प्रारंभिक परीक्षा
भारतीय लघुचित्र कला
- 14 Jan 2026
- 50 min read
चर्चा में क्यों?
स्वर्ण मंदिर ने पहाड़ी लघुचित्र कला की जन्मस्थली माने जाने वाले काँगड़ा क्षेत्र के कलाकारों को पारंपरिक तकनीकों और प्राकृतिक रंगद्रव्यों का उपयोग करते हुए गुरु गोबिंद सिंह की लगभग 200 वर्ष पुरानी एक पेंटिंग के संरक्षण/पुनर्स्थापन हेतु नियुक्त किया है।
- गुरु गोबिंद सिंह (1666-1708) का जन्म पटना साहिब (बिहार) में गोबिंद राय के रूप में हुआ था। वे सिख धर्म के दसवें गुरु थे और नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर के एकमात्र पुत्र थे।
लघुचित्र कला (Miniature Painting) क्या है?
- परिचय: लघुचित्र कला छोटी और अत्यंत सूक्ष्म विवरण वाली चित्रकला होती है, जिसका आकार सामान्यतः 25 वर्ग इंच से अधिक नहीं होता। इसमें विषय-वस्तु को प्रायः वास्तविक आकार के 1/6 भाग में दर्शाया जाता है। इसमें पारंपरिक टेंपरा तकनीक का प्रयोग होता है, जिसमें रंगद्रव्यों को पानी और एक पायसन/इमल्शन (आमतौर पर अंडे की जर्दी) के साथ मिलाया जाता है।
- सामान्य विशेषताओं में उभरी हुई आँखें, नुकीली नाक और पतली कमर शामिल हैं। कलाकारों ने सूक्ष्म अंकन के लिये सिंगल ब्रिसल वाले ब्रश का उपयोग किया।
- लघुचित्र कला की शैलियाँ/प्रकार
- पाला कला शैली (750-1150 ई.): पूर्वी भारत के प्रारंभिक उदाहरणों में से एक, जिसे बौद्ध और वज्रायण शैली के शासकों ने संरक्षण दिया। इसकी विशेषताएँ हैं मुलायम रेखाएँ और संयमित रंग, जो ताड़ के पत्ते या वेलम/चर्मपत्र पर चित्रित किये जाते थे।
- अपभ्रंश कला शैली: पश्चिमी भारतीय शैली के समकक्ष, जो गुजरात और मेवाड़ (राजस्थान) से संबद्ध है। प्रारंभ में जैन विषयों पर केंद्रित, बाद में वैष्णव विषयों और गीत गोविंद को शामिल किया गया।
- मछली के आकार की उभरी आँखें, नुकीली नाक और दोहरी ठोड़ी के लिये प्रसिद्ध।
- दिल्ली सल्तनत काल: इस दौरान ईरानी और जैन परंपराओं से प्रेरणा लेते हुए एक 'इंडो-पर्शियन' (भारत-फारसी) शैली विकसित हुई। इसके प्रमुख केंद्रों में मांडू और जौनपुर शामिल थे। यह शैली मुगल, राजपूत और दक्कन शैलियों से पहले की शैली थी।
- मुगलकालीन लघु चित्रकला: इसमें पर्शियन/फारसी-प्रेरित शैली का प्रवेश हुआ, जिसमें दरबारी दृश्य और शिकार जैसे धर्मनिरपेक्ष विषयों पर अधिक ध्यान दिया गया। इसकी एक प्रमुख विशेषता ‘फोरशॉर्टनिंग’ तकनीक थी, जिसमें वस्तुएँ वास्तविक आकार की तुलना में अधिक निकट तथा छोटी दिखाई जाती हैं।
- अकबर: तस्वीरखाना की स्थापना की। फारसी और भारतीय शैलियों का समन्वय किया। तूतीनामा और हमज़ानामा जैसी पांडुलिपियों का चित्रांकन कराया।
- जहाँगीर: यहाँ प्राकृतिक यथार्थवाद का चरम उत्कर्ष देखने को मिलता है, जिसमें वनस्पति और जीव-जंतुओं के चित्रण पर विशेष बल दिया गया। उस्ताद मंसूर इस काल के प्रसिद्ध चित्रकार थे।
- शाहजहाँ: यूरोपीय प्रभाव का समावेश किया, पेंसिल स्केचिंग की शुरुआत की तथा स्वर्ण और रजत रंगों का व्यापक प्रयोग किया।
- राजपूत चित्रकला शैलियाँ: इनमें मेवाड़, किशनगढ़, बूँदी, आमेर-जयपुर और मारवाड़ शामिल हैं। इनके प्रमुख विषय रामायण, महाभारत, भागवत पुराण तथा रागमाला (रागों की माला) से लिये गए हैं।
- मेवाड़: चित्रकार साहिबदीन का प्रभुत्व रहा। रागमाला चित्रों के लिये प्रसिद्ध।
- किशनगढ़: राजा सावंत सिंह और बणी-ठणी से जुड़ा, चित्रकार निहाल चंद द्वारा चित्रित।
- पहाड़ी शैली: हिमालयी राज्यों (जम्मू, बासोली, काँगड़ा) से उत्पन्न।
- बासोली शैली: इसमें बोल्ड रेखाएँ और लाल एवं पीले जैसे चमकदार प्राथमिक रंगों की विशेषता है और यह रसमंजरी और रामायण जैसे विषयों को चित्रित करती है।
- गुलेर–काँगड़ा शैली: यह अपनी सूक्ष्म प्रकृतिवादी अभिव्यक्ति और प्रेमप्रधान कृष्ण-लीलाओं के लिये प्रसिद्ध है।
- इसमें गीत गोविंद, भागवत पुराण, नल–दमयंती तथा बारहमासा जैसे काव्यात्मक एवं धार्मिक विषयों का चित्रण किया गया है।
- कुल्लू-मंडी शैली: एक लोक शैली, जिसमें बोल्ड चित्रांकन और गहरे रंगों का प्रयोग होता है।
- औपनिवेशिक और आधुनिक विकास:
- कंपनी चित्रकला: राजपूत, मुगल और भारतीय शैलियों का मिश्रण, जिसमें यूरोपीय यथार्थवाद की झलक थी; ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कमीशन कराया गया।
- बंगाल शैली (20वीं सदी में शुरुआत): एक उपनिवेशवाद विरोधी शैली; इसमें सरल रंगों का उपयोग किया गया और भारतीय सौंदर्यशास्त्र के पुनरुद्धार को बढ़ावा दिया गया।
- सामग्री और विषय: शुरुआती कलाकृतियाँ ताड़ के पत्तों पर, बाद में कागज़ पर चित्रित की गईं, इनमें प्राकृतिक रंगद्रव्यों (जैसे- लाजवर्द) का उपयोग किया गया। विषयवस्तुओं में - महाकाव्य, दंतकथाएँ, धार्मिक ग्रंथ, दरबारी जीवन, व्यक्ति-चित्रण और प्रेमप्रधान किंवदंतियाँ शामिल हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारतीय कला शैली में लघु चित्रकला क्या है?
लघु चित्रकला छोटे आकार की, अत्यधिक विस्तृत कलाकृतियाँ होती हैं जिनमें टेंपेरा तकनीक का उपयोग किया जाता है, इसमें प्रायः धार्मिक ग्रंथों, दरबारी जीवन और कलात्मक विषयों को दर्शाया जाता है।
2. काँगड़ा शैली का महत्त्व क्यों है?
गुलेर-काँगड़ा शैली परिष्कृत प्रकृतिवाद और कलात्मक कृष्ण-लीलाओं का प्रतिनिधित्व करती है, जो पहाड़ी चित्रकला के शिखर को चिह्नित करती है।
3. राजपूत चित्रकला की कौन-सी शैली 'बणी-ठणी' के लिये प्रसिद्ध है?
किशनगढ़ शैली ‘बणी-ठणी’ के लिये प्रसिद्ध है, जिसकी पहचान आदर्श आकृतियों से होती है जिसमें लंबी, कमल जैसी आँखें, नुकीली ठुड्डी और विशिष्ट पार्श्व प्रोफाइल को दर्शाया जाता है, जो प्रायः राधा‑कृष्ण संबंधी विषयों को चित्रित करती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. सुप्रसिद्ध चित्र "बणी-ठणी" किस शैली का है? (2018)
(a) बूँदी शैली
(b) जयपुर शैली
(c) काँगड़ा शैली
(d) किशनगढ़ शैली
उत्तर: (d)
प्रश्न. बोधिसत्त्व पद्मपाणि का चित्र सबसे प्रसिद्ध और प्रायः चित्रित चित्रकारी है, जो: (2017)
(a) अजंता में है
(b) बदामी में है
(c) बाघ में है
(d) एलोरा में है
उत्तर: (a)
प्रश्न. कलमकारी चित्रकला निर्दिष्ट (रेफर) करती है: (2015)
(a) दक्षिण भारत में सूती वस्त्र पर हाथ से की गई चित्रकारी
(b) पूर्वोत्तर भारत में बाँस के हस्तशिल्प पर हाथ से किया गया चित्रांकन
(c) भारत के पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में ऊनी वस्त्र पर ठप्पे (ब्लॉक) से की गई चित्रकारी
(d) उत्तर-पश्चिमी भारत में सजावटी रेशमी वस्त्र पर हाथ से की गई चित्रकारी
उत्तर: (a)
प्रश्न. निम्नलिखित ऐतिहासिक स्थलों पर विचार कीजिये: (2013)
- अजंता की गुफाएँ
- लेपाक्षी मंदिर
- साँची स्तूप
उपर्युक्त स्थलों में से कौन-सा/से भित्ति चित्रकला के लिये भी जाना जाता है/जाने जाते हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) 1, 2 और 3
(d) कोई नहीं
उत्तर: (b)
प्रश्न. प्राचीन भारत में गुप्त काल के भित्तिचित्रों के केवल दो ही ज्ञात उदाहरण हैं। इनमें से एक अजंता गुफाओं के चित्र हैं। गुप्त कालीन चित्रों का दूसरा जीवित उदाहरण कहाँ है? (2010)
(a) बाघ की गुफाएँ
(b) एलोरा की गुफाएँ
(c) लोमश ऋषि की गुफा
(d) नासिक की गुफाएँ
उत्तर: (b)
