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उत्तर प्रदेश

SC को सार्वजनिक स्थानों से रोकने के सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश में

  • 10 Mar 2026
  • 15 min read

चर्चा में क्यों?

NCRB की वर्ष 2023 की ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जातियों को सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करने के मामले में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत 180 मामले दर्ज किये गए, जिनमें से 173 मामले (96% से अधिक) केवल उत्तर प्रदेश से सामने आए।

मुख्य बिंदु: 

  • SC भेदभाव की प्रवृत्ति: वर्ष 2017 से अनुसूचित जातियों को सार्वजनिक स्थानों जैसे सामुदायिक क्षेत्र, साझा भूमि और सामाजिक स्थलों तक पहुँच से वंचित करने के मामलों में वृद्धि हुई है। यह कानूनी सुरक्षा के बावजूद जारी सामाजिक बहिष्कार को दर्शाता है।
    • ऐसी घटनाओं में उत्तर प्रदेश का हिस्सा सबसे अधिक है, जो राज्य में सार्वजनिक जीवन में जाति-आधारित बहिष्कार से जुड़ी गहरी चुनौतियों की ओर संकेत करता है।
    • अन्य रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2021 से अत्याचार के विरुद्ध राष्ट्रीय हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों में सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करने, सामाजिक बहिष्कार और जाति-आधारित दुर्व्यवहार से संबंधित शिकायतों का बड़ा हिस्सा शामिल है, जिनमें सबसे अधिक कॉल उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुई हैं।
  • SC/ST अधिनियम: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत SC समुदाय को सार्वजनिक स्थानों तक पहुँच से वंचित करना तथा अन्य भेदभावपूर्ण कृत्य प्रतिबंधित हैं और ऐसे अपराध दंडनीय हैं।
  • संवैधानिक अधिकार: भारत का संविधान अनुच्छेद 14 और 15 के तहत विधि के समक्ष समानता की गारंटी देता है और जाति के आधार पर भेदभाव को, विशेषकर सार्वजनिक स्थानों में प्रतिबंधित करता है।
  • सामाजिक बहिष्कार: कानूनी संरक्षण के बावजूद ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बना हुआ है, जिसके कारण आज भी कई घटनाओं में SC समुदाय को सार्वजनिक सेवाओं तथा सामुदायिक सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है।
  • महत्त्व: यह स्थिति कानून के क्रियान्वयन में कमियों, क्षेत्रीय असमानताओं और SC समुदाय के अधिकारों की मज़बूत सुरक्षा की आवश्यकता को उजागर करती है।

और पढ़ें: SC और ST अधिनियम 1989, भारत का संविधान

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