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भारत-ब्रिटेन अपतटीय पवन ऊर्जा कार्यबल

  • 19 Feb 2026
  • 19 min read

स्रोत:पीआईबी

भारत और ब्रिटेन ने अपतटीय पवन ऊर्जा के विकास में सहयोग को तीव्र करने के उद्देश्य से भारत–ब्रिटेन विज़न 2035 और चौथे ऊर्जा संवाद के तहत भारत–ब्रिटेन अपतटीय पवन कार्यबल की स्थापना की है। 

  • सहयोग के स्तंभ: सहयोग के तीन मुख्य स्तंभों को रेखांकित किया गया है: 
    • पारिस्थितिक तंत्र नियोजन और बाज़ार डिज़ाइन (जिसमें समुद्र तल की लीज़ और राजस्व सुनिश्चितता शामिल है), 
    • अवसंरचना और आपूर्ति शृंखलाएँ (पोत आधुनिकीकरण, स्थानीय विनिर्माण), 
    • वित्तपोषण और जोखिम न्यूनीकरण (मिश्रित वित्त, संस्थागत पूंजी)। 
  • हरित हाइड्रोजन मिशन के साथ समन्वय: अपतटीय पवन ऊर्जा तटीय औद्योगिक एवं हरित हाइड्रोजन क्लस्टरों को ऊर्जा प्रदान कर सकती है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से प्रतिस्पर्द्धात्मक मूल्य प्राप्त किये हैं। 
  • रणनीतिक महत्त्व: अपतटीय पवन ऊर्जा को भारत के ऊर्जा संक्रमण के लिये रणनीतिक रूप से विशेषकर ग्रिड स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक क्षमता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण माना जाता है। 

अपतटीय पवन ऊर्जा 

  • परिचय: यह समुद्री वातावरण जैसे समुद्र या महासागर में स्थापित पवन टरबाइन से विद्युत उत्पादन को दर्शाता है, जिसमें अधिक मज़बूत और लगातार बहने वाली पवन ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। 
  • भारत में संभावनाएँ: चेन्नई स्थित राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (NIWE) के अनुसार, भारत में अनुमानित अपतटीय पवन क्षमता लगभग 70 GW है, जो मुख्यतः गुजरात और तमिलनाडु की तटीय रेखाओं के पास केंद्रित है। 
    • भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता 272 GW से अधिक हो चुकी है, जिसमें सौर ऊर्जा से 141 GW और पवन ऊर्जा से 55 GW प्राप्त होती है। 
  • नीतिगत एवं संस्थागत ढाँचा: राष्ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति (2015) समग्र ढाँचा प्रदान करती है, जिसमें नई और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) नोडल मंत्रालय के रूप में कार्य करता है और राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (NIWE) आकलन व सुविधा प्रदान करने वाली नोडल एजेंसी है। 
और पढ़ें: भारत की अपतटीय पवन ऊर्जा के लिये रोडमैप 
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