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31 Jul 2025
सामान्य अध्ययन पेपर 4
केस स्टडीज़
दिवस 40: आप एक वरिष्ठ अधिकारी हैं और अंतर्राष्ट्रीय जलवायु शिखर सम्मेलन में भारत के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य हैं। यह सम्मेलन एक ऐसे महत्त्वपूर्ण मोड़ पर है जहाँ विकसित देश इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं सहित सभी देश तुरंत उच्च उत्सर्जन कटौती लक्ष्य अपनाएँ। इन देशों का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन की तात्कालिकता को देखते हुए विनाशकारी परिणामों से बचने के लिये एकीकृत और महत्त्वाकांक्षी वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता है।
हालाँकि, भारत का मानना है कि वैश्विक उत्सर्जन में उसका ऐतिहासिक योगदान न्यूनतम है और उसके विकास पथ, विशेषकर उन लाखों लोगों के लिये जिनके पास अभी भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, को तीव्र कार्बन तटस्थता के नाम पर समझौता नहीं किया जाना चाहिये।
भारत की यह स्थिति समता (Equity) और सामान्य परंतु विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR) के सिद्धांतों पर आधारित है और यह मानती है कि विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी और अधिक वित्तीय क्षमता के आधार पर अधिक प्रयास करने चाहिये। हालाँकि इस रुख का घरेलू स्तर पर पुरज़ोर समर्थन है, लेकिन भारत पर जलवायु कार्रवाई पर आम सहमति को अवरुद्ध करने का आरोप लगाते हुए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है।
इसी बीच एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक (नीतिगत शोध संस्थान) आपको एक प्रमुख विदेशी विश्वविद्यालय में एक प्रतिष्ठित फैलोशिप का प्रस्ताव देता है। यद्यपि वे स्पष्ट रूप से कोई शर्त नहीं रखते, परंतु यह संकेत मिलता है कि भारत के कठोर रुख को बदलने में आपका समर्थन आपको यह अवसर प्राप्त करने में सहायता कर सकता है।
आपको संदेह है कि यह प्रस्ताव पूरी तरह से परोपकारी नहीं है और आपकी निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, आपके एक सहकर्मी ने आपको चेतावनी दी है कि यदि भारत की स्थिति में कोई लचीलापन नहीं दिखाया गया, तो इससे भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को नुकसान हो सकता है और भविष्य में तकनीक अंतरण तथा जलवायु वित्त सहयोग में भी बाधा आ सकती है।
A. वैश्विक मंच पर राष्ट्रीय हित का प्रतिनिधित्व करने वाले एक लोक सेवक के रूप में आपको किन नैतिक मुद्दों का सामना करना पड़ता है?
B. आप वैश्विक नैतिक उत्तरदायित्वों और राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के बीच संघर्ष से कैसे निपटेंगे?
C. आपको इस प्रस्ताव पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देनी चाहिये? ऐसी वार्ताओं का मार्गदर्शन किन नैतिक मूल्यों और कूटनीतिक सिद्धांतों द्वारा किया जाना चाहिये?उत्तर
हल करने का दृष्टिकोण:
- राष्ट्रीय लक्ष्यों (विकास और समानता) और वैश्विक ज़िम्मेदारियों (जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई) के बीच परस्पर विरोधी हितों का अभिनिर्धारण कीजिये।
- प्रत्येक कार्रवाई के निहितार्थों का विश्लेषण कीजिये तथा लोक सेवा, निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा जैसे नैतिक सिद्धांतों पर गहन विचार प्रस्तुत कीजिये।
- ऐसा समाधान प्रदान कीजिये जो राष्ट्रीय और वैश्विक हितों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए नैतिक मानकों का पालन करते हुए, निर्णय लेने में निष्पक्षता एवं उत्तरदायित्व सुनिश्चित करे।
परिचय:
एक अंतर्राष्ट्रीय जलवायु शिखर सम्मेलन में भारत के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल में एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में, आप जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने की चुनौतीपूर्ण स्थिति में हैं। भारत पर एक ओर अंतर्राष्ट्रीय दबाव है कि वह उत्सर्जन में कटौती के लिये अधिक कड़े लक्ष्य अपनाए, वहीं दूसरी ओर उसे अपने विकासात्मक आवश्यकताओं की भी रक्षा करनी है। इसी दौरान आपको एक प्रतिष्ठित फेलोशिप का प्रस्ताव मिलता है, जो आपकी निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।
हितधारक:
हितधारक
भूमिका/हित
आप (वरिष्ठ अधिकारी)
नैतिक सत्यनिष्ठा बनाए रखते हुए भारत के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भारत
एक विकासशील देश जो जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई और विकास लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है।
विकसित देश
तत्काल आवश्यकता पर बल देते हुए कठोर वैश्विक जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई पर ज़ोर दे रहे हैं।
इंटरनेशनल थिंक टैंक
भारत के रुख को प्रभावित करने की एक सूक्ष्म अपेक्षा के साथ, फेलोशिप प्रदान करना।
घरेलू समर्थक
समानता और विभेदित ज़िम्मेदारियों पर भारत के रुख की अनुशंसा करना।
वैश्विक समुदाय
जलवायु परिवर्तन के प्रति एक एकीकृत वैश्विक प्रतिक्रिया का अन्वेषण।
भावी पीढ़ियाँ
दीर्घकालिक सतत् विकास और जलवायु परिवर्तन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण में रुचि रखती हैं।
A. राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक लोक सेवक के रूप में सामने आने वाले नैतिक मुद्दे:
- ईमानदारी बनाम कूटनीतिक दबाव: एक लोक सेवक के रूप में, आपका प्राथमिक कर्त्तव्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना और जलवायु परिवर्तन पर भारत के रुख का प्रतिनिधित्व करना है। हालाँकि, भारत के रुख को बदलने के लिये अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है, जिससे राष्ट्रीय संप्रभुता एवं वैश्विक कूटनीति के बीच टकराव उत्पन्न हो रहा है।
- लोक सेवा बनाम व्यक्तिगत लाभ: इंटरनेशनल थिंक टैंक की ओर से यह प्रस्ताव हितों के टकराव का एक संभावित उदाहरण है, क्योंकि इसे स्वीकार करने से आपकी निष्पक्षता से समझौता हो सकता है और राष्ट्रीय हित के बजाय व्यक्तिगत लाभ पर आधारित निर्णय लिये जा सकते हैं।
- वैश्विक नैतिक उत्तरदायित्व बनाम राष्ट्रीय विकास: जलवायु परिवर्तन के लिये वैश्विक उत्तरदायित्व और भारत के विकास के अधिकार के बीच संतुलन बनाना एक नैतिक चुनौती है। उत्सर्जन में भारत का ऐतिहासिक योगदान न्यूनतम है और कार्बन उत्सर्जन में तीव्रता से कमी इसके विकास एवं बुनियादी अवसंरचनाओं तक पहुँच में बाधा बन सकती है।
B. वैश्विक नैतिक ज़िम्मेदारियों और राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के बीच असंगतता:
- वैश्विक नैतिक ज़िम्मेदारी: वैश्विक समुदाय एक ऐसे जलवायु संकट का सामना कर रहा है जिसके लिये तत्काल, समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है। हालाँकि, समानता का नैतिक सिद्धांत इस विचार का समर्थन करता है कि विकसित देशों, जिनका उत्सर्जन में ऐतिहासिक योगदान अधिक है और वित्तीय क्षमता अधिक है, को ज़िम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा उठाना चाहिये।
- राष्ट्रीय विकास लक्ष्य: भारत की प्राथमिकता उसकी विकासात्मक आवश्यकताएँ होनी चाहिये, विशेषकर उन लाखों लोगों के लिये जिनके पास अभी भी बुनियादी अवसंरचनाओं तक पहुँच नहीं है।
- तेज़ी से उत्सर्जन में कमी आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकती है तथा असमानताओं को और गहरा कर सकती है।
- हितों में संतुलन: इसका समाधान अलग-अलग ज़िम्मेदारियों में निहित है। भारत अपने विकास पथ के आधार पर लचीले लक्ष्यों की अनुशंसा कर सकता है, विकसित देशों से अधिक योगदान की माँग करते हुए, क्रमिक, समान जलवायु कार्रवाई के लिये प्रतिबद्ध हो सकता है जो उसके विकास में बाधा न डाले।
C. फेलोशिप प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया:
- नैतिक दुविधा: थिंक टैंक का प्रस्ताव हितों के टकराव को दर्शाता है। हालाँकि यह फेलोशिप प्रतिष्ठित है, लेकिन इसका निहितार्थ—जलवायु परिवर्तन पर भारत के रुख में बदलाव, भारत के सर्वोत्तम हितों को पूरा करने की आपकी नैतिक ज़िम्मेदारी को कमज़ोर कर सकता है।
- सुझाव: आपको इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देना चाहिये या कम से कम, सरकार के भीतर उपयुक्त अधिकारियों को स्थिति से अवगत कराना चाहिये। अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में जनता का विश्वास तथा ईमानदारी बनाए रखने के लिये पारदर्शिता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- नैतिक मूल्य: ईमानदारी, जवाबदेही और जनता के विश्वास को आपकी प्रतिक्रिया का मार्गदर्शन करना चाहिये। हितों के टकराव और राष्ट्र के प्रति निष्ठा के सिद्धांतों को व्यक्तिगत उन्नति पर हावी होना चाहिये।
D. वार्ता का मार्गदर्शन करने के लिये नैतिक मूल्य और कूटनीतिक सिद्धांत:
- समानता और न्याय: साझा लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियों (CBDR) के सिद्धांत को बनाए रखने की आवश्कता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि विकसित देश अपने ऐतिहासिक उत्सर्जन और अधिक संसाधनों के कारण जलवायु परिवर्तन से निपटने में अधिक ज़िम्मेदारी लें।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: अपने व्यवहार में पारदर्शी रहने की आवश्कता है, विशेषकर उन बाह्य प्रस्तावों के संबंध में जो हमारे निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं। जनहित को हमेशा व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखा जाना चाहिये।
- दीर्घकालिक संवहनीयता: एक संतुलित दृष्टिकोण की अनुशंसा की जानी चाहिये, जो जलवायु-परिवर्तन कार्रवाई और विकास आवश्यकताओं, दोनों पर विचार करे, यह सुनिश्चित करते हुए कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों में योगदान करते हुए भारत के विकास पथ से समझौता न हो।
निष्कर्ष:
जैसा कि जॉन रॉल्स ने कहा था, “न्याय सामाजिक संस्थाओं का पहला गुण है।” वरिष्ठ अधिकारी के निर्णय रॉल्स के सिद्धांत के अनुरूप होने चाहिये, यह सुनिश्चित करते हुए कि जलवायु संबंधी वार्ताओं के केंद्र में समानता हो तथा सभी के लाभ के लिये वैश्विक एवं राष्ट्रीय, दोनों ज़िम्मेदारियाँ संतुलित हों।