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भारतीय अर्थव्यवस्था

बुनियादी आवश्यकता सूचकांक

  • 26 Feb 2021
  • 12 min read

चर्चा में क्यों?

व्यापक प्रयासों एवं सुधारों के बावजूद शहरी व ग्रामीण भारत के मध्य पेय जल, स्वच्छता तथा आवास की स्थिति जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति में असमानताएँ बनी हुई हैं।

उपरोक्त निष्कर्ष वर्ष 2020-21 के आर्थिक सर्वेक्षण में शामिल नवनिर्मित "बुनियादी आवश्यकता सूचकांक" (BNI) से लिया गया है।

प्रमुख बिंदु

  • आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में BNI, थालीनॉमिक्स के विचार पर आधारित है, जिसके माध्यम से देश के अलग अलग क्षेत्रों में भोजन की पहुँच की जाँच की गई है।
  • आर्थिक सर्वेक्षण (2020-21) ने राज्यों में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के मध्य और विभिन्न आय-वर्गों के मध्य बुनियादी आवश्यकताओं की पहुँच में अंतर को कम करने पर ध्यान केंद्रित किये जाने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
  • डिजिटल युग में आगे बढ़ने के साथ ही हमारी बुनियादी आवश्यकताएँ केवल 'रोटी, कपड़ा और मकान' तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि इनसे अधिक हो गई हैं।
  • प्रौद्योगिकी तक पहुँच, स्मार्टफोन, इंटरनेट एवं पूरे देश के साथ कनेक्टिविटी इत्यादि विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिये नई अतिरिक्त बुनियादी आवश्यकताएँ हैं।

थालीनॉमिक्स

  • वर्ष 2019-20 के आर्थिक सर्वेक्षण में अर्थशास्त्र को आम आदमी से जोड़ने के लिये एक ऐसी चीज जो हर व्यक्ति के दिन-प्रतिदिन के जीवन का हिस्सा है- 'भोजन की थाली' को आधार बनाकर थालीनॉमिक्स की शुरुआत की गई थी।
  • एक व्यक्ति के दैनिक वेतन के साथ-साथ भोजन के लिये खर्च वहन करने की क्षमता में समय के साथ सुधार हुआ है, जो सामान्य व्यक्तियों के कल्याण को दर्शाता है।

बुनियादी आवश्यकता सूचकांक

  • बुनियादी आवश्यकता सूचकांक (BNI) वृहद वार्षिक घरेलू सर्वेक्षण डेटा पर आधारित है।
  • यह सभी/लक्षित ज़िलों के लिये ज़िला स्तर पर उपयुक्त संकेतक अथवा कार्यप्रणाली का उपयोग करके बनाया गया है।
  • BNI पाँच आयामों के 26 संकेतकों- जल, स्वच्छता, आवास, आसपास का वातावरण तथा अन्य सुविधाओं तक पहुँच के बारे में जानकारी प्रदान करता है। NSO डेटा का उपयोग करके वर्ष 2012 एवं वर्ष 2018 के लिये सभी राज्यों हेतु BNI सूचकांक तैयार किया गया है।
  • यह सूचकांक बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुँच के तीन स्तरों- उच्च, मध्यम, निम्न के आधार पर क्षेत्रों को वर्गीकृत करता है।

डेटा की उपयोगिता:

  • समय-समय पर अंतर-राज्य असमानताओं अथवा किसी विशेष राज्य की प्रगति की जाँच करना।
  • इन बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये कार्यान्वित नीतियों/ योजनाओं की प्रभावकारिता की जाँच करना।

बुनियादी आवश्यकताओं में सुधार:

  • वर्ष 2012 की तुलना में वर्ष 2018 में देश के सभी राज्यों में बुनियादी आवश्यकताओं की पहुँच में सुधार हुआ है।
  • समानता में वृद्धि उल्लेखनीय है क्योंकि समृद्ध व्यक्ति सार्वजनिक वस्तुओं के स्थान पर निजी संसाधनों को विकल्पों के रूप में उपयोग कर सकते हैं।

बुनियादी आवश्यकताएँ प्रदान करने के लिये उठाए गए कदम:

  • आवास योजना एवं सौभाग्‍य योजना।
  • स्वास्थ्य क्षेत्र के लिये PM-JAY एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन।
  • बजट 2020-21 में कुछ बुनियादी आवश्यकताओं जैसे-स्वास्थ्य के लिये बजट आवंटन में वृद्धि,
  • शैक्षिक क्षेत्र में पीएम ई विद्या, स्वयं मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स (MOOCs) एवं प्रज्ञाता।
  • आत्मनिर्भर भारत रोज़गार योजना: इसका उद्देश्य कोविड -19 आर्थिक सुधार चरण के दौरान रोज़गार के नए अवसरों के सृजन को बढ़ावा देना है।
  • नीति आयोग का सतत विकास लक्ष्य सूचकांक: यह सूचकांक भारत के राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा 2030 तक एसडीजी लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा हुई में प्रगति को मापता है।

संबंधित मुद्दे

  • एक बुनियादी आवश्यकता के रूप में इंटरनेट की सुविधा:
    • महामारी के दौरान बुनियादी आवश्यकताओं के अतिरिक्त इंटरनेट एवं स्मार्टफोन को सबसे बड़ी आवश्यकता के रूप में देखा गया। चाहे घर से काम करना हो अथवा ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेना हो, इंटरनेट एवं स्मार्टफोन बुनियादी आवश्यकताएँ हैं।
    • अधिकांश लोग स्मार्टफोन एवं इंटरनेट का खर्च उठाने में सक्षम थे, लेकिन जो लोग उन्हें वहन नहीं कर सकते थे, वे इनसे वंचित रह गए।
    • इंटरनेट सुविधाओं एवं स्मार्टफोन तक पहुँच वर्तमान में कुछ ऐसी आवश्यकताएँ हैं जिन्हें बुनियादी आवश्यकताओं की सूची तैयार करते समय ध्यान में नहीं रखा गया है।
    • इस इलेक्ट्रॉनिक विश्व में सुविधाओं को प्राप्त करने के लिये हर किसी को कदम-से-कदम मिलाकर चलने की आवश्यकता है, जो लोग इन सुविधाओं से वंचित हैं, उन्हें केवल भोजन एवं आवास की बजाय अधिक उत्थान की आवश्यकता है।
    • समान इंटरनेट पहुँच का अभाव न केवल शिक्षा क्षेत्र में बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में भी कई असमानताएँ उत्पन्न करता है।
    • टेलीमेडिसिन, ई-स्किलिंग, ई-गवर्नेंस एवं ई-शिक्षा के बढ़ते उपयोग के साथ इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण, भारत का एक बड़ा वर्ग इस इलेक्ट्रॉनिक विश्व में पिछड़ा बना रहेगा।
    • केरल में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बहुत बड़ी व्यवस्था है, फिर भी वहाँ बच्चों को इंटरनेट की कमी के कारण कई कठिनाइयों का सामना करते देखा जा सकता है।
    • सरकार द्वारा उन्हें भोजन, तेल एवं बेरोज़गारी भत्ता प्रदान किया जाता है, लेकिन इंटरनेट इस वितरण सूची में शामिल नहीं है।
  • योजनाओं की बहुलता:
    • ज़िला स्तर पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा शुरू की गई लगभग 250-300 गरीबी उन्मूलन योजना की प्रकृति लगभग समान है।
    • योजनाओं की यह बहुलता प्रायः निष्फल होती है।
    • यह योजनाओं के प्रभावी कामकाज में अक्षमता लाती है एवं भ्रष्टाचार का मार्ग खोलती है।

आगे की राह

  • भविष्य की आवश्यकताओं एवं संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए नीतियों को तैयार करना: योजनाएँ भविष्य को ध्यान में रखते हुए होंगी, इस विचार के साथ कि बुनियादी आवश्यकताएँ वर्षों में बदल गईं हैं एवं निश्चित रूप से आगामी पीढ़ी के लिये और भी अधिक परिवर्तित हो जाएंगी।
  • डिजिटल शिक्षा पहलू:
    • सबसे आसान तरीकों में से एक स्कूल जाने वाली युवा,पीढ़ी को लक्षित करना है और इस बात पर ध्यान देना है कि उनकी क्या आवश्यकताएँ हैं ताकि उन्हें शिक्षा तक समान पहुँच प्राप्त हो सके।
    • डिजिटल इंडिया एवं भारत नेट तेज़ी लाई जानी चाहिये।
  • योजनाओं की बहुलता को हतोत्साहित करना:
    • कई निष्फल योजनाओं को एकीकृत किया जाना।
    • मात्रा के बजाय गुणवत्ता बढ़ाई जानी चाहिये, अव्यवस्था एवं भ्रम उत्पन्न करने वाली कई योजनाओं की बजाय कुछ अच्छी व सुव्यवस्थित योजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
    • इन योजनाओं के एकीकरण की आवश्यकता है, ताकि जो योजनाएँ आवश्यक नहीं हैं, उन्हें समाप्त किया जाए।
  • परंपरागत के साथ-साथ नई आवश्यकताओं को ध्यान में रखना:
    • भारत को पारंपरिक बुनियादी आवश्यकताओं के साथ-साथ स्मार्टफोन एवं इंटरनेट सुविधाओं को शामिल करना ही होगा, इस तकनीकी युग में डिजिटल अंतर को खत्म करने की बुनियादी आवश्यकता है ।
    • बुनियादी आवश्यकताओं में नए "डिजिटल पहलू" को संबोधित किया जाना चाहिये, लेकिन पारंपरिक आवश्यकताओं से समझौता नहीं किया जाना चाहिये, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर ध्यान में रखा जाना चाहिये।
  • उचित स्वास्थ्य सुविधाओं की आवश्यकता:
    • सबसे महत्त्वपूर्ण पारंपरिक बुनियादी आवश्यकता सार्वजनिक स्वास्थ्य है जो सीवेज एवं स्वच्छता से संबंधित है।
    • पर्यावरणीय एन्टेरोपैथी नामक एक चिकित्सा स्थिति खराब स्वास्थ्य एवं स्वच्छता स्थितियों के कारण उत्पन्न होती है जो पोषक पदार्थों को अवशोषित करने की लोगों की क्षमता को प्रभावित करती है।
    • पर्यावरणीय एन्टेरोपैथी (जिसे उष्णकटिबंधीय एन्टेरोपैथी भी कहा जाता है) एक ऐसी उपनैदानिक स्थिति है, जो लगातार फीकल-ओरल संदूषण के कारण होती है और जिसके परिणामस्वरूप आँतों एवं आँतों की विली में सूजन आ जाती है।
    • इसके अतिरिक्त प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर अस्पताल को अपग्रेड किया जाना चाहिये, अस्पतालों को अपग्रेड किये जाने से यह ब्लॉक स्तर पर उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि करेगा।

निष्कर्ष

  • बुनियादी आवश्यकता सूचकांक क्षेत्रों, राज्यों एवं संपूर्ण देश में बुनियादी आवश्यकताओं की समान पहुँच सुनिश्चित करने का एक अच्छा तरीका है।
  • यह दर्शाता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • योजनाओं की बहुलता को संबोधित एवं एकीकृत करना होगा; इससे केंद्र व राज्यों के मध्य बेहतर तालमेल स्थापित होगा।
  • देश में बुनियादी आवश्यकताओं की स्थिति में सुधार किया जाना चाहिये क्योंकि यह देश के विकास को बढ़ावा देगा तथा इससे मानव विकास सूचकांक (HDI) रैंक में सुधार होगा।
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