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धन शोधन निवारण अधिनियम

  • 30 Jul 2022
  • 12 min read

यह एडिटोरियल 29/07/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Narrow view: On the Supreme Court’s PMLA verdict” लेख पर आधारित है। इसमें धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 में हाल ही में किये गए संशोधनों से संबद्ध आशंकाओं के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

धन शोधन या मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) एक जघन्य अपराध है जो न केवल देश के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है, बल्कि आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे अन्य गंभीर अपराधों को भी बढ़ावा देता है। यह एक बढ़ती हुई समस्या है जिसे संबोधित करने की आवश्यकता है।

  • वर्ष 2002 में तैयार किये गए धन शोधन निवारण अधिनियम (Prevention Of Money Laundering Act- PMLA) में धन शोधन के अपराध से निपटने के लिये इसे और प्रबल बनाने हेतु समय-समय पर कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये गए हैं।
  • देश भर में कई याचिकाएँ दायर की गई हैं जो PMLA के तहत प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate- ED) को अपराधपूर्ण तरीके से अर्जित आय मानी जाने वाली संपत्तियों की तलाशी, जब्ती, जाँच और कुर्की करने के लिये सौंपी गई अबाध शक्तियों पर सवाल उठाती हैं।

धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002

  • मनी लॉन्ड्रिंग से तात्पर्य वैसे धन के रूपांतरण से है जो गैरकानूनी स्रोतों और विधियों द्वारा अवैध रूप से प्राप्त किया गया है।
  • यह भारत में एक आपराधिक कृत्य है और इस मामले में आरोप धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के वैधानिक प्रावधानों का संदर्भ लेते हैं।
  • PMLA को भारत की वैश्विक प्रतिबद्धता (वियना कन्वेंशन) की अनुक्रिया में धन शोधन की समस्या का मुकाबला करने के लिये अधिनियमित किया गया था। इसमें शामिल हैं:
  • PMLA सभी पर लागू होता है जिसमें व्यक्ति, कंपनियाँ, फर्म, साझेदारी फर्म, व्यक्तियों के संघ या निगमन और उपर्युक्त में से किसी के भी स्वामित्व या नियंत्रण वाली कोई एजेंसी, कार्यालय या शाखा शामिल हैं।

Money-Laundering

PMLA में हाल के संशोधन

  • अपराध से अर्जित आय की स्थिति के बारे में स्पष्टीकरण: अपराध से अर्जित आय (Proceeds of crime) में न केवल अनुसूचित अपराध से प्राप्त संपत्ति शामिल है, बल्कि किसी भी आपराधिक गतिविधि से संबंधित या अनुसूचित अपराध के समान किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल होकर प्राप्त की गई कोई अन्य संपत्ति भी शामिल होगी।
  • मनी लॉन्ड्रिंग की परिभाषा में परिवर्तन: इससे पूर्व मनी लॉन्ड्रिंग एक स्वतंत्र अपराध नहीं था, बल्कि अन्य अपराध पर निर्भर था, जिसे विधेय अपराध या अनुसूचित अपराध (Predicate offence or Scheduled offence) के रूप में जाना जाता है।
    • संशोधन ने मनी लॉन्ड्रिंग को स्वयं में विशिष्ट अपराध मानने का प्रयास किया है।
    • PMLA की धारा 3 के तहत उस व्यक्ति पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया जाएगा यदि वह व्यक्ति किसी भी तरह से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपराध से अर्जित आय से संलग्न है।
      • आय छिपाना
      • स्वामित्व
      • अधिग्रहण
      • बेदाग संपत्ति के रूप में उपयोग करना या पेश करना
      • बेदाग संपत्ति के रूप में दावा करना
  • अपराध की निरंतर प्रकृति: इस संशोधन में आगे उल्लेख किया गया है कि उस व्यक्ति को मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध में उस स्तर तक शामिल माना जाएगा जहाँ तक उस व्यक्ति को मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित गतिविधियों का फल मिल रहा है क्योंकि यह अपराध निरंतर प्रकृति का है।

PMLA में संशोधनों के बारे में प्रकट की गई चिंताएँ

  • शक्तियों का संभावित दुरुपयोग: इस बात की प्रबल संभावना है कि PMLA को किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी या विरोधी के विरुद्ध उपयोग किया जा सकता है, क्योंकि इसकी कार्रवाई स्वयं में एक दंड की तरह है।
  • ECIR से संबद्ध समस्याएँ: ECIR (Enforcement Case Information Report), जो FIR के समान है, एक ‘आंतरिक दस्तावेज़’ माना जाता है और आरोपी को नहीं सौंपा जाता है।
    • पूरी प्रक्रिया के दौरान आरोपी को अपने खिलाफ लगाए गए आरोप के तथ्य भी नहीं पता होते हैं, क्योंकि एकमात्र दस्तावेज जिसमें आरोप दर्ज़ होता है, वह ECIR है जो आरोपी व्यक्तियों को नहीं सौंपा जाता है।
  • सामान्य आपराधिक कानून के विपरीत: PMLA सामान्य आपराधिक कानून से अलग है।
    • सामान्य आपराधिक कानून में दोषी साबित होने तक प्रत्येक आरोपी निर्दोष माना जाता है।
    • लेकिन PMLA में यह बोझ आरोपी व्यक्तियों पर स्थानांतरित कर दिया गया है वे अपना निर्दोष होना स्वयं साबित करें।
  • अभियुक्त को साक्षी बनने के लिये बाध्य करना: PMLA की धारा 63 में कहा गया है कि आरोपी द्वारा सूचना प्रदान करनी होगी; झूठी सूचना या सूचना छुपाने को एक अन्य आपराधिक कृत्य माना जाएगा।
    • अभियुक्त को स्वयं के विरुद्ध साक्षी बनने के लिये बाध्य करना आत्म-दोष के विरुद्ध निषेध के अधिकार (Right against Self-Incrimination) का उल्लंघन है ।
  • ED की अक्षमता: इस कानून के तहत प्रवर्तन निदेशालय की दोषसिद्धि दर बहुत कम है; जबकि हज़ारों मामले दर्ज किये गए, लोगों को गिरफ्तार किया गया और उनके जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित किया गया।
    • भारत की संसद में सरकार द्वारा उद्धृत आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2005 से 2013-14 के बीच शून्य दोष सिद्ध हुए। वर्ष 2014-15 से 2021-22 तक ED द्वारा जाँच किये गए 888 मामलों में से केवल 23 मामलों में ही दोष सिद्ध हुआ।

प्रवर्तन निदेशालय

  • प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के तहत कार्यरत एक विशेष वित्तीय अन्वेषण एजेंसी है।
  • वर्ष 1956 में आर्थिक मामलों के विभाग में विनिमय नियंत्रण कानून के उल्लंघन से निपटने के लिये आर्थिक मामलों के विभाग में एक 'प्रवर्तन इकाई' का गठन किया गया।
  • वर्ष 1957 में इस इकाई का नाम बदलकर ‘प्रवर्तन निदेशालय’ कर दिया गया।
  • ED निम्नलिखित कानूनों को लागू करता है:
  • विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999
  • धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002

PMLA में संशोधन के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का रुख

  • सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने PMLA के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है और इसे एक ‘अद्वितीय और विशेष कानून’ कहा है। इसने पूछताछ करने, लोगों को गिरफ्तार करने और संपत्ति को कुर्क करने की ED की शक्तियों को भी रेखांकित किया।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि PMLA और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1973) के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती।
    • न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुसूचित अपराध के संबंध में रोकथाम, जाँच या परीक्षण के संबंध में आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता के तंत्र से इसकी तुलना नहीं की जा सकती।
  • न्यायालय ने यह भी माना है कि ECIR की तुलना FIR से नहीं की जा सकती है।
    • ECIR को ER का आंतरिक दस्तावेज स्वीकार किया गया और कहा गया कि आरोपी को ECIR की प्रति सौंपा जाना अनिवार्य नहीं है और गिरफ्तारी के दौरान केवल कारणों का खुलासा करना ही पर्याप्त है जहाँ उसे गिरफ्तारी के आधार के बारे में केवल सूचित किया जा सकता है।

आगे की राह

  • आंतरिक नियंत्रण और संतुलन: यह तथ्य है कि कानून ने ED को अभियुक्तों से निपटने के लिये प्रबल शक्तियाँ प्रदान की हैं जो इसके राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना को बढ़ा सकती है।
    • लेकिन PMLA के तहत प्रावधान की संवैधानिकता का पालन करने के लिये अधिनिर्णयन प्राधिकरण और ED अधिकारियों के बीच एक आम सहमति होनी चाहिये ताकि जाँच अधिकाधिक स्पष्ट एवं पारदर्शी हो।
  • कार्रवाई की प्रक्रिया अपने-आप में ही दंडात्मक नहीं हो: ED की विस्तारित शक्तियों का स्वागत मामलों को तेज़ी से निपटाने की अधिक प्रतिबद्धता के साथ किया जाना चाहिये, ताकि न्यायपालिका और प्रवर्तन एजेंसियां दोनों त्वरित परीक्षण और दोषसिद्धि के साथ आगे बढ़ सकें।
  • कार्यात्मक निगरानी: प्रवर्तन निदेशालय के कार्यकरण और वर्तमान प्रकृति की लगातार निगरानी होनी चाहिये यदि यह स्पष्टीकरण दोषसिद्धि दर में सुधार ला सके (जो अभी आधे प्रतिशत से भी कम है)।
    • यदि कार्यान्वयन के मामले में कोई कमी हो तो चूँकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इन अंतरालों को उपयुक्त कानून, कार्यकारी कार्रवाई या शीर्ष न्यायालय के संशोधित आदेश के माध्यम से भरा जा सकता है।

अभ्यास प्रश्न: ‘‘प्रवर्तन निदेशालय को धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 और इसके उत्तरवर्ती संशोधनों के तहत लगभग पूर्ण शक्तियाँ सौंप दी गई हैं।’’ टिप्पणी कीजिये।

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