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क्रिकेट के वे नायक जिन्हें विदा कहने के लिये मैदान नहीं मिला

टीम इंडिया की जर्सी में विदाई न ले पाने का मलाल हरभजन को इस कदर था कि उन्होंने विभिन्न मंचों पर इसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति करने से भी गुरेज न किया। बकौल हरभजन, अगर वो चार-पाँच साल और खेलते तो उनके खाते में 500 से अधिक विकेट होते। उन्होंने कहा कि क्रिकेट बोर्ड और कप्तान ने उन्हें बिना उचित कारण बताए टीम से ड्रॉपआउट कर दिया। बोर्ड और धोनी की यारी को भी आड़े हाथों लेते हुए वो बोले कि अगर धोनी सी बैकिंग किसी और खिलाड़ी को मिले तो वो भी महान हो जाए। तो क्या वाकई में हरभजन के साथ कप्तान और बोर्ड ने मिलकर नाइंसाफी की? या फिर उनके प्रदर्शन के गिरते ग्राफ ने उन्हें टीम से बाहर बिठाया?

निःसंदेह हरभजन भारत के सर्वश्रेष्ठ ऑफ स्पिनरों में से एक हैं। साल 2001 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्हें टीम में शामिल करने के लिए गांगुली ने बोर्ड के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। फिर जब हरभजन वो मैच खेले तो इतिहास बन चुका था। हरभजन ने भारत के लिए पहली टेस्ट हैट्रिक लेने का कारनामा कर दिखाया था। ये हरभजन का खौफ था कि टीम ऑस्ट्रेलिया उन्हें टर्बनेटर कहने लगी थी। ऑस्ट्रेलिया जब इकतरफा मैच जीत रही होती थी तब भी भज्जी उन पर हावी होते थे। इसकी बानगी 2003 विश्वकप का फाइनल मैच है जिसमें भज्जी ने इकतरफा हावी ऑस्ट्रेलिया के दो विकेट चटकाए थे। भज्जी जहाँ भारत के चौथे सबसे सफल टेस्ट गेंदबाज हैं तो पांचवे सबसे सफल एकदिवसीय गेंदबाज भी है। फिंगर स्पिन के वो शास्त्रीय खिलाड़ी है तो 'दूसरा' उनका ब्रह्मास्त्र है। वर्ष 2007 के टी- ट्वेंटी विश्वकप और वर्ष 2011 के वनडे विश्वकप की विजेता भारतीय टीम के वो सदस्य भी रहे हैं।

भज्जी का कैरियर लगभग एक दशक तक तो इतना शानदार था कि उन्हें टीम से हटाने का जोखिम कोई भी कप्तान न लेना चाहता था। मगर उनके चढ़ते कैरियर में एक दौर ऐसा भी आया जब बल्लेबाजों ने उनकी गेंदबाजी शैली को पढ़ना सीख लिया था। उनका गेंदबाजी औसत और स्ट्राइक रेट बढ़ने लगा था। इसी दौर में टीम में नए स्पिनरों की पौध भी भर्ती होने लगी थी- आर अश्विन, रविन्द्र जडेजा, कुलदीप यादव आदि। ऐसे में हरभजन की टीम में जगह को लेकर संशय की स्थिति बनने लगी थी। वर्ष 2011 से 2016 के दरम्यान वो टीम से अंदर-बाहर होते रहे और 2016 में आखिरी बार उन्होंने टीम के लिए अपना योगदान दिया था। इसके पाँच साल बाद 24 दिसम्बर 2021 को धन्यवाद-शिकायत के मिश्रित भाव के साथ उन्होंने संन्यास की घोषणा की।

हरभजन जिस टीम दादा के अहम सदस्य थे; उस दल के एक दूसरे सिपहसालार थे- युवराज सिंह। वो युवराज सिंह जिनके रोलर स्केटर को उनके पिता ने तोड़ते हुए उन्हें जबरन क्रिकेट का हिस्सा बनाया और जिसने पिता के सपने को बखूबी अंजाम भी दिया। युवी ने टीम इंडिया को दो-दो विश्वकप में विजेता बनाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी किया। टी- ट्वेंटी वर्ल्डकप 2007 में इंग्लैंड के गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड की 6 लगातार गेंदों पर उनके द्वारा लगाए गए 6 छक्के क्रिकेटप्रेमियों के जेहन में सदा के लिए ताजा रहेंगे। वर्ल्डकप 2011 में तो उन्होंने गेंद और बल्ले से कमाल करते हुए 9 मैचों में 15 विकेट सहित 90 की औसत से 362 रनों का महत्वपूर्ण अंशदान भी दिया। इस शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें मैन ऑफ द सीरीज भी चुना गया।

मैच विनर युवी के क्रिकेटीय जीवन में यू टर्न तब आ जाता है जब उन्हें कैंसर हो जाता है। इसके बाद वो इलाज के लिए अमेरिका जाते हैं और सफल कीमोथेरेपी के बाद मार्च 2012 में स्वदेश वापसी करते है। लगभग एक साल तक क्रिकेट मैदान से दूर रहने की वजह से उनका अभ्यास छूट जाता है और अभ्यास की यह कमी उनके खेल में साफ दिखती है। चूँकि 140 किमी प्रतिघंटा से अधिक रफ्तार से आती तेज गेंद पर आपको रिस्पांड करने के लिए सेकंड का एक अंश ही मिलता है और ये तकनीक निरंतर साधना से ही विकसित होती है। युवराज के खेल में ये कमी तो दिख ही रही थी, साथ ही उनका क्षेत्ररक्षण भी पहले से कमजोर हो गया था।

इसके अलावा वो गेंदबाजी से जो प्रमुख ब्रेकथ्रू दिलाते थे, वो भी उनसे अब न सध रहे थे। एक और बात जो युवराज के खिलाफ जा रही थी, वो थी इंडिया की बेंचस्ट्रेंथ का मजबूत होना। दरअसल इस समय युवा बल्लेबाजों की एक ऐसी पौध तैयार हो चुकी थी जो फिटनेस और टेक्निक के मामले में बेहद शानदार थी। भारतीय टीम में किसी बल्लेबाज द्वारा एक गलती करने और उसके दुहराव किये जाने पर उसे 7-8 महीने टीम से बाहर बैठना पड़ता था। इस दौर में युवराज संघर्ष तो कर रहे थे मगर उनके खेल पर पर बढ़ती उम्र और फिटनेस की कमी लगातार हावी हो रही थी। हालाँकि युवराज ने रणजी में अच्छे रन बनाकर टीम में वापसी भी की। साल 2013 में उन्होंने राजकोट के मैदान पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शानदार बल्लेबाजी करते हुए मैन ऑफ द मैच का खिताब भी जीता। मग़र इस बीच वो टीम से अंदर-बाहर होते रहे। साल 2017 में टीम से स्थायी तौर पर बाहर होने के पूर्व उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ शानदार 150 इन भी बनाए जो उनके कैरियर की सर्वश्रेष्ठ पारी भी थी। भारतीय टीम में जगह न मिलने के बावजूद भी युवराज घरेलू क्रिकेट खेलते रहे और 2 साल बाद 10 जून 2019 को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को सदा के लिए अलविदा कह दिया। मैदान के नायक युवराज सिंह ने अपनी विदाई की घोषणा प्रेस कांफ्रेंस के एक सादे समारोह में की थी।

युवराज सिंह के शुरूआती दौर के एक अन्य साथी खिलाड़ी थे-मोहम्मद कैफ। इन्हीं कैफ की कप्तानी में युवराज सिंह ने साल 2000 का अंडर 19 विश्वकप खेला था और भारत ने इस ट्रॉफी को जीता भी था। इसके अलावा इन दोनों खिलाड़ियों की जोड़ी ने साल 2002 के नेटवेस्ट सीरीज फाइनल के मुश्किल मुकाबले में भारत को जीत भी दिलवाई थी। इस मैच में कैफ ने नाबाद 87 रनों की पारी खेली थी। हालॉंकि कैफ की सीवी में जो बात बड़े-बड़े अक्षरों में लिखी जाती है, वो है- उनका शानदार क्षेत्ररक्षण। रॉबिन सिंह के जाने के बाद भारतीय टीम का क्षेत्ररक्षण एकदम औसत हो चला था। इसमें नई जान फूंकी- कैफ और युवराज ने। बेशक जॉन्टी रोड्स सार्वकालिक महान फील्डर हैं। मगर कैफ ने अपने अविश्वसनीय कैचों और चीते की फुर्ती के साथ किये गए रन आउटों से जो बेंचमार्क सेट किये है, वो आज भी मानीखेज हैं।

साल 2004 में इंग्लिश बल्लेबाज पॉल कोलिंगवुड का शार्ट लेग पर खड़े कैफ द्वारा किया गया शानदार रन आउट हो या फिर उसी साल पाकिस्तानी बल्लेबाज शोएब मलिक के कैच पकड़ने के लिए उनके द्वारा लॉन्ग ऑफ से मिड ऑन तक लगाई गई दौड़ हो; ये उनकी क्षेत्ररक्षण की कुशल तकनीक, सजगता और फुर्ती की बानगी भर है। मगर अफसोस इस खिलाड़ी का इंटरनेशनल क्रिकेट कैरियर महज चार साल तक ही खिंच सका। कारण कि उनकी बल्लेबाजी में वो निरंतरता और चार्म न था जो उन्हें विश्व स्तरीय भारतीय बैटिंग लाइनअप की कतार में खड़ा कर सके। ब्रेट ली, शॉन पोलॉक, शोएब अख्तर, चामिंडा वास जैसे विश्वस्तरीय गेंदबाजों के सामने उनमें कांफिडेंस की कमी साफ झलकती थी। इसके अलावा उस वक्त टीम में सुरेश रैना, रोहित शर्मा, महेंद्र सिंह धोनी जैसे बल्लेबाजों का भी प्रवेश हो रहा था जो तकनीक और क्लास के मामले में उनसे काफी आगे थे। हालांकि उन्होंने संन्यास लेने के लिए कैवल्य जितना समय लिया और 12 साल बाद साल 2018 में भारतीय क्रिकेट टीम को सदा के लिए अलविदा कह दिया।

मोहम्मद कैफ जिस भारतीय टीम को अपने शानदार क्षेत्ररक्षण से धार देते थे, उसी टीम को अपनी ओपनिंग से शानदार शुरूआत देते थे- वीरेंद्र सहवाग। सहवाग, जिनके बारे में गांगुली ने कहा था- "वो एक जुआरी है, वो एक ऐसा खिलाड़ी है जो जोखिम लेना पसंद करता है।" सहवाग थे भी कुछ ऐसे ही स्वभाव के... वर्ना 295 रन के स्कोर पर कौन खिलाड़ी छक्के मारने का जोखिम लेगा? मगर सहवाग ने न सिर्फ ये जोखिम लिया बल्कि भारत के लिए तिहरा शतक जड़ने वाले पहले बल्लेबाज भी बने। सहवाग के खेल में बेशक निरंतरता न थी मगर उनकी शॉटबुक में शानदार शॉट्स का एक गुलदस्ता था- बाउंसर पर अपर कट, देह पर आने वाली गेंद पर लेट कट, गुड लेंथ गेंद पर लॉफ्टर ड्राइव। सहवाग उस टीम का भी हिस्सा थे जिसने साल 2011 में भारत को विश्वकप का विजेता बनाया था। सहवाग ने टेस्ट क्रिकेट में शानदार स्ट्राइक रेट के साथ स्कोर बोर्ड को तेजी के साथ आगे बढ़ाने की जो परिपाटी शुरू की थी, उसके शिखर स्वरूप को अब भारतीय टीम के द्वारा अनुसरित किया जा रहा है।

साल 2011 के बाद से ही उनके कैरियर में उतार का दौर आने लगा था। उनको टीम से अंदर-बाहर किया जाने लगा था। उस वक्त इसकी तमाम वजहें बताई जाती थी; कोई उनके खराब खेल को दोष देता तो कोई धोनी से उनकी अदावत को टीम से बाहर रहने की मुख्य वजह बताता। मगर सच ये है कि क्रिकेट तकनीक का खेल है और तकनीक के मामले में सहवाग थोड़ा उन्नीस जरूर रहे हैं, अपने दौर के साथी खिलाड़ियों से। हां! वो आक्रामक जरूर थे मगर ये शानदार शैली उनके आँख-हाथ समन्वय का ज्यादा परिणाम थी बनिस्बत उनकी तकनीक के। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में जिस आंगिक अभिनय का उल्लेख है उसके क्रिकेटीय स्वरूप को सहवाग ने ईजाद किया। चपल आंखों और तेज हाथों के साथ उन्होंने लगभग 8-10 सालों तक कई मौकों पर टीम को तेज शुरुआत देने के साथ एक बड़ा स्कोर खड़ा करने में भी मदद की। हालॉंकि उनके खेल में फुटवर्क की कमी थी, देह पर आती गेंद को काटने के चक्कर मे अक्सर वो अपना विकेट गंवा देते थे और स्टंप के पार जाकर खेलने की वजह से उनकी पारी ज्यादा लंबी न खिंच पाती थी। निर्भीक और आक्रामक बल्लेबाज सहवाग ने साल 2013 में अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेला। और इसके लगभग दो साल बाद 20 अक्टूबर 2015 को क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास ले लिया।

संकर्षण शुक्ला

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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