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भारतीय राजनीति

मौलिक अधिकार एवं नीति निदेशक तत्वों में संबंध

  • 10 Aug 2020
  • 7 min read

मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्त्व दोनों ही संवैधानिक ढाँचे के अभिन्न अंग हैं। ये दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और इन्हें एक-दूसरे के संदर्भ में देखा जाना चाहिये।जहाँ मौलिक अधिकार व्यक्तिगत कल्याण को प्रोत्साहन देते हैं वहीं नीति निदेशक तत्त्व समुदाय के कल्याण को प्रोत्साहित करते हैं।

मौलिक अधिकार नीति निदेशक तत्वों से अधिक महत्वपूर्ण-

  • मौलिक अधिकार राजनीतिक स्वतंत्रता और समानता को बढ़ावा देते हैं जो कि लोकतंत्र का आधार हैं, जबकि नीति निदेशक तत्त्व समग्र विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें समाजवाद, उदारवाद, गांधीवाद जैसे मूल्यों का समायोजन है।
  • मौलिक अधिकारों को संविधान का सरंक्षण प्राप्त है और वे न्याय योग्य हैं, जबकि नीति निदेशक तत्त्वों को नहीं। अतः इस दृष्टिकोण से मौलिक अधिकार अधिक महत्वपूर्ण है।
  • मौलिक अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास के लिये अनिवार्य रूप से संसाधन उपलब्ध कराता है जबकि नीति निदेशक तत्त्व संसाधनों पर निर्भर है।

नीति निदेशक तत्त्व मौलिक अधिकारों से अधिक मजबूत -

  • मौलिक अधिकारों पर युक्ति-युक्त निर्बंधन लोक-व्यवस्था, देश की एकता-अखंडता  और सदाचार आदि के आधार पर किया जाता है।
  • मौलिक अधिकारों में संशोधन का आधार भी नीति निदेशक तत्त्व होते है। जैसे संपत्ति के अधिकार को कानूनी अधिकार बनाना व 86वाँ संविधान संशोधन का आधार भी नीति निदेशक तत्त्व है।
  • संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक-आर्थिक न्याय पर अधिक बल दिया गया है जिससे नीति निदेशक तत्त्वों का महत्व स्पष्ट होता है। 

मौलिक अधिकार व नीति निदेशक तत्त्व पूरक अवधारणा -

  • मौलिक अधिकार राजनीतिक न्याय की स्थापना करता है, जबकि नीति निदेशक तत्त्व सामाजिक तथा आर्थिक न्याय को बढ़ावा देते हैं। दोनों के पूरक होने से समग्र लोकतांत्रिक व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।
  • मौलिक अधिकार व्यक्तिगत हितों पर बल देते हैं अतः दोनों पूरक होकर व्यक्ति और समाज में संतुलन स्थापित कर सकते हैं।
  • मौलिक अधिकार बताता है कि नागरिकों को क्या दिया जा चुका है जबकि नीति निदेशक तत्त्व बताते हैं कि और क्या दिया जाना बाकी है। इस तरह नीति निदेशक तत्त्व मौलिक अधिकार का मार्गदर्शन करता है।
  • सज्जन सिंह बनाम राजस्थान मामले में कहा गया कि निदेशक तत्त्व देश के शासन के आधारभूत सिद्धांत हैं और संविधान के भाग 3 के उपबंध को इन सिद्धांतों के साथ ही समझा जाना चाहिये।
  • मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ मामले में भाग 3 और भाग 4 को एक दूसरे का पूरक बताया गया। उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश मामले में स्पष्ट किया गया  कि भाग 3 एवं भाग 4 एक दूसरे के सहायक हैं।

न्यायपालिका में मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्त्व-

  • चंपकम दोरायराजन बनाम मद्रास राज्य वाद 1951 में सर्वप्रथम यह विवाद सामने आया कि मौलिक अधिकार तथा नीति निदेशक तत्त्व में किसे सर्वोच्चता दी जाए। न्यायालय ने निर्णय दिया कि मौलिक अधिकार प्राथमिक हैं और नीति निदेशक तत्त्व सहायक रूप में है, अतः मौलिक अधिकार सर्वोच्च है।
  • इस निर्णय को प्रभावित करने हेतु प्रथम संविधान संशोधन 1951 द्वारा कहा गया कि सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग हेतु विशेष उपबंध किया जा सकता है। साथ ही द्वितीय संविधान संशोधन 1955 द्वारा कहा गया कि अगर राज्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिये संपत्ति का अधिग्रहण करता है और कुछ मुआवज़ा देता है तो इसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद, 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने मूल अधिकारों में संशोधन की मनाही कर दी और निदेशक तत्त्व की स्थिति मौलिक अधिकार के अधीनस्थ के रूप में हो गई।
  • उपरोक्त निर्णय को प्रभावी बनाने हेतु 24वाँ संशोधन 1971 लाया गया और कहा गया कि संसद मौलिक अधिकार संविधान के सभी भागों में संशोधन कर सकती हैं।
  • 25वाँ संशोधन द्वारा अनुच्छेद 31 जोड़कर कहा गया कि 39b, 39c में समाजवादी तत्त्व विद्यमान है जिन्हें लागू करने पर अगर अनुच्छेद 10 19, 31 जैसे मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो वो मान्य नहीं होगा।
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद 1973 में 24 और 25 वें संशोधन को चुनौती दी गई जहां कोर्ट ने इन्हें संवैधानिक घोषित किया और कहा कि ये मूल ढाँचे का उल्लंघन नहीं करते।
  • आगे चलकर 42वें संशोधन 1976 द्वारा विस्तार  दिया गया और कहा गया कि किसी भी नीति निदेशक तत्त्व को लागू करने से किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो वह मान्य नहीं होगा ।
  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ वाद 1980 में 42वें संशोधन को चुनौती दी गई। न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया और कहा कि मौलिक अधिकार एवं निदेशक तत्त्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इन्हें अलग-अलग करके नहीं देखना चाहिये।
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