जैव विविधता और पर्यावरण
भारत की प्लास्टिक अर्थव्यवस्था पर पुनर्विचार
- 07 Apr 2026
- 217 min read
यह एडिटोरियल 06/04/2026 को द हिंदू में प्रकाशित ‘Elastic rules: On the Plastic Waste Management (Amendment) Rules, 2026’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के अद्यतन प्लास्टिक प्रबंधन ढाँचे का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें वर्ष 2026 में बाज़ार-आधारित अनिवार्य पुनर्चक्रित सामग्री प्रावधानों की ओर हुए संक्रमण की विवेचना की गई है। साथ ही यह अधोसंरचनात्मक कमियों, सूक्ष्म प्लास्टिक की विषाक्तता तथा नियामकीय शिथिलता जैसी निरंतर चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में संस्थागत डिजिटलीकरण की प्रभावशीलता का आलोचनात्मक मूल्यांकन करता है।
प्रिलिम्स के लिये: विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), स्वच्छ भारत मिशन-U 2.0
मेन्स के लिये: भारत प्लास्टिक अपशिष्ट की समस्या का समाधान कैसे कर रहा है, प्रमुख चुनौतियाँ और आवश्यक उपाय क्या हैं?
भारत का प्लास्टिक प्रबंधन ढाँचा, जो प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 पर आधारित है, विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) को अनिवार्य बनाता है, जिसके लक्ष्य 2021-22 में 35% से बढ़कर 2024-25 तक 100% तक पहुँचने का है; फिर भी वास्तविक अनुपालन अभी भी लगभग 50–60% तक सीमित है, जो कार्यान्वयन की कमी को दर्शाता है। वर्ष 2026 के संशोधन न्यूनतम पुनर्चक्रित सामग्री (2028-29 तक 30% से 60%) पर बल देते हैं, जो संग्रहण-आधारित अनुपालन से बाज़ार-प्रेरित अनुपालन की ओर संक्रमण का संकेत देते हैं। हालाँकि, अधूरे लक्ष्यों को आगे ले जाने जैसे प्रावधान जवाबदेही को कमज़ोर करने तथा प्रवर्तन को अधिक ‘लचीला’ बनाने का जोखिम उत्पन्न करते हैं। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 9 मिलियन टन प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न होने की पृष्ठभूमि में, वास्तविक चुनौती नीति निर्माण नहीं, बल्कि विश्वसनीय निगरानी, सख्त प्रवर्तन एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था के प्रभावी एकीकरण को सुनिश्चित करना है।
भारत का प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन ढाँचा क्या है?
- परिचय: भारत का प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन ढाँचा मुख्य रूप से प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 पर आधारित है, जिसे वर्ष 2018, 2021, 2022, 2024 तथा हाल ही में वर्ष 2026 में किये गए प्रमुख संशोधनों के माध्यम से लगातार सख्त और विकसित किया गया है।
- मुख्य आधार: विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) भारत की प्लास्टिक अपशिष्ट रणनीति की रीढ़ है। यह अपशिष्ट प्रबंधन का भार स्थानीय नगरपालिकाओं से हटाकर अपशिष्ट उत्पन्न करने वाली कंपनियों पर डालता है और 'प्रदूषक भुगतान सिद्धांत' पर व्यापक रूप से कार्य करता है।
इसके लिये कौन ज़िम्मेदार है?
- ये नियम PIBO (उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक) और PWP (प्लास्टिक अपशिष्ट संसाधक, जैसे पुनर्चक्रणकर्ता और अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्र) पर लागू होते हैं।
प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
- अनिवार्य पुनर्चक्रित सामग्री:
- श्रेणी I (कठोर प्लास्टिक): 2025-26 के लिये 30% पुनर्चक्रित सामग्री अनिवार्य है, जो वर्ष 2028-29 तक बढ़कर 60% हो जाएगी।
- श्रेणी II (लचीला प्लास्टिक): 10% से शुरू होकर वर्ष 2028-29 तक 20% तक बढ़ जाएगा।
- श्रेणी III (बहुस्तरीय प्लास्टिक): लक्ष्य 5% निर्धारित किया गया है, जिसे बढ़ाकर 10% किया जाएगा।
- अनुपालन लक्ष्यों को आगे ले जाना: जो कंपनियाँ 2025-26 में लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रहती हैं, वे कमी को तीन वर्ष तक (2028-29 तक) आगे ले जा सकती हैं, बशर्ते कि घाटे का कम से कम एक तिहाई हिस्सा सालाना पूरा किया जाए।
- व्यापार योग्य प्रमाणपत्र प्रणाली: ये नियम एक ऐसी प्रणाली को संस्थागत रूप देते हैं जहाँ कंपनियाँ अपने लक्ष्यों से अधिक उत्पादन करने वाली फर्मों से व्यापार योग्य क्रेडिट खरीदकर पुनर्चक्रण संबंधी दायित्वों को पूरा कर सकती हैं।
- इससे लचीलापन तो मिलता है और लागत कम होती है, लेकिन साथ ही कंपनियों को अपने प्लास्टिक का पुनर्चक्रण करने से बचने का मौका भी मिलता है। गौरतलब है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वर्ष 2023 में 6 लाख से अधिक फर्ज़ी प्रमाणपत्रों की रिपोर्ट दी थी।
- छूट: नियमों में उन मामलों में भी छूट दी गई है जहाँ अन्य नियम पुनर्चक्रित प्लास्टिक के उपयोग को प्रतिबंधित करते हैं। उदाहरण के लिये, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के मानदंड खाद्य एवं पेय पदार्थ पैकेजिंग क्षेत्र के बड़े हिस्से को इससे बाहर रख सकते हैं।
- कार्यान्वयन तंत्र: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की देख-रेख में एक केंद्रीकृत EPR पोर्टल के माध्यम से अनुपालन पर नज़र रखी जाती है, जिससे निगरानी, रिपोर्टिंग और प्रवर्तन सुनिश्चित होता है।
नोट: जुलाई 2022 में भारत ने कम उपयोगिता वाली लेकिन उच्च स्तर का कूड़ा फैलाने की क्षमता रखने वाली कुछ चुनिंदा एकल-उपयोग वाली प्लास्टिक वस्तुओं के निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री एवं उपयोग पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लागू किया।
भारत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन की बढ़ती चुनौती का सामना कितने प्रभावी ढंग से कर रहा है?
- EPR ढाँचे का संस्थागत सुदृढ़ीकरण: डिजिटल रूप से संचालित विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) व्यवस्था में संक्रमण ने अपारदर्शी सेल्फ-रिपोर्टिंग को एक सत्यापन योग्य, बाज़ार-लिंक्ड क्रेडिट प्रणाली से बदलकर कॉर्पोरेट जवाबदेही में क्रांति ला दी है।
- इस संस्थागत बदलाव से ब्रांड मालिकों को पर्यावरणीय लागतों को आंतरिक रूप से वहन करने के लिये विवश होना पड़ता है, जिससे प्लास्टिक अपशिष्ट की ट्रेसबिलिटी और जीवनचक्र प्रबंधन के लिये एक औपचारिक आर्थिक प्रोत्साहन मिलता है।
- भारत के EPR ढाँचे में तेज़ी से औपचारिककरण हो रहा है, जिसमें केंद्रीकृत पोर्टल पर 60,000 से अधिक PIBO पंजीकृत हैं, जो प्लास्टिक मूल्य शृंखला में बेहतर ट्रेसबिलिटी क्षमता एवं विस्तारित नियामक कवरेज को दर्शाता है।
- इसके अलावा, वर्ष 2022 में EPR दिशानिर्देश लागू होने के बाद से 20.7 मिलियन टन प्लास्टिक पैकेजिंग अपशिष्ट का पुनर्चक्रण किया गया है।
- बिटुमिनस सड़क निर्माण में तकनीकी एकीकरण: भारत ने 'प्लास्टिक रोड' पहल की शुरुआत की है, जिसमें परिवहन अधोसंरचना की मज़बूती बढ़ाने के साथ-साथ निम्न-स्तरीय अपशिष्ट की समस्या का समाधान करने के लिये गैर-पुनर्चक्रणीय प्लास्टिक अपशिष्ट का उपयोग किया जाता है।
- यह अभियांत्रिकीय समन्वय एकल-उपयोग प्लास्टिक के लिये एक विशाल अवशोषण तंत्र निर्मित करता है, जिनका अन्यथा कोई बाज़ार मूल्य नहीं होता, जिससे राजमार्ग निर्माण के कार्बन फुटप्रिंट में उल्लेखनीय कमी आती है।
- प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत मंत्रालय का ‘नई प्रौद्योगिकी पहल हेतु दृष्टि दस्तावेज़–2022’ हरित निर्माण पद्धतियों को प्रोत्साहित करता है।
- इस प्रावधान के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिये यह अनिवार्य किया गया है कि वे भारतीय सड़क काॅन्ग्रेस के मानकों के अनुसार न्यूनतम 70 प्रतिशत उपयुक्त सड़क लंबाई में अपशिष्ट प्लास्टिक का प्रयोग करें।
- शोध से यह सिद्ध होता है कि बिटुमेन (डामर) में प्लास्टिक अपशिष्ट मिलाने से सड़कों की आयु बढ़ जाती है।
- अपशिष्ट-से-ऊर्जा-उत्पादन और औद्योगिक सह-प्रसंस्करण का विस्तार: सीमेंट भट्टियों में प्लास्टिक अपशिष्ट को वैकल्पिक ईंधन और कच्चे माल के रूप में सम्मिलित करने से उच्च ऊष्मीय क्षमता वाले, गैर-पुनर्चक्रणीय बहुस्तरीय प्लास्टिक के निपटान की समस्या का समाधान होता है।
- जीवाश्म ईंधन को पूर्व-पृथक किये गए प्लास्टिक अपशिष्ट से प्रतिस्थापित करके, भारी उद्योग एक साथ डीकार्बोनाइज़ेशन लक्ष्यों को प्राप्त कर रहे हैं तथा खतरनाक पॉलिमर का उच्च तापमान पर तापीय विघटन कर रहे हैं।
- भारतीय सीमेंट उद्योग अब प्लास्टिक सह-प्रसंस्करण के माध्यम से 6-9% की तापीय प्रतिस्थापन दर (TSR) प्राप्त कर रहा है।
- उदाहरण के लिये, अकेले अल्ट्राटेक सीमेंट ने वित्त वर्ष 2025 में 21 लाख टन से अधिक वैकल्पिक ईंधन का उपयोग किया, जिसमें नगरपालिका और औद्योगिक प्लास्टिक अपशिष्ट का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा शामिल है।
- इसने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन में उल्लेखनीय प्रगति करते हुए वित्तीय वर्ष 2025 में 5.1 गुना ‘प्लास्टिक ऋणात्मक’ स्थिति प्राप्त की है।
- प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2026 के माध्यम से विनियामक परिशुद्धता: नवीनतम प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2026 नई पैकेजिंग में न्यूनतम पुनर्चक्रित सामग्री को अनिवार्य करके चक्रीयता को प्राथमिकता देते हैं, जिससे केवल संग्रहण से आगे बढ़कर उच्च-मूल्य संसाधन पुनर्प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित होता है।
- यह नीति 'चक्रीय रूप से तैयार' उत्पादों के डिज़ाइन को अनिवार्य बनाती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्लास्टिक औद्योगिक चक्र के भीतर एक कच्चा माल बना रहे, न कि पर्यावरणीय प्रदूषक।
- नए नियमों के अनुसार, श्रेणी-I की कठोर पैकेजिंग में 30% पुनर्चक्रित सामग्री होना अनिवार्य है, जिसे वर्ष 2028-29 तक बढ़ाकर 60% कर दिया जाएगा।
- अनौपचारिक अपशिष्ट क्षेत्र का औपचारिककरण और समावेशन: हाल के शहरी शासन मॉडल जन-धन से जुड़ी पहचान और सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं (MRF) के माध्यम से 'अपशिष्ट बीनने वालों' को औपचारिक मूल्य शृंखला में एकीकृत कर रहे हैं।
- यह सामाजिक आयाम अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को अग्रिम पंक्ति की पर्यावरणीय सेवा में परिवर्तित करता है, जिससे निम्न-मूल्य प्लास्टिक भी गरिमा-आधारित श्रम मॉडल के माध्यम से संकलित हो पाता है।
- उदाहरण के लिये, इंदौर और अंबिकापुर जैसे शहरों ने अपशिष्ट श्रमिकों को औपचारिक रूप दिया है, उन्हें ई-श्रम कार्ड एवं स्वास्थ्य सेवा प्रदान की है।
- जैव-आधारित और खाद योग्य विकल्पों में नवोन्मेष: भारत में गन्ने के अवशेष और समुद्री शैवाल जैसे कृषि अपशिष्टों से प्राप्त स्वदेशी जैव-आधारित पॉलिमर के अनुसंधान और विकास में तीव्र वृद्धि देखी जा रही है, जो पेट्रोलियम-आधारित एकल-उपयोग प्लास्टिक से स्थायी रूप से बाहर निकलने का एक सतत विकल्प प्रदान करते हैं।
- ये नवोन्मेष भारत के विशाल बायोमास अधिशेष का लाभ उठाकर जैव-अपघटनीय पैकेजिंग का निर्माण करते हैं जो 'मेक इन इंडिया' और 'लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट' (LiFE) मिशन के अनुरूप है।
- भारतीय बायोप्लास्टिक्स बाज़ार में अगले दशक में 20-25% की CAGR से वृद्धि होने की उम्मीद है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक पारंपरिक पैकेजिंग के एक महत्त्वपूर्ण प्रतिशत को प्रतिस्थापित करना है।
- ये नवोन्मेष भारत के विशाल बायोमास अधिशेष का लाभ उठाकर जैव-अपघटनीय पैकेजिंग का निर्माण करते हैं जो 'मेक इन इंडिया' और 'लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट' (LiFE) मिशन के अनुरूप है।
- समुद्री और तटीय प्लास्टिक अवरोधन प्रणालियाँ: गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदी घाटियों में प्लास्टिक को समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तक पहुँचने से पहले ही रोकने के लिये उन्नत नदी अपशिष्ट अवरोधक तथा स्वचालित 'महासागर सफाई' प्रौद्योगिकियों को तैनात किया जा रहा है।
- यह लक्षित हस्तक्षेप इस तथ्य को स्वीकार करता है कि समुद्री प्लास्टिक का लगभग 80 प्रतिशत स्रोत स्थल-आधारित जलमार्ग होते हैं, जिससे विशिष्ट जल-अभियांत्रिकीय समाधानों की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
- एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिये, गंगा नदी में प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिये एक समर्पित RBM सेल और एक विषयगत विशेषज्ञ समूह की स्थापना की गई है।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) अब इन सुधारों पर नज़र रखने के लिये 112 स्थानों पर निगरानी करता है, जहाँ अधिकांश खंडों में जैविक जल गुणवत्ता ‘अच्छी’ से ‘मध्यम’ के बीच पाई गई है।
- 'स्वच्छता ही सेवा' अभियानों के माध्यम से व्यवहारिक परिवर्तन: स्वच्छ भारत मिशन (SBM-U2.0) के अंतर्गत जन-सक्रियता और प्रेरक रणनीतियों ने सरकार-केंद्रित सफाई से समुदाय-आधारित ‘शून्य-अपशिष्ट’ जीवनशैली की ओर परिवर्तन को प्रोत्साहित किया है।
- घरेलू स्तर पर 'चक्रीय अर्थव्यवस्था' की अवधारणा का लाभ उठाकर, भारत नगरपालिका स्तर पर मिश्रित अपशिष्ट के प्रवाह को सफलतापूर्वक कम कर रहा है।
- 'जन आंदोलन' की रिपोर्ट में शहरी स्थानीय निकायों में प्लास्टिक मुक्त अभियानों में लाखों नागरिकों की भागीदारी का उल्लेख किया गया है।
भारत की प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- नियामकीय शिथिलता और EPR अनुपालन में खामियाँ: विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) व्यवस्था में निरंतर शिथिलीकरण ऐसे नियामकीय मार्ग प्रदान करता है, जो कड़े कॉर्पोरेट अनुपालन और संग्रह प्रयासों को हतोत्साहित करते हैं।
- संपूर्ण संग्रहण अनिवार्यता से ध्यान हटाकर लचीले पुनः उपयोग लक्ष्यों पर केंद्रित करने से नीति अनजाने में प्लास्टिक के दीर्घकालिक संचय को वैधता प्रदान करती है।
- वर्ष 2026 के प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन संशोधनों के तहत कंपनियों को अधूरे पुनर्चक्रण कोटा के लिये तीन वर्ष की अवधि तक रीसाइक्लिंग कोटा को आगे ले जाने की कानूनी अनुमति (बशर्ते कि वे सालाना घाटे का कम से कम एक तिहाई हिस्सा पूरा करते हों) दी गई है।
- इससे उत्तरदायित्व कमज़ोर होता है, जिससे कंपनियाँ अनुपालन में विलंब करती हैं और पर्यावरण में अपसंग्रहित प्लास्टिक अपशिष्ट की निरंतर वृद्धि होती है।
- अनौपचारिक अपशिष्ट क्षेत्र का हाशिये पर जाना: अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों के तीव्र, शीर्ष-स्तरीय औपचारिककरण और डिजिटलीकरण से असंगठित अपशिष्ट बीनने वाले हाशिये पर चले जाते हैं, जो ऐतिहासिक रूप से भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था का आधार रहे हैं।
- स्वचालित सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं (MRF) में संरचित एकीकरण के अभाव में यह संवेदनशील कार्यबल आजीविका के गंभीर संकट और जोखिमपूर्ण व्यवसायिक विस्थापन का सामना करता है।
- भारत के पुनर्चक्रण तंत्र की रीढ़ होने के बावजूद, 1.5-4 मिलियन अनौपचारिक अपशिष्ट बीनने वाले काफी हद तक अदृश्य बने हुए हैं, जिनमें से केवल लगभग 1.52 लाख की ही औपचारिक रूप से पहचान की गई है, जो गणना एवं मान्यता में गंभीर कमियों को दर्शाता है।
- बहुस्तरीय प्लास्टिक (MLP) की अड़चन: बहुस्तरीय प्लास्टिक (MLP) की व्यापक खपत एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी अड़चन प्रस्तुत करती है, क्योंकि उनकी जटिल बहुलक-धातु संरचना उन्हें आर्थिक रूप से पुनर्चक्रण के लिये अव्यवहार्य बना देती है।
- भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट का मुख्य कारण पैकेजिंग है, जो कुल प्लास्टिक खपत का लगभग 59% है।
- इसमें बहुस्तरीय प्लास्टिक (MLP) शामिल हैं, जिनका पुनर्चक्रण करना मुश्किल है और जो पर्यावरण प्रदूषण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।
- फार्मास्यूटिकल्स, रिटेल और FMCG जैसे क्षेत्रों के विस्तार के साथ मांग में और वृद्धि होने की उम्मीद है।
- भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट का मुख्य कारण पैकेजिंग है, जो कुल प्लास्टिक खपत का लगभग 59% है।
- असममित प्रसंस्करण अवसंरचना: भारत में उच्च क्षमता वाली प्लास्टिक प्रसंस्करण अवसंरचना की भौगोलिक रूप से गंभीर कमी है, जिसके कारण रिवर्स सप्लाई चेन में भारी लॉजिस्टिक्स संबंधी अक्षमताएँ उत्पन्न होती हैं।
- अत्यधिक औद्योगीकृत क्षेत्रों में पुनर्चक्रण केंद्रों की अत्यधिक सघनता दूरस्थ या पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में उत्पन्न प्लास्टिक अपशिष्ट के परिवहन की लागत को अत्यधिक बढ़ा देती है।
- ORF के अनुसार, भारत में औपचारिक पुनर्चक्रण गुजरात एवं महाराष्ट्र जैसे राज्यों में केंद्रित है, जिनके पास सुदृढ़ अधोसंरचना है और वे पूरे देश से प्लास्टिक अपशिष्ट का निपटान करते हैं।
- हालाँकि, परिवहन की उच्च लागत, पूर्वोत्तर भारत जैसे क्षेत्रों में अपर्याप्त कनेक्टिविटी और अपशिष्ट के उचित पृथक्करण की कमी के कारण पुनर्चक्रण क्षमता का कम उपयोग (केवल 50-60%) होता है।
- भारत के हिमालयी क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण तीव्र गति से बढ़ रहा है, जहाँ 80 प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट एकल-उपयोग खाद्य और पेय पैकेजिंग से आता है।
- इस प्लास्टिक का लगभग 70% हिस्सा पुनर्चक्रण योग्य नहीं है और इसका कोई बाज़ार मूल्य नहीं है, जबकि केवल 18.5%, मुख्य रूप से पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थालेट, पुनर्चक्रण योग्य है।
- महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों का सूक्ष्म-प्लास्टिक संदूषण: वृहद प्लास्टिक का अदृश्य सूक्ष्मप्लास्टिक में व्यापक विघटन भारतीय मृदा की उर्वरता, जलीय जैव विविधता तथा मानव खाद्य सुरक्षा के लिये एक अनिर्धारित विषाक्त खतरा उत्पन्न करता है।
- मौजूदा अपशिष्ट जल उपचार अवसंरचना में इन सिंथेटिक पॉलिमर को महत्त्वपूर्ण नदी तटवर्ती और कृषि प्रणालियों में प्रवेश करने से पहले रोकने के लिये आवश्यक उन्नत झिल्ली (मेम्ब्रेन) प्रौद्योगिकियों का पूरी तरह से अभाव है।
- उदाहरण के लिये, एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि गंगा नदी के ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में माइक्रोप्लास्टिक का स्तर व्यापक रूप से भिन्न होता है, जो जल में लगभग 100 से 1550 कण प्रति लीटर और तलछट में 50 से 1300 कण प्रति किलोग्राम तक होता है।
- कॉर्पोरेट ग्रीनवॉशिंग और बायो-प्लास्टिक को लेकर अस्पष्टता: अस्पष्ट जैव-अपघटनीयता के दावों के माध्यम से 'ग्रीनवॉशिंग' की कॉर्पोरेट प्रवृत्ति सतत उपभोक्ता विकल्पों को कमज़ोर करती है और प्लास्टिक के निपटान को और भी जटिल बनाती है।
- बाज़ार में बिकने वाले कई 'कम्पोस्टेबल' प्लास्टिक को विघटित होने के लिये अत्यधिक विशिष्ट औद्योगिक ताप स्थितियों की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है कि प्राकृतिक वातावरण में फेंके जाने पर वे पारंपरिक, अविनाशी प्रदूषकों के रूप में कार्य करते हैं।
- हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड जैसे कई भारतीय FMCG ब्रांडों पर डिटर्जेंट और पर्सनल केयर जैसे उत्पादों में भ्रामक 'पर्यावरण-अनुकूल' और संधारणीयता संबंधी दावे करने के आरोप लगे हैं, जो कॉर्पोरेट ग्रीनवॉशिंग प्रथाओं को उजागर करते हैं।
- तापीय निपटान पर अत्यधिक निर्भरता: सीमेंट भट्टों में सह-प्रसंस्करण और अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों जैसी तापीय निपटान विधियों पर नीतिगत निर्भरता, मूल रूप से चक्रीय अर्थव्यवस्था के सामग्री-पुनर्प्राप्ति लक्ष्यों को विफल कर देती है।
- यद्यपि यह दृष्टिकोण लैंडफिल पर दबाव को तत्काल कम करता है, किंतु इससे पॉलिमर का भौतिक एवं आर्थिक मूल्य स्थायी रूप से समाप्त हो जाता है तथा दहन मानकों के विफल होने पर खतरनाक वायुमंडलीय उत्सर्जन का जोखिम उत्पन्न होता है।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली स्थित बावना जैसे अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों में प्रायः उत्सर्जन मानकों का उल्लंघन देखा गया है, जहाँ डाइऑक्सिन, फ्यूरॉन तथा Cd+Th जैसे प्रदूषकों का स्तर निर्धारित सीमा से अधिक पाया गया है।
- स्रोत स्तर पर अपशिष्ट पृथक्करण में दीर्घकालिक विफलता: घरेलू स्तर पर अपशिष्ट के सख्त पृथक्करण की प्रणालीगत विफलता नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रवाह को संरचनात्मक रूप से दूषित करती है, जिससे आगे चलकर मैन्युअल छँटाई अत्यधिक श्रमसाध्य और अक्षम हो जाती है।
- अपशिष्ट के अविभाजित निपटान के लिये सख्त वित्तीय दंड लागू करने के प्रति प्रशासनिक उदासीनता नागरिक गैर-अनुपालन को सामान्य बनाती है और संपूर्ण शहरी स्वच्छता ढाँचे को कमज़ोर करती है।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के अनुसार, अपशिष्ट को गीले, सूखे, स्वच्छ और विशेष श्रेणियों में अलग-अलग करना अनिवार्य है, हालाँकि, जन जागरूकता की कमी प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा डालती है।
भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण से निपटने के लिये कौन से उपाय आवश्यक हैं?
- चक्रीय उत्पाद डिजाइन और अपस्ट्रीम हस्तक्षेप: पर्यावरण-उन्मुख औद्योगिक डिज़ाइन मानकों को अनिवार्य बनाकर विनिर्माण स्तर पर ही पॉलिमर में चक्रीयता का समावेश सुनिश्चित किया जा सकता है।
- पॉलिमर प्रकारों के मानकीकरण तथा खतरनाक रासायनिक योजकों के उन्मूलन से छँटाई एवं पुनर्चक्रण की तकनीकी जटिलताएँ उल्लेखनीय रूप से घटती हैं।
- यह दृष्टिकोण अपशिष्ट-उपरांत प्रबंधन पर निर्भरता कम कर सक्रिय सामग्री प्रतिस्थापन एवं जीवन-चक्र आधारित जवाबदेही को प्राथमिकता देता है।
- परिणामस्वरूप, पुनर्चक्रण-अनुकूल डिज़ाइन के माध्यम से प्लास्टिक की आर्थिक उपयोगिता औद्योगिक चक्र के विभिन्न चरणों में अधिकतम बनी रहती है।
- विकेंद्रीकृत सामग्री पुनर्प्राप्ति अवसंरचना: शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में अपशिष्ट प्रसंस्करण अवसंरचना का विकेंद्रीकरण पुनर्चक्रण क्षमता में विद्यमान क्षेत्रीय असमानताओं को प्रभावी रूप से कम करता है।
- स्थानीय प्रशासनिक निकायों के साथ एकीकृत सूक्ष्म-पुनर्प्राप्ति सुविधाओं की स्थापना से लंबी दूरी के अपशिष्ट परिवहन की प्रणालीगत लॉजिस्टिक्स संबंधी बाधा को दूर किया जा सकता है।
- यह स्थानीय हस्तक्षेप कम मूल्य वाले प्लास्टिक को खुले में जलाने अथवा पर्यावरणीय क्षरण से पूर्व ही संगृहीत एवं संसाधित करने में सक्षम बनाता है।
- साथ ही, यह व्यवस्था अनौपचारिक अपशिष्ट संग्रहण तंत्र और औपचारिक पुनर्चक्रण बाज़ारों के बीच मौजूद संरचनात्मक अंतर को पाटकर स्थानीय आपूर्ति शृंखला को सुदृढ़ करती है।
- राजकोषीय प्रोत्साहन और स्तरीय कराधान ढाँचा: एक मज़बूत, स्तरीय कराधान ढाँचे को लागू करने से प्लास्टिक को उनके पर्यावरणीय प्रभाव और अंतर्निहित पुनर्चक्रण क्षमता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- जटिल, बहुस्तरीय कच्चे प्लास्टिक पर भारी प्रगतिशील कर लगाने से व्यवस्थित रूप से उनके निरंतर कॉर्पोरेट उत्पादन और सामान्य उपभोक्ता उपयोग को हतोत्साहित किया जाता है।
- इसके विपरीत, स्वदेशी जैव-पॉलिमर और उच्च श्रेणी के पुनर्चक्रित रेजिन के लिये कर सब्सिडी प्रदान करने से सस्ते पेट्रोकेमिकल विकल्पों की तुलना में उनकी बाज़ार प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा मिलता है।
- यह राजकोषीय समायोजन स्थिरता के बाज़ार मूल्य को कृत्रिम रूप से बढ़ा देता है, जिससे प्रमुख ब्रांड मालिकों के लिये पारिस्थितिकी नियमों का उल्लंघन आर्थिक रूप से अव्यवहार्य हो जाता है।
- अपशिष्ट अर्थव्यवस्था का औपचारिककरण: अनौपचारिक अपशिष्ट बीनने वालों को औपचारिक शहरी स्वच्छता पदानुक्रम में संरचनात्मक रूप से समाहित करना देश की पुनर्चक्रण आपूर्ति शृंखला की आधारभूत नींव को सुरक्षित करता है।
- व्यवसायिक वैधता, न्यूनतम स्वास्थ्य सुरक्षा और मानकीकृत न्यूनतम वेतन प्रदान करने से अत्यधिक हाशिये पर पड़े श्रमिकों को मान्यता प्राप्त अग्रिम पंक्ति के पर्यावरण संरक्षकों में परिवर्तित किया जा सकता है।
- इन पारंपरिक सामाजिक-आर्थिक नेटवर्कों को आधुनिक, डिजिटीकृत संसाधन पुनर्प्राप्ति रूपरेखाओं में एकीकृत करना ज़मीनी स्तर पर अपशिष्ट पृथक्करण दक्षता के प्रणालीगत ह्रास को रोकता है।
- यह समावेशी संक्रमण न्यायसंगत आर्थिक वितरण सुनिश्चित करता है तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाली अनिवार्य मानव पूँजी का संरक्षण करता है।
- स्थानीय व्यवहारिक प्रोत्साहन: घरेलू स्तर पर विकेंद्रीकृत, प्रोत्साहन-संचालित अपशिष्ट पृथक्करण तंत्रों का क्रियान्वयन स्वच्छता के प्रति स्थापित नागरिक व्यवहारिक मानदंडों में मूलभूत परिवर्तन करता है।
- अति-स्थानीय गेमीफिकेशन रणनीतियों, जैसे स्रोत स्तर पर शत-प्रतिशत पृथक्करण हेतु प्रत्यक्ष उपयोगिता बिल छूट, नागरिक अनुपालन के लिये ठोस सूक्ष्म-आर्थिक प्रोत्साहन उत्पन्न करती हैं।
- यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन अपशिष्ट प्रबंधन को केवल निष्क्रिय नगरपालिका दायित्व से आगे बढ़ाकर एक सक्रिय एवं लाभकारी सामुदायिक गतिविधि के रूप में स्थापित करता है।
- सूक्ष्म स्तर पर निरंतर व्यवहारिक अभ्यस्तता अंततः कार्बनिक प्रदूषण को समाप्त करती है, जिससे पुनर्चक्रण योग्य पॉलिमरों की शुद्ध भौतिक गुणवत्ता संरक्षित रहती है।
- डिजिटाइज्ड ट्रैकिंग और ट्रेसिबिलिटी इकोसिस्टम: एक अपरिवर्तनीय, ब्लॉकचेन-सक्षम ट्रेसिबिलिटी ग्रिड का निर्माण निर्मित प्लास्टिक उत्पादों के संपूर्ण परिचालन जीवनचक्र में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।
- यह डिजिटलीकृत शासन संरचना, उत्पादक उत्तरदायित्व कोटा को ऐतिहासिक रूप से प्रभावित करने वाले प्रणालीगत ग्रीनवॉशिंग और धोखाधड़ीपूर्ण पर्यावरणीय रिपोर्टिंग को सक्रिय रूप से समाप्त करती है।
- द्वितीयक कच्चे माल की वास्तविक समय में भू-स्थानिक ट्रैकिंग, उत्पादन बिंदु से लेकर अंतिम औद्योगिक सह-प्रसंस्करण तक सख्त नियामक निगरानी सुनिश्चित करती है।
- इस एल्गोरिथम आधारित निगरानी को लागू करने से यह सुनिश्चित होता है कि कंपनियों के स्थिरता संबंधी दावों को निर्बाध, छेड़छाड़-रहित प्रशासनिक डेटा द्वारा अनुभवजन्य रूप से मान्य किया जाता है।
- नदी तटीय क्षेत्रों में उन्नत झिल्ली निस्पंदन: रणनीतिक नदी-तटीय अवसंरचना को उन्नत झिल्ली निस्यंदन प्रौद्योगिकियों से सुदृढ़ करना सूक्ष्म-प्लास्टिक के पारिस्थितिकी तंत्र में प्रवेश के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण अवरोध के रूप में कार्य करता है।
- नगरपालिका अपशिष्ट जल निकासी बिंदुओं पर उच्च-गुणवत्ता युक्त कृत्रिम अवरोध प्रणालियों की स्थापना संवेदनशील कृषि बाढ़-मैदानी क्षेत्रों के दीर्घकालिक प्रदूषण को रोकती है।
- यह स्थानीय जल-इंजीनियरिंग हस्तक्षेप शहरी भूमि से निकलने वाले अपवाह और महत्त्वपूर्ण समुद्री जैव विविधता हॉटस्पॉट के बीच प्रदूषण के मार्ग को सक्रिय रूप से विच्छेदित करता है।
- इन महत्त्वपूर्ण जलग्रहण सीमाओं की सुरक्षा अपघटित होते कृत्रिम पॉलिमरों से उत्पन्न अदृश्य, विषाक्तीय खतरों के विरुद्ध एक अनिवार्य पारिस्थितिकीय रक्षा तंत्र है।
- वैश्विक व्यापार और रिवर्स लॉजिस्टिक्स का समन्वयन: उन्नत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ढाँचों के साथ घरेलू अपशिष्ट पुनर्प्राप्ति प्रोटोकॉल का संरेखण उच्च-मूल्य द्वितीयक कच्चे माल की अंतर्राष्ट्रीय गतिशीलता को अनुकूलित करता है।
- सीमा पार रिवर्स लॉजिस्टिक्स का मानकीकरण यह सुनिश्चित करता है कि प्रीमियम पुनर्चक्रित रेजिन बिना किसी भारी टैरिफ बाधा के वैश्विक विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाओं में आसानी से प्रवेश कर सकें।
- इन समन्वित भू-राजनीतिक व्यापार गलियारों का विकास निम्न-गुणवत्ता अंतर्राष्ट्रीय अपशिष्ट के घरेलू निष्कासन को रोकता है तथा उच्च-गुणवत्ता चक्रीय उत्पादों के निर्यात को अधिकतम करता है।
- यह रणनीतिक आर्थिक अंतर्राष्ट्रीयकरण शासन मॉडल को वैश्विक प्रदूषण के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता से एक सक्रिय, सतत सामग्री प्रसंस्करण केंद्र के रूप में पुनर्स्थापित करता है।
निष्कर्ष:
भारत की प्लास्टिक-मुक्त अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रगति, संग्रहण-आधारित मॉडल से आगे बढ़कर मूल्य-आधारित चक्रीय पारिस्थितिकी तंत्र की स्थापना पर निर्भर करती है, जिसमें अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभावी एकीकरण भी शामिल हो। यद्यपि वर्ष 2026 के संशोधनों में पुनर्चक्रित सामग्री के लिये महत्त्वपूर्ण अनिवार्यताओं को शामिल किया गया है, लेकिन प्रवर्तन की 'अनुकूलता' तत्काल जवाबदेही और पर्यावरणीय संरक्षण के लिये एक महत्त्वपूर्ण जोखिम बना हुआ है। दीर्घकालिक सफलता के लिये ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसबिलिटी, स्वदेशी जैव-पॉलिमर नवाचार तथा बहुस्तरीय प्लास्टिक के कठोर उन्मूलन के मध्य समन्वित दृष्टिकोण आवश्यक है। औद्योगिक डिज़ाइन को ज़मीनी स्तर पर अपशिष्ट पृथक्करण तंत्र के साथ एकीकृत करके ही भारत अपने बढ़ते अपशिष्ट संकट को सतत संसाधन में रूपांतरित कर सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2026 ‘अपशिष्ट संग्रह’ से ‘संसाधन पुनर्प्राप्ति’ की ओर संक्रमण को प्रदर्शित करते हैं। इस परिवर्तन का भारत के विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) ढाँचे पर क्या प्रभाव पड़ता है, मूल्यांकन कीजिये। |
हिंदी
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. वर्ष 2026 के प्लास्टिक नियमों में प्रमुख परिवर्तन क्या है?
इसमें नई प्लास्टिक पैकेजिंग में पुनर्चक्रित सामग्री का न्यूनतम प्रतिशत (30-60%) अनिवार्य किया गया है।
2. EPR में 'कैरी-फॉरवर्ड' का क्या अर्थ है?
यह कंपनियों को एक वर्ष के छूटे हुए पुनर्चक्रण लक्ष्यों को आगामी तीन वर्षों में पूरा करने की अनुमति देता है।
3. बहुस्तरीय प्लास्टिक (MLP) का पुनर्चक्रण करना कठिन क्यों है?
इनकी जटिल संरचना, जिसमें प्लास्टिक तथा धातु की परत का संयोजन होता है, यांत्रिक पृथक्करण को आर्थिक रूप से अव्यवहार्य बना देती है।
4. ऊष्मीय प्रतिस्थापन दर (TSR) क्या है?
यह औद्योगिक भट्टियों में जीवाश्म ईंधनों के स्थान पर उपयोग किये जाने वाले वैकल्पिक ईंधनों (जैसे प्लास्टिक अपशिष्ट) के अनुपात को प्रदर्शित करता है।
5. ‘लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’ (LiFE) मिशन क्या है?
पर्यावरण संरक्षण के लिये व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर कार्रवाई को प्रोत्साहित करने के लिये भारत के नेतृत्व में एक वैश्विक पहल।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. भारत में निम्नलिखित में से किसमें एक महत्त्वपूर्ण विशेषता के रूप में ‘विस्तारित उत्पादक दायित्व’ आरंभ किया गया था? (2019)
(a) जैव चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 1998
(b) पुनर्चक्रित प्लास्टिक (निर्माण और उपयोग) नियम, 1999
(c) ई-अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 2011
(d) खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011
उत्तर: (c)
प्रश्न 2. पर्यावरण में निर्मुक्त हो जाने वाली ‘सूक्ष्ममणिकाओं (माइक्रोबीड्स)’ के विषय में अत्यधिक चिंता क्यों है? (2019)
(a) ये समुद्री पारितंत्रों के लिये हानिकारक मानी जाती हैं।
(b) ये बच्चों में त्वचा कैंसर होने का कारण मानी जाती हैं।
(c) ये इतनी छोटी होती हैं कि सिंचित क्षेत्रों में फसल पादपों द्वारा अवशोषित हो जाती हैं।
(d) अक्सर इनका इस्तेमाल खाद्य-पदार्थों में मिलावट के लिये किया जाता है।
उत्तर: (a)
प्रश्न 3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी.) किस प्रकार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सी.पी.सी.बी.) से भिन्न है? (2018)
- एन.जी.टी. का गठन एक अधिनियम द्वारा किया गया है जबकि सी.पी.सी.बी. का गठन सरकार के कार्यपालक आदेश से किया गया है।
- एन.जी.टी. पर्यावरणीय न्याय उपलब्ध कराता है और उच्चतर न्यायालयाें में मुकदमाें के भार को कम करने में सहायता करता है जबकि सी.पी.सी.बी. झरनाें और कुँओं की सफाई को प्रोत्साहित करता है, तथा देश में वायु की गुणवत्ता में सुधार लाने का लक्ष्य रखता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न 1. निरंतर उत्पन्न किये जा रहे फेंके गए ठोस कचरे की विशाल मात्राओं का निस्तारण करने में क्या-क्या बाधाएँ हैं? हम अपने रहने योग्य परिवेश में जमा होते जा रहे जहरीले अपशिष्टों को सुरक्षित रूप से किस प्रकार हटा सकते हैं? (2018)
