रैपिड फायर
सावित्रीबाई फुले की जयंती
- 05 Jan 2026
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हाल ही में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने 3 जनवरी, 2026 को सावित्रीबाई फुले की 194वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
परिचय
- सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को सतारा (महाराष्ट्र) में हुआ था। वे निरक्षरता की स्थिति से उठकर भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं और माली समुदाय से आने वाली एक अग्रणी नारीवादी-सामाजिक सुधारक के रूप में उभरीं।
- 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह ज्योतिबा फुले से हुआ, जिन्होंने उनकी शिक्षा की ज़िम्मेदारी सॅंभाली।
- योगदान:
- महिलाओं के अधिकारों हेतु सामाजिक जागरण: वर्ष 1848 में उन्होंने पुणे के भिडे वाडा में भारत का पहला भारतीयों द्वारा संचालित बालिका विद्यालय स्थापित किया। इसके साथ ही 1850 के दशक में नेटिव फीमेल स्कूल, पुणे तथा सोसाइटी फॉर प्रमोटिंग द एजुकेशन ऑफ महार्स, मंग्स (Mangs) एंड एटसेटेराज़ जैसे सुधारवादी ट्रस्टों के माध्यम से समावेशी शिक्षा को संस्थागत रूप दिया।
- वर्ष 1852 में उन्होंने महिला सेवा मंडल की स्थापना की, जिसके माध्यम से महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाई। साथ ही उन्होंने बाल विवाह के विरुद्ध अभियान चलाया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।
- वर्ष 1863 में ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की, जो भारत का पहला ऐसा आश्रय था, जिसका उद्देश्य कन्या भ्रूण/शिशु हत्या को रोकना, गर्भवती और शोषित ब्राह्मण विधवाओं को संरक्षण देना तथा उनके बच्चों का पालन-पोषण करना था।
- जाति और लैंगिक समानता की अग्रदूत: उन्होंने वंचित और तथाकथित ‘अछूत’ समुदायों के लिये विद्यालय खोलकर सामाजिक समानता को संस्थागत रूप दिया। साथ ही उन्होंने पहला सत्यशोधक विवाह प्रारंभ किया, जो दहेज-मुक्त, पुरोहित-मुक्त और गैर-ब्राह्मणवादी था तथा इस प्रकार औपनिवेशिक भारत में जाति एवं पितृसत्तात्मक पदानुक्रमों को चुनौती दी।
- साहित्यिक योगदान: उन्होंने काव्य फुले (1854) और बावन काशी सुबोध रत्नाकर (1892) की रचना की, जिनमें कविता के माध्यम से शिक्षा तथा सामाजिक मुक्ति का संदेश देकर शोषित समुदायों को सशक्त किया।
- करुणा की शहीद: वर्ष 1897 में ब्यूबोनिक प्लेग से पीड़ित एक रोगी की सेवा करते हुए सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया, जो निस्वार्थ जनसेवा का प्रतीक है।
- महिलाओं के अधिकारों हेतु सामाजिक जागरण: वर्ष 1848 में उन्होंने पुणे के भिडे वाडा में भारत का पहला भारतीयों द्वारा संचालित बालिका विद्यालय स्थापित किया। इसके साथ ही 1850 के दशक में नेटिव फीमेल स्कूल, पुणे तथा सोसाइटी फॉर प्रमोटिंग द एजुकेशन ऑफ महार्स, मंग्स (Mangs) एंड एटसेटेराज़ जैसे सुधारवादी ट्रस्टों के माध्यम से समावेशी शिक्षा को संस्थागत रूप दिया।
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