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कैंसर, एक असाध्य रोग जिसे हराया जा सकता है

कैंसर यानी कर्क रोग, किसी कोशिका के असामान्य तरीके से बढ़ने की बीमारी है। सामान्यतः हमारे शरीर की कोशिकाएं नियंत्रित तरीके से बढ़ती हैं और विभाजित होती हैं। जब सामान्य कोशिकाओं को हानि पहुँचती है या कोशिकाएं पुरानी हो जाती हैं, तो वे नष्ट हो जाती हैं और इन कोशिकाओं की जगह स्वस्थ कोशिकाओं द्वारा ले ली जाती है। कैंसर की अवस्था में कोशिकाओं के विकास को नियंत्रित करने वाले संकेत ठीक से काम नहीं करते हैं, फलतः कैंसर कोशिकाएं घातांकीय रूप में बढ़ती जाती हैं। इससे शरीर का सामान्य रासायनिक संतुलन बिगड़ जाता है और शरीर को कई जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। यदि प्रारंभिक अवस्था मे इसकी जानकारी नहीं मिल पाती तो ज्यादातर मामलों में कैंसर जानलेवा भी होता है।

इस बीमारी की भयावहता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि भारत में गैर संचारी बीमारियों के कारण होने वाली मौतों में 'दिल के दौरे' के बाद कैंसर ही दूसरा बड़ा कारक है। फिलवक्त इसका सबसे प्रभावी इलाज यही है कि समय रहते इसकी पहचान हो जाए। इसी उद्देश्य से प्रतिवर्ष 4 फरवरी को विश्व कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाता है। भारत मे राष्ट्रीय स्तर पर भी 7 नवंबर को राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाता है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल, 2019 के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2017 की तुलना में वर्ष 2018 में 324 फीसदी अधिक कैंसर के मामले सामने आए हैं। इनमें सबसे ज्यादा मुख के कैंसर, सर्वाइकल कैंसर और ब्रेस्ट कैंसर के मरीज हैं। गैर संचारी बीमारी संबंधी क्लीनिक में वर्ष 2018 में 2.5 करोड़ कैंसर के मामले की स्क्रीनिंग हुई। इनमें से 1 लाख 60 हजार लोगों में कैंसर की पुष्टि हुई। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल,2019 की रिपोर्ट ये भी बताती है कि वर्ष 2025 में, साल 2014 की तुलना में 5 गुणा अधिक कैंसर के मरीज होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2018 में कैंसर के कारण विश्व भर में 9.6 मिलियन मौतें हुई। इनमें से भी 8.17 फीसदी मौतें अकेले भारत मे ही हुई हैं। इतना ही नहीं यहाँ पर कैंसर की औसत उम्र में भी गिरावट आई है। विकसित देशों मे जहाँ यह आंकड़ा 50-60 वर्ष है वहीं भारत में यह महज 30-50 वर्ष ही है।

मोटे तौर पर कैंसर को 100 से अधिक प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। तम्बाकू और धूम्रपान के उत्पादों पर कैंसर संबंधी चेतावनी के लिखे होने के बावजूद भी पिछले 7 साल में मुख के कैंसर के मामलों में 114 फीसदी तेजी आई है। यदि मुख के कैंसर की बात करें तो यह मुख और इससे सम्बद्ध विभिन्न शारीरिक अंगों जैसे मुँह, जीभ, दाँत, टॉन्सिल और लार ग्रंथियों में ट्यूमर होने के कारण होता है। मुख के कैंसर के अलावा स्तन कैंसर भी कैंसर के प्रमुख प्रकारों में से एक है। इससे स्तन की कोशिका या ऊतकों में ट्यूमर हो जाता है। आमतौर पर यह महिलाओं को ही प्रभावित करता है। एक शोध के अनुसार प्रति 1 लाख महिलाओं में 30 महिलाएं इससे प्रभावित होती हैं।

बच्चेदानी के मुख का कैंसर भी महिलाओं को होने वाला एक प्रमुख कैंसर है। स्तन कैंसर के बाद सर्वाधिक संख्या में महिलाएं इसी से प्रभावित होती हैं। शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण महिलाएं इससे अधिक संख्या में प्रभावित होती हैं। इसके अतिरिक्त फेफड़े का कैंसर भी कैंसर के प्रमुख प्रकारों में से एक है। इससे फेफड़े की कोशिका और ऊतक क्षतिग्रस्त होते हैं। ये लिम्फ और नोड्स में फैलता है। ग्लोबोकोन 2012 की रिपोर्ट के अनुसार इससे 70 हजार लोग प्रभावित हुए और इनमें से 64 हजार लोगों की मौत हो गई।

यदि कैंसर के उपचार की बात की जाए तो आरंभिक अवस्था में इसकी पहचान ही इसका सबसे सटीक इलाज है। कैंसर के मामले में जागरूकता ही निवारण है। यदि आरंभिक अवस्था में ही कैंसर का पता चल जाता है तो इससे इलाज का सरलीकरण तो होता ही है, इसके साथ ही लागत प्रभावी इलाज भी संभव हो जाता है। कैंसर का महंगा इलाज इससे लड़ने की राह में सबसे बड़ा बाधक है। इसी समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत कैंसर मरीजों को घर पर ही विश्व स्तरीय सलाह उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण द्वारा नाव्या एप्लीकेशन की मदद ली जा रही है।

इस एप में मरीज का सम्पूर्ण डाटा डाल दिया जाता है। इसके बाद मरीज की उपचार-प्रक्रिया (लाइन ऑफ ट्रीटमेंट) के आधार पर संबंधित डॉक्टरों द्वारा गुणवत्तापूर्ण सलाह दी जाती है। इससे मरीज बार-बार अस्पतालों के चक्कर काटने से बच जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, नाव्या एप्लीकेशन की मदद से 68 देशों के 35000 कैंसर मरीजों को परामर्श प्रदान किया गया है।

एक रोगी में कैंसर का सही समय पर पता चल जाए, इस दिशा में लगातार शोध कार्य किये जा रहे हैं। हाल ही में लंदन स्थित कैंसर शोध संस्थान और एडिनबरा विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से रिवॉल्वर नामक एक तकनीक विकसित की गई है। इस तकनीक की मदद से डीएनए में बदलाव की प्रक्रिया (पैटर्न) को अभिलेखित किया जाता है। इसके बाद में भविष्य में आनुवंशिक बदलावों के अनुप्रयोग के माध्यम से ट्यूमर के बदलावों को चुनौती दी जाती है। इसकी मदद से कैंसर कोशिकाओं के विकास के पूर्व ही इसका इलाज शुरू किया जा सकेगा।

हालांकि ये पहला शोध कार्य नहीं है, इस दिशा में अन्य शोध भी किये गए हैं। अब बस एक अदद अनुप्रयुक्त सटीक तकनीक की जरूरत है जो कैंसर के इलाज को समय पूर्व और लागत प्रभावी बना सकें। उपचारात्मक उपायों के अतिरिक्त निवारक उपायों को भी अपनाने की जरूरत है। इनमें सबसे प्रमुख है स्वस्थ जीवनशैली को अपनाना। इसके अंतर्गत एक सामान्य मनुष्य को अपनी स्वास्थ्य जरूरतों का खासा ध्यान रखना चाहिए। एक व्यक्ति को कोशिश करनी चाहिए कि उसका वजन सामान्य रहे। इसके साथ ही उसे ज्यादा से ज्यादा समय सक्रिय रहना चाहिए, नियमित स्वास्थ्य जाँच करानी चाहिए, फलों एवं सब्जियों को अपने आहार में शामिल करना चाहिए, कैंसर संबंधी चेतावनियों जैसे इसके संकेतो एवं लक्षणों के संबंध में जागरूकता भी रखनी चाहिए। इसके साथ ही सुरक्षित यौन व्यवहार का अनुपालन, पर्यावरणीय कार्सिनोजेनिक तत्वों के जोखिम के हिसाब से सम्बद्ध उत्पादों का अनुप्रयोग, धूम्रपान एवं शराब के सेवन से बचना चाहिए।

जीवनशैली की गुणवत्ता के अतिरिक्त कैंसर के कारण शरीर मे होने वाले बदलाव के संकेतों को भी जब-तब जांचते रहना चाहिए। इन संकेतों के अंतर्गत आंत और मूत्राशय की आदतों में परिवर्तन, घाव का जल्दी नहीं भरना, शरीर के किसी हिस्से में असामान्य रक्तस्राव या स्राव होना, वजन का तेजी से घटना, भूख कम लगना आदि आते हैं। इसके अलावा यदि किसी को भोजन निगलने में समस्या हो और तिल व मस्से में कोई परिवर्तन जान पड़े तो फौरन चिकित्सको की सलाह पर कैंसर की जाँच करवानी चाहिए। इन सभी प्रयासों के माध्यम से हम कैंसर जैसे असाध्य रोग को भी हरा सकते है।

  संकर्षण शुक्ला  

संकर्षण शुक्ला उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले से हैं। इन्होने स्नातक की पढ़ाई अपने गृह जनपद से ही की है। इसके बाद बीबीएयू लखनऊ से जनसंचार एवं पत्रकारिता में परास्नातक किया है। आजकल वे सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के साथ ही विभिन्न वेबसाइटों के लिए ब्लॉग और पत्र-पत्रिकाओं में किताब की समीक्षा लिखते हैं।

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