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सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि

  • 11 Mar 2026
  • 18 min read

स्रोत: पीआईबी 

केंद्रीय गृहमंत्री ने 10 मार्च को सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, सामाजिक कुप्रथाओं से युक्त उस दौर में महिलाओं को शिक्षा के दायरे में लाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।

सावित्रीबाई फुले

  • परिचय: सावित्रीबाई फुले 19वीं सदी के महाराष्ट्र की वह समाज सुधारक थीं, जिन्होंने पितृसत्तात्मक और जातिगत पदानुक्रमों को चुनौती देकर भारतीय समाज को मौलिक रूप दिया। 
    • उनका जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के सतारा में माली समुदाय में हुआ था, 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह ज्योतिबा फुले से हुआ था।
  • प्रमुख योगदान:
    • महिला शिक्षा: वर्ष 1848 में, उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर पुणे में लड़कियों के लिये भारत का पहला औपचारिक विद्यालय खोलकर इतिहास रचा। इस दंपति ने मिलकर कुल 18 विद्यालय स्थापित किये और उनका संचालन किया।
      • उन्होंने 'नेटिव फीमेल स्कूल, पुणे' और 'सोसाइटी फॉर प्रमोटिंग द एजुकेशन ऑफ महार्स' जैसे ट्रस्ट स्थापित करने में सहायता की, जिससे जाति-आधारित भेदभाव को सीधी चुनौती मिली।
    • लैंगिक न्याय: वर्ष 1852 में, उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिये महिला सेवा मंडल की स्थापना की, बाल विवाह के खिलाफ अभियान चलाया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।
    • कन्या भ्रूण हत्या को रोकना: वर्ष 1863 में, इस दंपति ने बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की, जिसे कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और गर्भवती ब्राह्मण विधवाओं व बलात्कार पीड़ितों को आश्रय देने वाले भारत के पहले केंद्र के रूप में मान्यता प्राप्त है।
    • जातिगत समानता: उन्होंने जातिगत और पितृसत्तात्मक मानदंडों को समाप्त करने के लिये सत्यशोधक विवाह (दहेज़-मुक्त, पुजारी-रहित और गैर-ब्राह्मणवादी समारोह) की शुरुआत करके सामाजिक समानता को संस्थागत रूप दिया।
    • साहित्यिक योगदान: एक कवयित्री और लेखिका के रूप में, उनकी उल्लेखनीय कृतियों में काव्य फुले (1854) और बावन काशी सुबोध रत्नाकर (1892) शामिल हैं। उनकी प्रसिद्ध कविता, ‘जाओ, शिक्षा प्राप्त करो’, ने उत्पीड़ित जातियों को गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने के लिये प्रोत्साहित किया।
  • विरोध और मृत्यु: उन्होंने कट्टरपंथी विरोध का सामना किया, सामाजिक हमलों और पत्थरबाज़ी को सहन किया। वर्ष 1897 में एक प्लेग रोगी की निस्वार्थ सेवा करते समय वे स्वयं ब्यूबोनिक प्लेग संबंधी बीमारी की चपेट में आ गईं और उनकी मृत्यु हो गई।

Savitribai_Phule

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