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राजस्थान स्टेट पी.सी.एस.

  • 14 Jan 2026
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राजस्थान की बामनवास कांकड़ पहली पूर्ण जैविक पंचायत बनी

चर्चा में क्यों?

राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ ज़िले की बामनवास कांकड़ पंचायत राज्य ही नहीं बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की पहली पूर्णतः जैविक-प्रमाणित पंचायत बन गई है।

मुख्य बिंदु:

  • प्रमाणीकरण: COFED (कोफार्मिन फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनिक सोसाइटीज़ एंड प्रोड्यूसर कंपनीज़) द्वारा प्रमाणन सुगम बनाया गया।
    • COFED ने जैविक मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिये तकनीकी और बाज़ार सहायता प्रदान की।
    • पंचायत को नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन (NPOP) मानकों के तहत पूर्णतः जैविक पंचायत के रूप में प्रमाणित किया गया।
  • समुदाय-आधारित पहल: रासायनिक-मुक्त कृषि का परिवर्तन स्थानीय निवासियों, विशेषकर महिला किसानों द्वारा संचालित था, जो मृदा के क्षरण, भूजल समस्याओं और रसायनों से स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण प्रेरित हुआ।
  • रसायन-मुक्त कृषि की प्रतिज्ञा: किसानों ने सिंथेटिक उर्वरकों और रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग न करने की शपथ ली।
  • सतत विकास का मॉडल: यह पंचायत जैविक कृषि, पशुपालन और पर्यावरण संरक्षण को जोड़कर सतत ग्रामीण विकास का एक ऐसा मॉडल निर्मित करती है जिसे अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।

और पढ़ें: राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP), जैविक कृषि, पर्यावरण संरक्षण


राष्ट्रीय करेंट अफेयर्स Switch to English

अरलम तितली अभयारण्य

चर्चा में क्यों?

केरल सरकार ने कन्नूर ज़िले के अरलम वन्यजीव अभयारण्य का आधिकारिक रूप से नाम बदलकर अरलम तितली अभयारण्य कर दिया है।

मुख्य बिंदु:

  • सूचना: इस नाम परिवर्तन की आधिकारिक सूचना वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत जारी की गई।
  • कारण: क्षेत्र में तितली प्रजातियों की समृद्ध विविधता और संख्या के कारण तथा उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा एवं संवर्द्धन की आवश्यकता के चलते।
    • तितली विविधता: अरलम में लगभग 266 तितली प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो केरल की कुल तितली विविधता का 80% से अधिक हैं।
    • स्थानीय प्रजातियाँ: अरलम में 27 प्रजातियाँ केवल पश्चिमी घाटों में ही पाई जाती हैं।
  • WP अधिनियम के तहत सुरक्षा: अरालम में दर्ज 6 तितली प्रजातियाँ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में सूचीबद्ध हैं।
  • ऐतिहासिक स्थिति: अरलम क्षेत्र को मूल रूप से वर्ष 1984 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था।
  • वैश्विक महत्त्व: यह अभयारण्य पश्चिमी घाटों का हिस्सा होने के नाते वैश्विक पारिस्थितिक महत्त्व  रखता है, जिसे UNESCO ने विश्व प्राकृतिक धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी है।
  • सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव: नाम परिवर्तन से जैव विविधता संरक्षण को मज़बूत करने, पर्यावरणीय शिक्षा, इकोटूरिज़्म को बढ़ावा देने और तितलियों की संख्या की सुरक्षा में समुदाय की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की उम्मीद है।

और पढ़ें: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, IUCN रेड लिस्ट, UNESCO


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