते हैं? चाहे वो बंदूकधारी उस व्यापारी की सुरक्षा के बदले उससे वेतन ही क्यों न लेता हो!

[हिमांशु सिंह]

Himanshu Singh

हिमांशु दृष्टि समूह के संपादक मंडल के सदस्य हैं। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और समसामयिक मुद्दों के साथ-साथ विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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