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दृष्टि आईएएस ब्लॉग

‘खेल महाशक्ति’ बन सकता है भारत

“अगले 10 सालों में भारत ‘खेल महाशक्ति” होगा।”

वर्ष 2022 में आई बुक ‘बिज़नेस ऑफ स्पोर्ट्स-द विनिंग फ़ॉर्मूला ऑफ सक्सेस’ के लेखक और ग्रुप साउथ एशिया के स्पोर्ट्स, ई-स्पोर्ट्स व एंटरटेनमेंट हेड ‘विनीत कार्णिक’ भारतीय खेल के बारे में जो सोचते हैं, उसमें कोई बड़ा अचरज नहीं होना चाहिए। जिस तरह से भारत में विभिन्न खेल लीगों की शुरूआत हो रही है, सरकार खिलाड़ियों को समर्थन कर रही है, उद्योग जगत खेल में दिलचस्पी ले रहा है और विभिन्न खेल भारत के कोने-कोने तक पहुँच रहे हैं, ऐसे में आगामी खेल दशक में भारत के वर्चस्व की कल्पना करना बेईमानी नहीं होगी। एक ओर वर्ष 2020 में खेल महाकुंभ ‘टोक्यो ओलंपिक ’ में अपने पहले एथलेटिक्स गोल्ड और रेसलिंग, वेटलिफ्टिंग, बैडमिंटन, बॉक्सिंग व हॉकी जैसे विविध खेलों में मेडल समेत कुल 7 मेडल जीतकर भारत ने ओलंपिक इतिहास में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया, तो दूसरी ओर विभिन्न विश्व चैंपियनशिप में अपने प्रदर्शन को लगातार सुधारा है, इससे भारत के ओलंपिक खेलों की मेडल टेली में टॉप-10 में दस्तक करने की सुगबुगाहट बढ़ गई है।

एक हालिया उदाहरण, वर्ल्ड यूथ यूनिवर्सिटीज गेम्स (पूर्व नाम समर यूनिवर्सियाड) ‘चेंगदू, 2023’ का है, जिसमें भारत ने अपने प्रदर्शन को अभूतपूर्व ढंग से बढ़ाया है। इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी स्पोर्ट्स फेडरेशन (FISU) द्वारा द्विवार्षिक तौर पर आयोजित होने वाले समर यूनिवर्सियाड में भारत ने वर्ष 1959 में इसकी शुरूआत से ही प्रतिभाग किया है, लेकिन नेपोली यूनिवर्सियाड, 2019, ताइपे यूनिवर्सियाड, 2017 और ग्वांगझू यूनिवर्सियाड, 2015 के बीते वर्षों के प्रदर्शनों को भी देखा जाए, तो भारत इन खेलों के किसी संस्करण में कभी 10 मेडल तक नहीं पहुँच सका और न ही कभी टॉप-20 देशों की सूची में शामिल हो सका, लेकिन इस बार भारत ने पिछले 30 संस्करणों की ओवर ऑल मेडल संख्या 21 को भी पीछे छोड़ दिया और कुल 26 मेडल के साथ 7वें स्थान पर रहकर, विश्व यूथ यूनिवर्सिटी गेम्स के अपने सफ़र में एक ऐतिहासिक पड़ाव जोड़ा। इन खेलों में जहाँ मेजबान चीन ने 178 मेडल्स के साथ एकतरफा कब्ज़ा रखा, वहीं भारत ने इस वर्ष के खेलों में शूटिंग के लिए आरक्षित कुल 21 मेडल्स में से 14 अपने नाम किए, जोकि विश्व शूटिंग में भारत की बनती पैठ की पुष्टि है। भारत ने इसके बाद आर्चरी में 7 मेडल जीतें, जो वर्ल्ड यूथ यूनिवर्सिटी गेम्स के भारत के किसी संस्करण में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (5 मेडल, साल 2015) से बेहतर है। यहाँ यह भी क़ाबिल-ए-तारीफ़ है कि नेपल्स, 2019 के वर्ल्ड यूथ यूनिवर्सिटी गेम्स के भारत के 4 मेडल की संख्या की इस बार के खेलों में अकेले भारतीय राइफल शूटर 'ऐश्वर्य प्रताप सिंह' ने अपने 3 गोल्ड और कुल 4 मेडल के साथ बराबरी भारत की। भारत का इन खेलों का एक ऐतिहासिक ब्रांज मेडल, यामिनी मौर्य के नाम पर जूडो से भी आया। भारत को एथलेटिक्स में सर्वाधिक निराशा हाथ लगी, जिसमें प्रतिभाग किए 82 खिलाड़ियों में से केवल 4 ही 4 ब्रांज मेडल देश की झोली में ला सकें। भारत इन खेलों की शुरुआत (साल 1959) से ही इनमें भाग लेता रहा है। इस बार इस वर्ष इस यूनिवर्सिटीज खेल कुंभ में भारतीय विश्वविद्यालयों के संघ (AOIU) ने 335 खिलाड़ियों का मज़बूत दल भेजा था, जिन्होंने एथलेटिक्स, आर्चरी, बैडमिंटन, फेंसिंग, जूडो, शूटिंग, स्विमिंग, टेनिस, टेबल टेनिस, ताइक्वांडो और वॉलीबॉल जैसे खेलों में प्रतिभाग किया। चूँकि यह खेल कुंभ पेरिस ओलंपिक , 2024 के लिए क्वालीफाइंग है, इसीलिए इन खेलों में भारत के प्रदर्शन को आगामी ओलंपिक खेलों में भारत के प्रदर्शन की दशा-दिशा का निर्धारक माना जा रहा है।

इंटरनेशनल चेस फेडरेशन (आमतौर पर FIDE) और भारतीय आईटी कंपनी टेक महिंद्रा के संयुक्त प्रयास में बीते जून-जुलाई में दुबई में आयोजित हुई पहली ‘ग्लोबल चेस लीग’ (GCL) के मौके पर पाँच बार के विश्व चैंपियन ‘कार्ल मैग्नस’ ने कहा था, कि “भारत लगातार ग्रैंड मास्टर पैदा कर रहा है। यह भारत में चेस क्रांति की एक शुरुआत है।“ इस लीग की 6 विभिन्न टीमों में भारत के डी. गुकेश, आर. प्रागननंदा, अर्जुन एरिगैसी, रौनक सधवानी, कोनेरू हम्पी, द्रोणावल्ली हरिका जैसे धुरंधर भारतीय खिलाड़ियों ने भाग लिया। टोक्यो ओलंपिक में भारतीय गोल्फर अदिति अशोक के अभूतपूर्व प्रदर्शन और दीक्षा डागर व अन्य गोल्फरों के हालिया प्रदर्शनों को देखते हुए पूर्व भारतीय गोल्फर ‘जीव मिल्खा सिंह’ ने कहा है, कि ‘खेल के तौर पर गोल्फ का भारत में एक सुनहरा भविष्य है।“ ऐसे ही, हाल ही में ‘भारत ताइक्वांडो’ के निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए, पूर्व ब्लैक बेल्ट प्रशिक्षक-खिलाड़ी ‘नामदेव शिरगांवकर’ ने भी कहा है, कि “वर्तमान में ताइक्वांडो के बारे में बहुत-से लोग नहीं जानते होंगे, लेकिन भविष्य में ऐसा नहीं होगा।“ नामदेव की इसी प्रतिबद्धता को साबित करने की दिशा में भारत में हाल ही में शुरू हुई ‘ताइक्वांडो प्रीमियर लीग’ पहला प्रयास है। नवनीता बच्चू व गणेश दुव्वुरी द्वारा शुरू हुई इस लीग का अंतर्राष्ट्रीय साझेदार, वैश्विक ताइक्वांडो संस्थान ‘ब्लैक बेल्ट वर्ल्ड’ है। नई दिल्ली में आयोजित हुए इस लीग के पहले संस्करण को ‘राजस्थान रिबल्स’ ने जीता। 12 टीमों के साथ शुरू हुई इस ताइक्वांडो प्रीमियर लीग की चार टीमों की मालकिन महिलाएँ हैं, जो भारतीय खेलों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के साथ-साथ, भारत में खेलों के प्रोत्साहन में महिलाओं की भागीदारी को चिह्नित करता है। भारत में ताइक्वांडो के दस लाख रजिस्टर्ड प्लेयर्स हैं। ताइक्वांडो एक ओलंपिक खेल है, जिसमें एशिया महाद्वीप का वर्चस्व है। लिहाज़ा, ताइक्वांडो के लिए भारत एक उर्वर भूमि है, बस इसके प्रोत्साहन के लिए ज़रुरत थी, तो एक बड़ी लीग की, जो अब पूरी हो गई। वहीं, वेब एलिस कप, 2019 के मौके पर विश्व रग्बी के सीईओ ब्रेट गोस्पर ने भी कहा था, कि “भारत में रग्बी का अच्छा भविष्य है।“ यहाँ गौरतलब है कि ‘भारतीय महिला रग्बी सेवेंस टीम’ हांगझोऊ (चीन) में आगामी 28 सितंबर से शुरू हो रहे 19वें ‘एशियन गेम्स’ में भी प्रतिभाग कर रही है। भारतीय महिला रग्बी टीम का एशियन गेम्स में ऐतिहासिक जगह बनाना, बीते दिनों में एशिया रग्बी 7s ट्रॉफी, एशिया रग्बी अंडर-18 और 20 की सफलता और प्रदर्शन का परिणाम है। इंडियन फुटबॉल रग्बी यूनियन (IRFU) के अध्यक्ष राहुल बोस ने कहा था, कि “हम एशियन गेम्स, 2023 से लॉस एंजिलस, 2028 ओलंपिक तक भारतीय रग्बी को गति देने का ढाँचा स्थापित कर चुके हैं। देश के लगभग आधे ज़िलों ने रग्बी में रुचि दिखाई है। 50 के दशक में फुटबॉल और अभी तक हॉकी को छोड़ दिया जाए, तो देश के 75 वर्षों के इतिहास में ओलंपिक में हमने किसी फील्ड खेल में भारत की पुरुष और महिला टीम को एक साथ नहीं देखा है।“ अतः अब वे दिन दूर नहीं होंगे, जब भारत की महिला-पुरुष टीमें न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फिजी, वेल्स, फ्रांस, आयरलैंड, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, यू.एस.ए. और ब्राज़ील जैसे रग्बी देशों के साथ मेडल की दावेदारी के लिए जूझती दिखेंगी।

समग्रतः कहें, तो विभिन्न खेलों में भारत के बढ़ते कामयाब कदमों ने इसकी खेल महाशक्ति बनने की उम्मीद तो बढ़ाई ही है।

भारत में खेल बजट और अंतर्राष्ट्रीय खेल सीरीज/प्रतियोगिताएँ

यह जगज़ाहिर है कि बीते कुछ वर्षों में भारत ने कई बड़े सफल खेल आयोजन किए हैं। जिस कारण देश और इसके युवाओं ने क्रिकेट, हॉकी, रेसलिंग, कबड्डी और शूटिंग जैसे चिर-परिचित खेलों के अलावा अब जूडो, फेंसिंग, स्विमिंग, वॉलीबॉल, हैंडबॉल, बॉक्सिंग, कुराश, वुसू, लॉन बॉल और एथलेटिक्स खेलों जैसे अनाम-अनजान खेलों को न सिर्फ़ देखना शुरू किया है, बल्कि देश के युवा इन्हें करियर के तौर पर भी देखेने लगे हैं।

भारत सरकार ने वर्ष 2023-24 में खेल बजट को पिछले वर्ष के मुक़ाबले दहाई अंकों (11%) में बढ़ाकर 3397 करोड़ रुपये कर दिया, जिससे खेलों के प्रति सरकार की रुचि-नीति साफ़ नज़र आती है। यही बजट वर्ष 2004-05 में महज़ 466 करोड़ रुपये होता था। किसी देश का खेल बजट और खेल सफलता एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसा देश का खेल बजट होगा, वैसा वहाँ खेल ढाँचा और खेल प्रतिभा की पहचान व उनको मदद होगी, जो देश को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मेडल दिलाकर गौरवान्वित करेगी।

यह देश की खेल संस्थाओं को मिली खेल मदद के कारण ही हो सका, कि भारत में फीफा के दो वर्ल्ड कप (फीफा अंडर-17 वर्ल्ड कप, 2017 और फीफा अंडर-17 वीमेंस वर्ल्ड कप, 2022) और साल 2022 में 44वें चेस ओलिंपियाड जैसी बड़ी खेल प्रतियोगिताओं का सफल आयोजन हुआ। वर्ल्ड टेबल टेनिस स्टार कंटेंडर सीरीज इसी वर्ष फरवरी-मार्च में गोवा में आयोजित हुई, जो भारतीय खेलों के इतिहास में पहली बार हुआ। फ़ॉर्मूला वन 2011 इंडियन ग्रैंड प्रिक्स का आयोजन भी भारत ने पहली बार नोएडा में किया था, जो दक्षिण एशिया में भी पहली बार था। एशियन जूनियर एंड यूथ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी में 28 जुलाई से 5 अगस्त के बीच देश में पहली बार संपन्न हुई। साथ ही, नोएडा में ही कॉमनवेल्थ सीनियर, जूनियर एंड यूथ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप का आयोजन भी सफलतापूर्वक किया गया था। साथ ही, ‘एशियन चैंपियंस ट्रॉफी हॉकी टूर्नामेंट’ भारत ने पहली बार आयोजित किया, जो चेन्नई में हुआ।

इतिहास में भारत दो बार एशियन गेम्स (वर्ष 1951, 1982) और वर्ष 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन भी कर चुका है। वर्ष 1986 से शुरू हुई ‘वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप’ के 47 वर्ष के सफ़र के बाद भारत पहली बार अपनी धरती पर इसके आयोजन के लिए बिड लगाने हेतु प्रतिबद्ध हुआ है। वर्ष 2024 में आयोजित होने वाली वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप’ के 20वें संस्करण की मेजबानी से लीमा (पेरू) के पाँव पीछे खींचने के बाद, भारत ने भोपाल में इसके आयोजन के लिए दिलचस्पी दिखाई है। पेरू में छिड़े पर्यावरणीय मुद्दों और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप के आगामी संस्करण का मौका भारत लगे हाथ लेना चाहता है। एथेलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के वर्तमान अध्यक्ष और पूर्व भारतीय एथलीट ‘अदिली जे. सुमरिवाला ने भोपाल में इसका आयोजन कराने की बात कही है, जिसने इसी साल की शुरुआत में दुनिया के 10 शहरों समेत आईएसएसएफ के शूटिंग विश्व कप के पिस्टल और राइफल के खेल-इवेंट्स की मेजबानी की थी

अब भारत की नज़र वर्ष 2036 के ओलंपिक पर है, हालाँकि विक्टोरिया (ऑस्ट्रेलिया) द्वारा आयोजन को रद्द करने के बाद भारत के पास कॉमनवेल्थ गेम्स, 2026 को आयोजित कराने का मौका है, लेकिन खेल मंत्री अनुराग ठाकुर के मुताबिक, अब भारत सबसे बड़े खेल आयोजन की ही तैयारी कर रहा है। बीते साल केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने स्पष्ट कर दिया था कि भारत ओलंपिक , 2036 के आयोजन हेतु नीलामी में शामिल होगा। गौरतलब है कि ओलंपिक , 2032 तक सिटी स्लॉट पहले ही तय हो चुके हैं। साल 2036 के ओलंपिक खेलों के आयोजन के लिए भारत के अलावा ब्रिटेन, मिस्त्र, इंडोनेशिया और द. कोरिया भी दिलचस्पी दिखा चुके हैं। देश का गुजरात राज्य ऐसे बड़े खेल आयोजन की ताक़त रखता है, जहाँ अहमदाबाद में विश्व का सबसे बड़ा क्रिकेट मैदान, विभिन्न स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स-एन्क्लेव, होटल्स और बेहतर आधारभूत संरचना मौजूद है। भारत में अब नई दिल्ली-नोएडा के अलावा भुवनेश्वर-राउरकेला, बेंगलुरु, अहमदाबाद और भोपाल जैसे शहर हैं, जो बड़े खेल आयोजनों के मुफ़ीद हैं।

केंद्र और राज्य सरकारों की खेल समर्थित योजनाएँ व नीतियाँ

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत सरकार के बढ़े हुए खेल बजट ने देश में कई क्रांतिकारी और ज़मीनी योजनाओं को आकार दिया है, जिनकी बदौलत देश के दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों से कई खेल प्रतिभाओं-प्रेरणाओं ने जन्म लिया है; इनमें चाहे मीराबाई चानू, नीरज चौपड़ा, दुती चंद, हिम दास हो या फिर ज्योति याराजी, प्रियंका गोस्वामी या बापी हंसदा।

वर्ष 2018 में तत्कालीन केंद्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन राठौर द्वारा शुरू की गई योजना ‘खेलो इंडिया’ ने देश में खेल क्रांति की इबारत लिखी है। जून, 2022 तक खेलो इंडिया से 2590 खिलाड़ी चिह्नित हुए हैं। इस योजना के तहत खेल प्रतिभाओं की पहचान कर, उन्हें 8 वर्षों तक सालाना 5 लाख रुपये की मदद राशि दी जाती है। राजीव गांधी खेल अभियान, अर्बन स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोग्राम और नेशनल स्पोर्ट्स टेलेंट सर्च सिस्टम ( वर्ष 2015 में शुरू, 8-12 वर्ष की उम्र के एथलीटों की तैयारी हेतु) को मिलाकर खेलो इंडिया को तैयार किया गया था। खेलो इंडिया योजना को देश में जिस खेल संस्कृति को विकसित करने के मकसद से लाया गया था, यह उसमें कामयाब होती दिख रही है और भारत एक खेल राष्ट्र बनने की ओर बढ़ रहा है। देशभर में 1000 खेलो इंडिया एक्सीलेंस सेंटर भी खुलने जा रहे हैं, जिनकी घोषणा राठौर के बाद खेल मंत्री का पद संभालने वाले किरण रिजिजू ने की थी। पिछले वर्ष संसद के शीतकालीन सत्र में पूछे गए एक सवाल के जवाब में वर्तमान खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने इस वर्ष 15 अगस्त तक इन सभी सेंटरों की शुरुआत होने की बात कही थी।

टॉप्स योजना को वर्ष 2014 में वर्ष 2016-20 के ओलंपिक्स में भारत की मेडल टेली को बढ़ाने के लक्ष्य से लाया गया था। यह योजना अभी संचालित है और देश को मेडल दे चुके और देने की क़ाबिलियत रखने वाले कई बड़े खिलाड़ियों को इसकी मदद भी मिल रही है। टॉप्स योजना की सफलता की एक मिसाल अभी बुडापेस्ट (हंगरी) में हुई 19वीं वर्ल्ड एथेलेटिक्स चैंपियनशिप में देखने को मिली, जिसमें भारतीय प्रतिभागी-दल के 28 खिलाड़ियों में से 13 टॉप्स योजना के लाभार्थी खिलाड़ी थे।

‘फिट इंडिया मूवमेंट’ की शुरूआत राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर वर्ष 2019 में देशभर के व्यक्तियों में शारीरिक तौर पर स्वस्थ जीवन-शैली को अपनाने के लिए प्रेरित करने और स्थानीय खेलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हुई थी।

देश में राष्ट्रीय खेल विकास कोष (NSDF) की स्थापना वर्ष 1998 में धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1890 के तहत की गई थी। इस कोष का उद्देश्य आधारभूत ढाँचे को विकसित करने, अंतर्राष्ट्रीय कोचों से प्रशिक्षण दिलवाने और अन्य खेल-सुलभ कामों के लिए भारत में खेलों और खेल संघों की सहायता करना है। हाल ही में इस कोष ने अगले 5 वर्षों के लिए एनटीपीसी (नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन) से भारतीय तीरंदाजी के लिए 115 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता और आरईसी (ग्रामीण विद्युतीकरण निगम) फाउंडेशन से महिला हॉकी, एथलेटिक्स और बॉक्सिंग की सहायतार्थ आगामी 3 वर्षों में 100 करोड़ रुपये की राशि देने का समझौता किया है।

उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों ने हाल ही में 'खेल नीति, 2023' की घोषणा की है। दोनों राज्यों की नीति में एक समान बिंदु/घोषणा 'खेल नर्सरी' है, जो राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों/स्कूलों में ग्रामीण प्रतिभाओं को तैयार करने के लिए काम करेंगी। पंजाब ने अपनी नीति में 1000 खेल नर्सरी और 500 खेल नौकरियों की घोषणा की है। वहीं, उत्तर प्रदेश ने अपनी खेल नीति में पैरा और महिला खेलों पर ज़ोर दिया है, हरेक ज़िले में एक खेल केंद्र, ई-स्पोर्ट्स को बढ़ावा और खेल उद्योग को आकर्षित करने जैसे फ़ैसलें किए हैं। हरियाणा भी रेसलिंग, बॉक्सिंग और हॉकी के साथ-साथ दूसरे खेलों के लिए खिलाड़ियों को तैयार व आकर्षित करने के उद्देश्य से ‘खेल नर्सरी योजना, 2022-23’ के तहत 1100 खेल नर्सरी स्थापित कर रहा है। साथ ही, हरियाणा विजेता खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि और नौकरी देने की योजना भी संचालित कर रहा है। महाराष्ट्र सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में 122 नए स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स बना रही है। साथ ही, महाराष्ट्र में ‘महाराष्ट्र ओलंपिक्स गेम्स’ भी संचालित हो रहे हैं, जिसके विजेताओं को धनराशि दी जाती है। उत्तराखंड की खेल नीति, 2021 में भी मुख्यमंत्री उदयीमान खिलाड़ी उन्यन्न योजना के तहत प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को आर्थिक मदद देने की बात की गई थी। साथ ही, राज्य में मेजर ध्यानचंद कोष और मुख्यमंत्री खेल विकास निधि कोष स्थापित करने का फ़ैसला भी लिया गया था। तमिलनाडु सरकार भी राज्यभर के हरेक ज़िले में स्पोर्ट्स स्कूल ऑफ़ एक्सीलेंस (SSE) स्थापित करने की योजना बना रही है। साथ ही, तमिलनाडु सरकार ने राज्य खेल नीति लाने की बात भी कही है। प्रत्येक खेल क्रांति के मूल में निवेश/फंड है। भारत में खेल समर्थन का एक अनूठा सरकारी मॉडल स्थापित करने वाले पश्चिम तटीय राज्य ओडिशा का खेल बजट 21वीं सदी की शुरुआत में जहाँ सिर्फ़ 4 करोड़ रुपये था, अब यह बढ़कर 1,217 करोड़ रुपये तक हो गया है। भुवनेश्वर के कलिंगा स्टेडियम और राउरकेला के बिरसा मुंडा स्टेडियम को देखें, तो ओडिशा का खेल मॉडल किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। राज्यभर में 90 बहुउद्देश्यीय इनडोर स्टेडियम, 314 ग्रामीण मिनी स्टेडियम और 149 शहरी मिनी स्टेडियम का होना भी ओडिशा के खेल मॉडल की तस्दीक है। ओडिशा ने न सिर्फ़ हॉकी को समर्थन-सहायता दी है, बल्कि बैडमिंटन, फुटबॉल, टेनिस और वेटलिफ्टिंग जैसे खेलों के लिए भी हाई परफॉरमेंस सेंटर (HPC) और स्पोर्ट्स साइंस सेंटर (SSC) स्थापित किए हैं।

भारत में स्पोर्ट्स लीग और स्पोर्ट्स को उद्योग जगत का समर्थन

वर्ष 2005 में ‘प्रीमियर हॉकी लीग’ से शुरू हुआ खेल लीग का सफ़र भारत में ‘प्रो पंजा लीग’ तक पहुँच चुका है। हाल ही में प्रो पंजा लीग (आर्म रेसलिंग) के पहले संस्करण का आयोजन 6 टीमों के साथ नई दिल्ली में किया गया। इस लीग का प्रसारण विदेशों तक भी किया गया। आर्म रेसलिंग किसी वैश्विक खेल कुंभ (ओलंपिक ,एशियाड और कॉमनवेल्थ) और अंतर्राष्ट्रीय सीरीज़ का हिस्सा नहीं है, लेकिन खेलों के उद्योगिकीकरण और मार्केटिंग के दौर में देशी खेल और यूँ कहें कि हरेक खेल प्रसिद्धि पा रहा है।

सर्वप्रथम वर्ष 2005 में भारत में ‘प्रीमियर हॉकी लीग’ शुरू हुई, जो भारतीय हॉकी महासंघ पर नौकरशाही के आरोपों और क्षेत्र-विशेष के खिलाड़ियों को नज़रअंदाज करने की आलोचनाओं के कारण वर्ष 2008 में बंद हो गई थी। ‘हॉकी इंडिया लीग’ नाम से एक और हॉकी लीग वर्ष 2013 में शुरू हुई और वर्ष 2017 में आख़िरी बार खेली गई थी। हाल ही में भारतीय हॉकी की विगत सफलताओं को देखते हुए, हॉकी इंडिया ने अध्यक्ष दिलीप टिर्की के नेतृत्व में बिंग बैंग मीडिया वेंचर्स प्रा. लि. की व्यापारिक व मार्केटिंग साझेदारी में फिर से हॉकी लीग शुरू करने की घोषणा की है।

भारत में संचालित हो रहीं कुछ और लीग्स निम्नवत हैं-

आईपीएल 2008 में।

आईएसएल 2014 में।

प्रो रेसलिंग लीग, 2015 में छह टीमों के साथ।

प्रीमियर बैडमिंटन लीग, 2016 में।

अल्टीमेट टेबल टेनिस लीग, 2017 में छह टीमों के साथ।

प्राइम वालीवॉल लीग, 2021 में आठ टीमों के साथ।

एसबीजे, ली निंज, हर्बालाइफ, अमूल, रिलायंस जियो कंपनियाँ भारत में स्पोर्ट्स सेक्टर को विकसित कर रही हैं। विभिन्न पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs)- सेल, ओएनजीसी, आईओसी और एयर इंडिया ने स्पोर्ट्स प्रोमोशन बोर्ड स्थापित किए हैं। डालमिया भारत ग्रूप, जेएसडब्ल्यू ग्रूप, अहलूवालिया ग्रूप, आदित्य बिरला ग्रूप, कुंबले टेनविक, गगन नारंग स्पोर्ट्स प्रोमोशन फाउंडेशन, टाटा स्टील व टाटा ट्रस्ट ओडिशा में शूटिंग, स्विमिंग, फुटबॉल, बैडमिंटन, वेटलिफ्टिंग, हॉकी खेलों के लिए विभिन्न ढंग से मदद कर रहे हैं। ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) का वर्ष 2047 तक भारत को फुटबॉल का पावरहाउस बनाने का विजन है, जिसके तहत 100 गाँवों के 35 मिलियन बच्चों तक पहुँचना है। अडानी स्पोर्ट्सलाइन्स एथलीट सपोर्ट #गर्व_है (इसके द्वारा समर्थित कुछ खिलाड़ी हैं- अमित पंघाल, रानी रामपाल, अंकिता रानी, शिवपाल सिंह, केटी इरफान और रवि दहिया), गुजरात जाइंट्स फ्रैंचाइजी, अडानी अहमदाबाद मैराथन आदि के तहत खेलों को प्रोमोट और खिलाड़ियों को सपोर्ट कर रहा है।

हिंदुस्तान जिंक की ‘द फुटबॉल लिंक, हिंदुस्तान जिंक फुटबॉल एकेडमी’ उदयपुर में स्थापित हुई है, जहाँ 12 वर्ष के कम उम्र के बच्चों को खेल इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रेनिंग और गाइडलाइंस दी जाती है।

स्पोर्ट्स फॉर ऑल (SFA) भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के साथ सूचीबद्ध है और भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के तत्वावधान में टीम इंडिया का आधिकारिक भागीदार है व अगले पाँच संस्करणों (लॉस एंजिलस ओलंपिक 2028 तक) के लिए खेलो इंडिया यूथ गेम्स का प्रायोजक है। SFA भारत के ओलंपिक सपने को साकार करने और भारत को वैश्विक खेल मानचित्र पर शीर्ष पर देखने के लिए अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।

बीते कुछ वर्षों में कोटक महेंद्रा, रिलायंस जियो, टाटा स्टील सीएसआर देने वाली बड़ी कंपनियाँ रही हैं।

निष्कर्षतः कहें तो भारत में विश्व की खेल महाशक्ति बनने की अपार संभावना है। भारत में 1.4 बिलियन युवा जनसंख्या है, जो भारत के जनसांख्यिकी लाभांश का नेतृत्व करती है। इनमें 26% जनसंख्या 10-24 वर्ष के आयु-वर्ग में आती है, जिसमें वो अकूत क़ाबिलियत और असीम माद्दा है जो देश को खेल महाशक्ति बना सकता है। भारत जनसंख्या में अपने से कई सौ गुणा छोटे देश ‘सिंगापुर’ के ActiveSG मॉडल से खेल परितंत्र/ढाँचा स्थापित करने की सीख ले सकता है, जिसके ज़रिये सिंगापुर ने देश में खेल को बढ़ावा दिया है और ख़ुद को शारीरिक रूप से सक्रिय देश के रूप में स्थापित किया है। हालाँकि, भारत फिट इंडिया मूवमेंट और खेलो इंडिया जैसी योजनाओं के ज़रिये सिंगापुरी मॉडल की तर्ज़ पर ही चल रहा है। विभिन्न राज्यों की खेल नीतियाँ खेल नर्सरी पर ज़ोर दे रही हैं, जिनका मकसद युवाओं में स्कूल पाठ्यक्रम के अध्ययन के साथ-साथ खेल स्किल विकसित करना है। टॉप्स योजना के द्वारा मिलने वाले विश्व स्तरीय प्रशिक्षण और उच्च गुणवत्तापूर्ण खेल उपकरणों/सामानों ने भारतीय खिलाड़ियों को मेडल हकदारों की अग्रिणी पंक्ति में खड़ा किया है। कई बार भारत में खेल संघों/संगठनों और खिलाड़ियों से जुड़े विवादित मामले सामने आते रहते हैं, जो कहीं-न-कहीं राजनीति से प्रभावित होते हैं; लिहाज़ा इस दिशा में सुधार की सख्त ज़रुरत है। हालाँकि, हालिया दिनों में फुटबॉल, हॉकी और ताइक्वांडो और एथलेटिक्स जैसे कुछ संघों ने खेल क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों को ही प्रबंधन में जगह दी है, जिसके कई सकारात्मक परिणाम देखेने को मिले हैं। साथ ही, विभिन्न राज्य सरकारों में भी खेल मंत्री के तौर पर कोई भूतपूर्व खिलाड़ी देखेने को मिला है, जिसका असर राज्य के खेल के प्रति नीति-निर्माण में देखने को मिला है। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, रूस, जापान और चीन जैसी खेल शक्तियों के मुक़ाबले भारत को अभी और खेल बजट बढ़ाने की ज़रुरत है। साथ ही, खेल नीतियों के ज़मीनी कार्यान्वयन के लिए और पारदर्शी ढाँचे की दरकार है। वर्ष 1932 के लॉस एंजिलस ओलंपिक में भारत ने 20 खिलाड़ियों के प्रतिनिधि-दल के साथ 1 गोल्ड मेडल जीतकर मेडल टेली में 19वाँ स्थान (जो ओलंपिक इतिहास में भारत की सर्वश्रेठ रैंकिंग थी) हासिल किया था, जबकि टोक्यो ओलंपिक में भारत 124 खिलाड़ियों के प्रतिनिधि-दल के साथ 7 मेडल जीतकर मेडल टेली में 48वें पायदान पर रहा। भारत ने अपने अभी तक के 35 ओलंपिक मेडल्स में से 20 वर्ष 2000 और उसके बाद के वर्षों में जीते हैं। ऐसे में 96 वर्षों के बाद लॉस एंजिलस, 2028 के ओलंपिक तक भारत की सर्वश्रेठ रैंकिंग अथवा मेडल टेली में टॉप-10 में आने की उम्मीद ज़ोर पकड़ती है। वर्ष 2036 ओलंपिक के आयोजन की दावेदारी ठोक रहा और उसमें 100 मेडल की हुंकार भर रहा भारत दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स, 2010 के 101 मेडल के तिलिस्मी आँकड़े को फिर से दोहरा पाएगा, तो उसमें सरकार समर्थित नीतियों से ग्रामीण भारत में विकसित होती खेल महाशक्ति की नींव तथा उद्योग जगत द्वारा समर्थित लीग्स और योजनाओं से सपने साकार करती खेल महाशक्ति की इमारत का अविस्मरणीय योगदान रहेगा।

  अंकुर  

अंकुर मूलतः देश में हरित क्रांति की प्रयोगशाला रही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की धरती शामली से ताल्लुक़ रखते हैं। पिछले कई वर्षों से पब्लिशिंग हाउस और यू.पी.एस.सी कोचिंग संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। इन्होंने कई साहित्यिक पत्रिकाओं और प्लेटफार्म्स के लिए लिखा है और वर्तमान में भी लिखते रहते हैं। साल 2022 में इनका एक पुस्तक संकलन ‘माँ:धूप-छाँव’ भी प्रकाशित हुआ है।

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