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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    चीन के साथ 1962 का युद्ध चीनी आक्रामकता की बजाय एक व्यावहारिक भारतीय विदेश नीति की अनुपस्थिति का परिणाम अधिक था। टिप्पणी कीजिये। (250 शब्द)

    14 Dec, 2019 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    प्रश्न विच्छेद

    • 1962 के भारत-चीन युद्ध के संदर्भ में बताएँ कि यह चीनी आक्रामकता का परिणाम था या फिर व्यावहारिक भारतीय विदेशी नीति की अनुपस्थिति का।

    हल करने का दृष्टिकोण

    • 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि बताते हुए उत्तर आरंभ करें।

    • क्या यह युद्ध चीनी आक्रामकता की बजाय भारतीय कुशल विदेश नीति की अनुपस्थिति का परिणाम था?

    • प्रभावी निष्कर्ष लिखें।

    भारत-चीन के मध्य हुए 1962 के युद्ध में भारत की पराजय भारतीयों के स्वाभिमान पर गहरा धक्का था। वस्तुत: तिब्बत मुद्दे से उपजे विवाद व दलाई लामा का भारत प्रवासन चीन को रास नहीं आया परिणामस्वरूप कटुता का दौर पुरज़ोर तरीके से आरंभ हो गया, जिसकी परिणति के रूप में युद्ध आरंभ हुआ। इस युद्ध में भारी संख्या में चीनी फौजियों द्वारा नेफा चौकी पर हमला कर कब्ज़ा कर लिया गया। इस युद्ध को लेकर विद्वानों द्वारा नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराया गया। उनके द्वारा यहाँ तक कहा गया कि यह युद्ध नेहरू की विदेश नीति की अदूरदर्शिता का परिणाम है।

    लेकिन यदि तत्कालीन परिस्थितियों पर गौर करें तो उपरोक्त आरोप उचित प्रतीत होता दिखाई नहीं देता। वस्तुत: भारत चीन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध का पक्षधर रहा है और प्रत्येक स्तर पर चीन के पुरज़ोर समर्थन का हिमायती भी। भारत ने अपनी आंतरिक समस्याओं के निराकरण पर अधिक बल देने को प्राथमिकता प्रदान की क्योंकि यह तत्कालीन समय की आवश्यकता भी थी। पाकिस्तान से भी भारत के संबंध कटु थे, ऐसे में चीन के साथ भी संबंध खराब कर भारत दोनों का शत्रु नहीं बनाना चाहता था क्योंकि इससे आर्थिक विकास संभव नहीं हो पाता। अत: भारत युद्ध जैसी परिस्थिति को टालने का प्रयास कर रहा था और शांति स्थापना हेतु लगातार प्रयास कर रहा था। यही कारण था कि भारत द्वारा चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता हेतु समर्थन भी दिया गया।

    दूसरी तरफ चीन द्वारा तिब्बत पर कब्ज़ा किये जाने से लगातार झड़प होने की भी आशंका बनी हुई थी परंतु भारत इस बात से भी पूरी तरह आश्वस्त था कि चीन अभी विस्तारवाद के पक्ष में नहीं है क्योंकि अभी उसके समक्ष कई सारी समस्याएँ विद्यमान थीं। लेकिन फिर भी अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने व चीन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से भारत ने सोवियत संघ के साथ राजनयिक संबंध बेहतर करने पर बल अवश्य दिया।

    चीन के साथ बिगड़ते रिश्ते को देखते हुए भारत को लग रहा था कि यह छोटी-मोटी झड़प जैसा होगी लेकिन उसे इतनी विशालता का अनुमान नहीं था जितना कि देखने को मिला। इस संदर्भ में देखा जाए तो नेहरू ने हमले के स्वरूप को समझने में गलती अवश्य की लेकिन यह कहना कि व्यावहारिक भारतीय विदेशी नीति अनुपस्थित थी, तार्किक नहीं हैं।

    यदि इसके विश्लेषण पर सूक्ष्मता से गौर किया जाए तो भारत को इस युद्ध का अंदाजा तक नहीं था वैसे भी भारत को इससे कुछ प्राप्त होने वाला नहीं था। यह तो चीन के उद्देश्यों की परिपूर्ति करने में निहित था जिसका प्रमुख कारण दलाई लामा का भारत में शरण लेना था। दूसरी तरफ, चीन भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कमज़ोर करना चाहता था।

    साथ ही, चीन दर्शाना चाहता था कि भारत कि शांति और गुटनिरपेक्षता की नीति अव्यावहारिक है, जिसके पीछे उद्देश्य था कि दबाव में आकर भारत गुटनिरपेक्षता व शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति को त्याग देगा और फिर एशिया तथा अप्रीका के अन्य देश चीन का नेतृत्व स्वीकार कर लेंगे।

    इस प्रकार 1962 का युद्ध चीनी आक्रामकता का परिचायक था, न कि भारतीय विदेश नीति की विफलता का परिणाम। हालाँकि इस संदर्भ में कुछ स्तरों पर भारत से चूक अवश्य हुई जिसे युद्ध के स्वरूप व युद्ध की पूर्ण तैयारी न होने के संदर्भ में समझा जा सकता है।

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