मध्य प्रदेश Switch to English
मध्य प्रदेश स्पेसटेक पॉलिसी-2026 को स्वीकृति मिली
चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल ने राज्य में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी नवाचार, विनिर्माण और रोज़गार सृजन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्पेसटेक पॉलिसी-2026 के कार्यान्वयन को स्वीकृति दे दी है।
मुख्य बिंदु:
- नीति अनुमोदन: अंतरिक्ष-संबंधित उद्योगों और डाउनस्ट्रीम अनुप्रयोगों के लिये एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र बनाने हेतु स्पेसटेक पॉलिसी-2026 को मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृति दी गई।
- उद्देश्य: मध्य प्रदेश को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, सैटेलाइट विनिर्माण, भू-स्थानिक सेवाओं और संबद्ध नवाचार का एक प्रमुख केंद्र बनाना।
- मुख्य क्षेत्र: यह सैटेलाइट निर्माण, अंतरिक्ष-ग्रेड घटकों, भू-स्थानिक विश्लेषण, डेटा एनालिटिक्स और डाउनस्ट्रीम स्पेस अनुप्रयोगों को बढ़ावा देती है।
- निवेश: अगले पाँच वर्षों में लगभग ₹1,000 करोड़ के निवेश को आकर्षित करने की उम्मीद है।
- औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र: यह नीति MP के औद्योगिक पार्कों, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टरों, विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति और कुशल मानव संसाधन का लाभ उठाती है।
- अंतरिक्ष अनुप्रयोगों का उपयोग: कृषि, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन, अवसंरचना निगरानी और सुशासन में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग को प्रोत्साहित करती है।
- सुशासन एवं नवाचार: अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में स्टार्ट-अप, निजी क्षेत्र की भागीदारी, अनुसंधान एवं विकास सहयोग तथा उद्योग-शैक्षणिक साझेदारियों को बढ़ावा देती है।
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और पढ़ें: स्पेसटेक पॉलिसी-2026, स्टार्टअप्स |
राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स Switch to English
गुजरात में हाई-रिस्क पैथोजेन हेतु भारत की पहली राज्य-वित्तपोषित BSL-4 लैब
चर्चा में क्यों?
गुजरात में भारत की पहली राज्य-वित्तपोषित बायोसेफ्टी लेवल-4 (BSL-4) प्रयोगशाला की आधारशिला रखी गई। यह सुविधा भारत में उच्च-संरक्षण अनुसंधान के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जो पहले केवल केंद्रीय सरकारी संस्थानों तक सीमित था।
मुख्य बिंदु:
- समेकित परिसर: यह लैब बहु-स्तरीय संरचना के रूप में तैयार की गई है, जिसमें BSL-4, BSL-3 और BSL-2 मॉड्यूल शामिल हैं।
- पशु अनुसंधान: महत्त्वपूर्ण रूप से, इसमें ABSL-3 और ABSL-4 (एनिमल बायोसेफ्टी लेवल) मॉड्यूल भी शामिल हैं, जो वैज्ञानिकों को घातक वायरस के जीवित प्राणियों के साथ परस्पर क्रिया का अध्ययन करने में सक्षम बनाते हैं, जो वैक्सीन विकास की एक आवश्यक प्रक्रिया है।
- वित्तपोषण मॉडल: भारत की मौजूदा BSL-4 लैब्स (जैसे पुणे स्थित NIV) जो ICMR द्वारा केंद्रीय रूप से वित्तपोषित है, उनसे अलग यह परियोजना पहली ऐसी पहल है जिसे किसी राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित और प्रबंधित किया जा रहा है।
- समयरेखा: COVID-19 महामारी से स्थानीय स्तर पर निदान क्षमता और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता का एहसास होने के बाद, इस उच्च-सुरक्षा केंद्र की योजना का प्रारंभ वर्ष 2022 के मध्य में किया गया।
- महामारी तैयारी: यह सुविधा गुजरात को ‘डिज़ीज़ X’ या किसी नए वायरल प्रकोप की पहचान और अनुसंधान स्थानीय स्तर पर करने में सक्षम बनाएगी, जिससे सभी नमूनों को पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और प्रतिक्रिया समय में महत्त्वपूर्ण बचत होगी।
- वन हेल्थ दृष्टिकोण: एनिमल बायोसेफ्टी (ABSL) मॉड्यूल्स को एकीकृत करके, यह लैब ‘वन हेल्थ’ फ्रेमवर्क का समर्थन करती है, जो मानवीय, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच संबंध को स्वीकार करती है तथा जूनोटिक रोग प्रसार को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बायोसेफ्टी लेवल (BSL)
- BSL-1 और BSL-2: इनका उपयोग मध्यम जोखिम वाले रोगजनकों (जैसे E. coli या सामान्य फ्लू) के लिये किया जाता है, जो मनुष्यों में हल्की बीमारी उत्पन्न करते हैं।
- BSL-3: इसका उपयोग स्वदेशी या विदेशी रोगजनकों के लिये किया जाता है, जो गंभीर या संभावित रूप से घातक बीमारी का कारण बन सकते हैं और वायु के माध्यम से फैल सकते हैं (उदाहरण: क्षय रोग, SARS-CoV-2)।
- BSL-4 (उच्च-संरक्षण स्तर): यह स्तर अत्यंत खतरनाक एवं दुर्लभ रोगजनकों के लिये होता है, जो जीवन-घातक बीमारी का उच्च जोखिम उत्पन्न करते हैं, जिनके लिये कोई ज्ञात टीका या उपचार उपलब्ध नहीं होता और जो एरोसोल के माध्यम से आसानी से फैल सकते हैं।
- उदाहरण: इबोला, मारबर्ग और निपाह वायरस।
राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स Switch to English
विश्व आर्थिक मंच ने ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2026 जारी की
चर्चा में क्यों?
विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2026 जारी की है, जो वैश्विक जोखिम धारणाओं और संभावित खतरों के उसके वार्षिक मूल्यांकन का 21वाँ संस्करण है।
मुख्य बिंदु:
- प्रतिस्पर्द्धा का युग: रिपोर्ट 2026 में वैश्विक जोखिम परिदृश्य की प्रमुख विशेषता के रूप में ‘अनिश्चितता’ को रेखांकित करती है और इस तर्क पर प्रकाश डालती है कि विश्व ‘प्रतिस्पर्द्धा के युग’ में प्रवेश कर रहा है, जहाँ भू-राजनीतिक और आर्थिक टकराव सहयोग को पीछे छोड़ रहे हैं तथा पारंपरिक बहुपक्षीय प्रणालियाँ दबाव में हैं।
- शीर्ष अल्पकालिक खतरा: तात्कालिक परिदृश्य (2028 तक) में आर्थिक और भू-राजनीतिक तनावों ने पर्यावरणीय चिंताओं को तात्कालिकता के मामले में पीछे छोड़ दिया है।
- भूराजनीतिक-आर्थिक टकराव: वर्ष 2025 में तीसरे स्थान से यह अब पहले स्थान पर आ गया है। इसमें शुल्क, प्रतिबंध और निवेश सीमाओं के माध्यम से व्यापार का ‘हथियारीकरण’ शामिल है।
- गलत सूचना और दुष्प्रचार: AI द्वारा बनाए गए डीपफेक्स के बढ़ते प्रसार के कारण, विशेषकर चुनावी अवधियों में सामाजिक स्थिरता पर गंभीर खतरे उत्पन्न हो रहे हैं।
- सामाजिक ध्रुवीकरण: लोकतांत्रिक प्रणालियों और सार्वजनिक विश्वास पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
- अत्यधिक मौसमी घटनाएँ: कम समय की अहमियत के मामले में वे दूसरे से चौथे स्थान पर आ गए हैं। हालाँकि वे दीर्घकालिक समय के लिये सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं।
- दीर्घकालिक जोखिम (10-वर्षीय परिदृश्य): पर्यावरणीय खतरे आगामी दशक के परिदृश्य में प्रमुख बने हुए हैं, जिनमें अत्यधिक मौसमी घटनाएँ और जैव-विविधता ह्रास को सबसे गंभीर जोखिम के रूप में रैंक किया गया है।
- विशेष रूप से, AI तकनीकों के प्रतिकूल परिणाम गंभीरता के मामले में सबसे बड़ी बढ़त दर्ज करते हुए अल्पकालिक सूची में 30वें स्थान से बढ़कर 10-वर्षीय परिदृश्य में 5वें स्थान पर पहुँच गए।
- भारत के लिये प्रमुख निष्कर्ष: रिपोर्ट ने अगले दो वर्षों में भारत को प्रभावित करने की सबसे अधिक संभावना वाले विशिष्ट ‘हॉट स्पॉट’ जोखिमों की पहचान की है—
- साइबर असुरक्षा: भारत में डिजिटल भुगतान और डिजिटल अवसंरचना की तीव्र वृद्धि के कारण इसे शीर्ष जोखिम के रूप में रैंक किया गया है।
- संपत्ति और आय असमानता: आंतरिक सामाजिक अस्थिरता का प्रमुख कारक है।
- महत्त्वपूर्ण अवसंरचना और संसाधन सुरक्षा: ‘जल सुरक्षा’ को एक बड़े विवाद बिंदु के रूप में रेखांकित किया गया है, विशेषकर सिंधु नदी बेसिन के संदर्भ में।
- आर्थिक बाह्य आघात: वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों और अंतर्राष्ट्रीय शुल्कों के प्रति संवेदनशीलता।
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