प्रारंभिक परीक्षा
भारत में विशेषाधिकार नोटिस और संसदीय विशेषाधिकार
- 22 Apr 2026
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चर्चा में क्यों?
संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के असफल होने के बाद प्रधानमंत्री के बयानों के चलते संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए भारत के प्रधानमंत्री के विरुद्ध विशेषाधिकार नोटिस दायर किया गया है।
विशेषाधिकार नोटिस क्या है?
- परिचय: एक विशेषाधिकार नोटिस (या प्रस्ताव) संसद के किसी सदस्य (सांसद) द्वारा प्रस्तुत एक औपचारिक नोटिस है जिसमें उनके संसदीय अधिकारों, उन्मुक्तियों या सदन की गरिमा के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है।
- इसका उपयोग उन सदस्यों या बाहरी लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिये किया जाता है जिन्होंने विशेषाधिकार का हनन किया है या सदन की अवमानना की है (जैसे– सदन को गुमराह करना, तथ्यों को छिपाना या सदस्यों पर अपमानजनक टिप्पणी करना)।
- नियम: इसे लोकसभा में नियम 222 और राज्यसभा में नियम 187 के तहत पेश किया जाता है।
- पीठासीन अधिकारी की भूमिका: अध्यक्ष (लोकसभा) या सभापति (राज्यसभा) पर्यवेक्षण का पहला स्तर होता है।
- पीठासीन अधिकारी इसकी जाँच करता है और सदन में इसे उठाने की सहमति देने या रोकने का निर्णय ले सकता है।
- अध्यक्ष/सभापति द्वारा नोटिस स्वीकार किये जाने के बाद, सदस्य सदन से अनुमति [सदन की औपचारिक अनुमति जो किसी सदस्य को किसी विशेष मामले (जैसे– विशेषाधिकार मुद्दा) को चर्चा के लिये उठाने की अनुमति देती है] मांगता है और यदि कोई आपत्ति नहीं होती है या कम-से-कम 25 सदस्य समर्थन करते हैं, तो अनुमति प्रदान कर दी जाती है।
- विशेषाधिकार नोटिस आमतौर पर प्रश्नकाल के बाद चर्चा की जाती है, लेकिन अत्यावश्यक मामलों में कभी भी अनुमति दी जा सकती है।
- विचार: एक बार स्वीकार होने के बाद सदन सीधे बहस कर सकता है या जाँच, अन्वेषण और रिपोर्ट के लिये सदन की विशेषाधिकार समिति को भेज सकता है। हालाँकि अंतिम निर्णय सदन पर ही निर्भर करता है।
- विशेषाधिकार समिति:
- प्रकृति: यह एक स्थायी संसदीय समिति है। इसका कार्य अर्द्ध-न्यायिक है।
- लोकसभा: इसमें अध्यक्ष द्वारा मनोनीत 15 सदस्य होते हैं।
- राज्यसभा: इसमें सभापति द्वारा मनोनीत 10 सदस्य होते हैं।
- कार्य: यह विशेषाधिकार के उल्लंघन से जुड़े प्रत्येक प्रश्न की जाँच करती है, तथ्यों का निर्धारण करती है और की जाने वाली कार्रवाई के बारे में सदन को सिफारिशें करती है।
- निष्पक्ष सुनवाई: आरोपी सदस्य को अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।
संसदीय विशेषाधिकार क्या हैं?
- परिचय: संसदीय विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार, उन्मुक्तियाँ और छूट हैं, जिनका लाभ संसद का प्रत्येक सदन, उसकी समितियों तथा उसके सदस्यों को प्राप्त होता है।
- ये विशेषाधिकार भारत के महान्यायवादी को भी प्राप्त होते हैं, लेकिन राष्ट्रपति को नहीं, यद्यपि राष्ट्रपति संसद का एक अभिन्न अंग है (राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत पृथक् संवैधानिक उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं)।
- उद्देश्य: ये संसदीय कार्यों के प्रभावी निष्पादन के लिये आवश्यक होते हैं और अन्य निकायों या व्यक्तियों को प्राप्त अधिकारों से अधिक होते हैं।
- विशेषाधिकारों के प्रकार:
- सामूहिक विशेषाधिकार: ये सदन के समग्र अधिकार होते हैं, जैसे– कार्यवाही को विनियमित करने का अधिकार, अवमानना के लिये दंड देने का अधिकार तथा बाहरी व्यक्तियों को सदन से बाहर रखने का अधिकार।
- व्यक्तिगत विशेषाधिकार: ये सदस्यों को प्राप्त अधिकार होते हैं, जैसे– संसद में वाक् स्वतंत्रता तथा सिविल मामलों में गिरफ्तारी से छूट।
- संसदीय विशेषाधिकारों के स्रोत:
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 105, अनुच्छेद 122, अनुच्छेद 194 और अनुच्छेद 212 संसद के सदस्यों (MP) तथा राज्य विधानसभाओं के सदस्यों (MLA) को विभिन्न प्रकार के विशेषाधिकार प्रदान करते हैं।
- विधिक आधार: अनुच्छेद 105(3) संसद को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह कानून द्वारा संसद और उसके सदस्यों के अधिकारों, विशेषाधिकारों एवं उन्मुक्तियों को परिभाषित करे।
- अब तक संसद द्वारा इन विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध करने हेतु कोई व्यापक कानून पारित नहीं किया गया है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत संसदीय सत्रों के दौरान तथा उनके आसपास की अवधि में दीवानी मामलों में गिरफ्तारी से छूट प्रदान की जाती है।
- लोकसभा की विशेषाधिकार समिति की अनुशंसाएँ (1994 एवं 2008): समिति ने इस विषय का विस्तृत अध्ययन किया और लगातार संसदीय विशेषाधिकारों के संहिताकरण के विरुद्ध अनुशंसा की।
- सर्वसम्मति यह है कि संहिताकरण से प्रत्येक विशेषाधिकार संबंधी मामले को विधिक समीक्षा के अधीन लाया जा सकता है, जिससे सदन की अपने आंतरिक मामलों पर विशिष्ट अधिकारिता और संप्रभुता प्रभावित होगी।
- विशेषाधिकार का हनन: विशेषाधिकार का हनन (BoP) तब होता है जब किसी व्यक्ति या समूह द्वारा संसदीय विशेषाधिकारों का उल्लंघन या अनदेखी की जाती है।
संसदीय विशेषाधिकारों पर विधिक दृष्टिकोण
विशेषाधिकार बनाम मूल अधिकार
- केशव सिंह मामला (1964): अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थापित किया कि अनुच्छेद 194(3) के अंतर्गत राज्य विधानसभाओं तथा विस्तार से अनुच्छेद 105(3) के अंतर्गत संसद की शक्तियाँ और विशेषाधिकार मूल अधिकारों के अधीन हैं।
- केशव सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह स्थापित किया गया कि विशेषाधिकारों और मूल अधिकारों के बीच उत्पन्न होने वाले संघर्षों का समाधान सामंजस्यपूर्ण व्याख्या के माध्यम से किया जाना चाहिये।
- शर्मा मामला (1959): इसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने किसी संघर्ष की स्थिति में अधिकारों के अनुक्रम को स्पष्ट किया:
- अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) स्वतः ही संसदीय विशेषाधिकारों पर अधिरोहण नहीं करता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता) फिर भी लागू होता है।
विधिक प्रक्रिया पर अभिसमय (न्यायालयों से प्राप्त नोटिस):
- पीठासीन अधिकारियों द्वारा उपस्थित न होना: एक स्थापित संसदीय परंपरा के अनुसार, राज्यसभा के सभापति (या लोकसभा के अध्यक्ष) सर्वोच्च न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय से नोटिस प्राप्त होने पर न तो उसका उत्तर देते हैं और न ही व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होते हैं।
- यह प्रक्रिया विशेष रूप से तब प्रदर्शित हुई जब 1964 के केशव सिंह मामले के दौरान सभापति ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने से मना किया तथा पुनः 1974 के राष्ट्रपति चुनाव संदर्भ के दौरान भी यही स्थिति रही।
- प्रक्रिया: उपस्थित होने के बजाय इस विषय पर सामान्यतः सदन में चर्चा की जाती है और संबंधित दस्तावेज़ों को विधि एवं न्याय मंत्री को उचित कार्रवाई के लिये भेजा जाता है, जिससे शक्तियों के पृथक्करण और सदन की गरिमा बनाए रखी जाती है।
विदेशी नागरिकों पर विशेषाधिकार संबंधी न्यायिक अधिकारिता
- स्वराज पॉल मामला (1984): संसद किसी विदेशी नागरिक पर भी विशेषाधिकार संबंधी न्यायाधिकार का प्रयोग कर सकती है।
- महान्यायवादी की राय के अनुसार, संसद किसी विदेशी नागरिक के विरुद्ध व्यक्तिनिष्ठ अधिकारिता का प्रयोग तभी कर सकती है, जब उसके द्वारा अवमानना या विशेषाधिकार का हनन भारत के भीतर किया गया हो।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. विशेषाधिकार नोटिस क्या है?
किसी सांसद द्वारा विशेषाधिकार के उल्लंघन या सदन की अवमानना का आरोप लगाते हुए, नियम 222 (लोकसभा) के अंतर्गत प्रस्तुत एक औपचारिक प्रस्ताव।
2. संसदीय विशेषाधिकार क्या हैं?
अनुच्छेद 105 और 194 के तहत विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ, जो संसद और उसके सदस्यों के स्वतंत्र रूप से कार्य करने को सुनिश्चित करती हैं।
3. विशेषाधिकार समिति की क्या भूमिका है?
यह उल्लंघनों की जाँच करती है, साक्ष्यों की पड़ताल करती है, और सदन को कार्रवाई की अनुशंसा करती है।
4. क्या संसदीय विशेषाधिकार निरपेक्ष हैं?
नहीं, वे मौलिक अधिकारों के अधीन हैं, जैसा कि केशव सिंह मामले में 'सामंजस्यपूर्ण निर्वचन' का उपयोग करते हुए स्पष्ट किया गया था।
5. शर्मा केस (1959) ने क्या स्थापित किया?
यह निर्णय देता है कि संसदीय विशेषाधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) पर प्रधानता रखते हैं, लेकिन वे अनुच्छेद 21 के अधीन रहते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत की संसद किसके/किनके द्वारा मंत्रिपरिषद के कृत्यों के ऊपर नियंत्रण रखती है? (2017)
- स्थगन प्रस्ताव
- प्रश्नकाल
- अनुपूरक प्रश्न
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न. भारत के संदर्भ में, संसदीय शासन-प्रणाली में निम्नलिखित में से कौन-सा/से सिद्धांत संस्थागत रूप से निहित है/हैं? (2013)
1. मंत्रिमंडल के सदस्य संसद के सदस्य होते हैं।
2. जब तक मंत्रियों को संसद का विश्वास प्राप्त रहता है तब तक ही वे अपने पद पर बने रहते हैं।
3. राज्य का अध्यक्ष ही मंत्रिमंडल का अध्यक्ष होता है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
मेन्स:
प्रश्न. संसद और उसके सदस्यों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ (इम्यूनिटीज़), जैसे कि वे संविधान की धारा 105 में परिकल्पित हैं, अनेकों असंहिताबद्ध (अन-कोडिफाइड) और अ-परिगणित विशेषाधिकारों के जारी रहने का स्थान खाली छोड़ देती हैं। संसदीय विशेषाधिकारों के विधिक संहिताकरण की अनुपस्थिति के कारणों का आकलन कीजिये। इस समस्या का क्या समाधान निकाला जा सकता है? (2014)