18 जून को लखनऊ शाखा पर डॉ. विकास दिव्यकीर्ति के ओपन सेमिनार का आयोजन।
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दृष्टि आईएएस ब्लॉग

मनोभाव का आवेग है तांडव नृत्य

भारतीय शिलालेखों में तांडव नृत्य की चर्चा से पहले उस शिव की चर्चा ज़रूरी है कि आखिर क्या वजह है कि वे जन-जन के आराध्य हो गए। भोले बाबा का शिव तांडव। वाकई व्यक्तित्व का कितना गहरा विस्तार हैं नीलकंठ । एक ओर भोलापन ,मासूमियत तो दूसरी ओर रौद्र रूप से ब्रह्मांड को हिला देने वाला तांडव। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव-शंकर को वैरागी से गृहस्थ बनाने के लिए देवी शक्ति ने तपस्या की थी। विवाह में उनको दूल्हा बनकर आना था। अब जटाधारी ठहरे पूरे वैरागी। दूल्हा कैसे बना जाता है उन्हें कुछ मालूम नहीं। वे घोड़ी के बजाय बैल पर चढ़कर आ गए। हार की बजाय नाग को गले में लपेट लिया। शरीर पर चंदन नहीं, भस्म मल ली। वस्त्र के नाम पर हिरण की छाल लपेट ली। अब महादेव के बाराती कौन होते। उनमें कोई देवगण नहीं बल्कि भूत, पिशाच और राक्षस साथ आये। कैलाशवासी अमृत के बजाय विष पीते ही विवाह मंडप में पहुंच गए। यह सब हुआ महाशिवरात्रि की रात को । इसी दिन त्रिदेव ने देवी की आराधना सुनकर वैरागी रूप तजकर सांसारिक जीवन चुन लिया। शिव -शक्ति यानी सृष्टि की बुनियाद। आशय यह कि रौद्र रूप के साथ किये गए नृत्य से के साथ प्रेम के नृत्य तक का विस्तार इसी अवसर पर शिव से जुड़ता है। प्रेम से जुड़ा नृत्य लास्य कहलाता है और रौद्र रूप से जुड़ा तांडव।

भरत मुनि का नाट्यशास्त्र

तांडव और लास्य, शास्त्रीय भारतीय नृत्य के दो बुनियादी पहलू हैं। माना जाता है कि शिव ने स्वयं कम से कम 108 अलग-अलग नृत्यों का आविष्कार किया था - जिसमें उग्र आक्रामक तांडव भी है जहां वह ब्रह्मांड चक्र के अंत में दुनिया को नष्ट कर देते हैं। भरत मुनि का नाट्य शास्त्र तांडव और लास्य के बारे में बात करता है। नाट्यशास्त्र संगीत और नाटक पर सबसे पहला साहित्य है जिसे लगभग तीन सौ से 500 ईसा पूर्व भरत मुनि द्वारा लिखा गया। संस्कृत में 6000 दोहे और छत्तीस अध्यायों में फैले नाट्यशास्त्र का ध्यान नृत्य और नाटक पर था, जिसमें संगीत सहायक था। शीर्षक दो संस्कृत शब्दों नाट्य और शास्त्र से मिलकर बना है। नाट्य का तात्पर्य नृत्य और नाटक की तकनीक से है, और शास्त्र का तात्पर्य विज्ञान से है। यह एक महान कृति है जो निर्देशक और दर्शकों के बीच संबंध, नाटक की संरचना, अभिनय तकनीक, वेशभूषा और मेकअप, उपयोग किए जाने वाले संगीत और संगीत वाद्ययंत्र, मंच के आयाम और प्रकाश व्यवस्था के साथ इसकी सजावट, और आकार का विस्तार से वर्णन करती है। यहाँ तक की हॉल और दर्शकों के बैठने की जगह का भी। नाटकों के निर्देशकों और निर्माताओं का कहना है कि आज की तारीख में भी इसकी प्रासंगिकता बहुत अधिक है। शायद इसलिए ही भारत में रामायण का नाटक गांव-गांव के में बड़े ही प्रभावशाली ढंग से खेला जाता है। भरत मुनि ने रस-भाव अनुभव के माध्यम से कलाकारों और दर्शकों के बीच के संबंध को समझाया। उन्होंने आठ प्रकार के "रस" और उनके अनुरूप भावों यानी भावनाओं की व्याख्या की। रस भावनात्मक अवस्था है। कला की अभिव्यक्ति में रस प्रमुख भावनात्मक विषय होता है। यह कला से प्रत्यक्ष रूप से अनुभव की जाने वाली प्रसन्नता है। भाव का अर्थ है बनना। यह मन की एक अवस्था है जिसका परिणाम रस है। यदि आप अच्छा गाना सीखना चाहते हैं तो भावनाओं के साथ गाने का तरीका जानना ज़रूरी कौशल है। तांडव शिव के शाश्वत नृत्य की अभिव्यक्ति है। नाट्य शास्त्र के अनुसार, शिव को नृत्य का बहुत शौक था और उन्होंने तांडव नृत्य शैली को अपनाया जिसकी कई विशिष्ट विशेषताएं हैं, जैसे शक्ति और बल का चित्रण,यह शिव की क्रोधित मनोदशा को दर्शाता है। यह विनाश का प्रतीक है। यह पांच मुख्य दिव्य क्रियाओं का प्रतीक है, जिन्हें सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह के नाम से जाना जाता है। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र का पहला अध्याय लिखने के बाद अपने शिष्यों को तांडव का प्रशिक्षण दिया था। उनके शिष्यों में गंधर्व और अप्सराएं थीं। नाट्यवेद के आधार पर प्रस्तुतियां भगवान शिव के समक्ष प्रस्तुत की जाती थीं।

पुराणों में मिलता है विवरण

ऐसा माना जाता है कि तांडव सृष्टि के पांच तत्वों अग्नि,जल,पृथ्वी,वायु और आकाश का प्रतीक है। प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथ अनेक अवसरों का वर्णन करते हैं जब शिव या अन्य देवताओं ने तांडव किया था। जब सती ने दक्ष के यज्ञ में अपने प्राण त्यागने के लिए यज्ञ की अग्नि में छलांग लगा दी, तो शिव ने अपना दुख और क्रोध व्यक्त करने के लिए रुद्र तांडव किया। दरअसल नृत्य मनोभावों से उपजे हाव -भाव की अभिव्यक्ति ही है। कह सकते हैं कि क्रोध की बेहद कलात्मक अभिव्यक्ति तांडव है। भागवत पुराण में कृष्ण द्वारा कालिया नाग के सिर पर तांडव नृत्य करने का भी संदर्भ मिलता है। जैन ग्रंथ के अनुसार: इंद्र ने ऋषभ (जैन तीर्थंकर) के जन्म के सम्मान में तांडव किया। शिवप्रदोष स्तोत्र में उल्लेख है कि जब शिव संध्या तांडव करते हैं, तो ब्रह्मा, विष्णु, सरस्वती, लक्ष्मी और इंद्र जैसे अन्य देवता संगीत वाद्ययंत्र बजाते हैं और शिव की स्तुति गाते हैं। कुछ मंदिर की मूर्तियों में शिव -पुत्र गणेश को आठ भुजाओं वाले रूप में तांडव नृत्य करते हुए दर्शाया गया है। तांडव के माध्यम से शिव उन सभी देवताओं को भयभीत कर देते हैं जो शिव से दया की याचना करते हैं। यह इस विचार का प्रतीक है कि त्रिदेवों (ब्रह्मा और विष्णु और शिव ) के बीच शिव 'विनाशक' हैं। मान्यता है कि शिवभक्त रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब वे दंभ में आकर पूरे पर्वत को ही लंका ले चलने को आतुर हुए तब महादेव को यह अहंकार पसंद नही आया। उन्होंने अपने पैर के अंगूठे से तनिक जो दबाया तो कैलाश फिर जहां था, वहीं ठहर गया। इससे शिव के अनन्य भक्त रावण का हाथ दब गया और वह आर्त्तनाद कर उठा। "शंकर शंकर" अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए, और स्तुति करने लगा , जो कालांतर में शिव तांडव स्तोत्र कहलाया। शिव ताण्डव स्तोत्र से शिव इतना खुश हुए कि ना केवल रावण को पूरी समृद्धि और सिद्धि से परिपूर्ण सोने की लंका ही वरदान के रूप में नहीं दी बल्कि सम्पूर्ण ज्ञान, विज्ञान तथा अमर होने का वरदान भी दिया ।शिवताण्डव स्तोत्र स्तोत्र काव्य में बहुत लोकप्रिय है। इसकी अनुप्रास और समास वाली भाषा संगीतमय ध्वनि और प्रवाह के कारण शिव भक्तों में प्रचलित है। सुन्दर भाषा एवं काव्य-शैली के कारण यह स्तोत्र विशेषकर शिवस्तोत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है। जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजंग-तुंग-मालिकाम् डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् ॥१॥ जिसका आशय है जिन शिव जी की सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित हो गंगा जी की धारा उनके कंठ को प्रक्षालित करती हैं, जिनके गले में बड़े और लम्बे सांपों की मालाएं लटक रहीं हैं, और जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

प्राचीन भारतीय शिलालेखों में तांडव

प्रारंभिक भारतीय शिलालेखों में अमर तांडव नृत्य, लय, गति और आध्यात्मिकता के गहरे सम्बन्ध को स्थापित करता है । भरत मुनि के नाट्य शास्त्र के साथ बाणभट्ट के हर्षचरित में भी तांडव नृत्य का विवरण है। शक्तिशाली शरीर संचलन ,पैरों की तेज गति और चेहरे की भयातुर और आक्रामक मुद्राओं के साथ तांडव नृत्य में दिव्य कला के दर्शन होते हैं। इस रूप का श्रेय ब्रह्मांडीय नर्तक भगवान शिव को दिया जाता है, जिनकी ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने जोरदार आंदोलनों के माध्यम से प्रकट होती है। ये शिलालेख अमूल्य अभिलेखों के रूप में काम करते हैं, जो प्राचीन भारतीय संस्कृति में तांडव की उत्पत्ति और महत्व पर प्रकाश डालते हैं। उनके भीतर, नृत्य को निर्माण या सृजन और विनाश की एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है जो जीवन के शाश्वत चक्र और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतीक है। इन शिलालेखों के माध्यम से, तांडव न केवल एक नृत्य के रूप में बल्कि एक पवित्र अनुष्ठान के रूप में उभरता है, जो नश्वर को परमात्मा से जोड़ता है। शिव का यह तांडव नटराज रूप का प्रतीक है। जब शिव तांडव करते हैं तो उनका यह रूप नटराज कहलाता है। नटराज शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। 'नट' और 'राज', नट का अर्थ है कला और राज का अर्थ है राजा। शंकर का नटराज रूप इस बात का सूचक है कि 'अज्ञानता को सिर्फ ज्ञान, संगीत और नृत्य से ही दूर किया जा सकता है।'वर्तमान में शास्त्रीय नृत्य से संबंधित जितनी भी विद्याएं प्रचलित हैं। वह तांडव नृत्य की ही देन हैं। तांडव नृत्य की तीव्र प्रतिक्रिया है। वहीं लास्य सौम्य है। लास्य शैली में वर्तमान में भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी और कथक नृत्य किए जाते हैं यह लास्य शैली से प्रेरित हैं। जबकि केरल का कथकली तांडव नृत्य से प्रेरित है। शरीर और भाव से रौद्र रूप प्रस्तुत करता हुआ। कलाकार के चेहरे पर पुते रंग इस तांडव में आज भी नए रंग भरते हैं।

  वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा  

(लेखिका वर्षा भम्भाणी मिर्ज़ा ढाई दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। ये दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका टीवी, राजस्थान पत्रिका, जयपुर में डिप्टी न्यूज़ एडिटर पद पर काम कर चुकी हैं। इन्हें संवेदनशील पत्रकारिता के लिए दिए जाने वाले लाडली मीडिया अवार्ड के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।)

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