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दक्षिण एशिया में डिजिटल रूपांतरण

  • 09 Aug 2021
  • 13 min read

यह एडिटोरियल दिनांक 07/08/2021 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित ‘‘South Asia's emerging digital transformation’’ लेख पर आधारित है। यह दक्षिण एशिया में विद्यमान समस्याओं और उनके समाधान में डिजिटल रूपांतरण की भूमिकाओं की चर्चा करता है।

कोविड-19 महामारी ने दक्षिण एशिया को डिजिटलीकरण की दिशा में एक बड़ी छलांग लगाने के लिए बाध्य किया है। दूरस्थ कार्य और शिक्षा की ओर बढ़े क़दम ने इंटरनेट की पहुँच में अभूतपूर्व वृद्धि की है और नेपाल जैसे छोटे देशों में भी ब्रॉडबैंड इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में लगभग 11% की वृद्धि दर्ज की गई है।  

पुरातन और कमज़ोर सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना वाले क्षेत्रों के लिये स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं का डिजिटलीकरण एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हुआ है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों का नवीन समाधान प्रदान कर रहा है। भारत में कोविड-19 ने राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के शुभारंभ को गति प्रदान की जहाँ प्रत्येक नागरिक के लिये एक अद्वितीय स्वास्थ्य पहचान पत्र के साथ स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं तक उनकी पहुँच और दक्षता का विस्तार किया। 

महामारी के कारण भौतिक अवस्थिति वाले कारोबारों (bricks-and-mortar businesses) में आए अवरोध ने आर्थिक विकास की गति को धीमा कर दिया। इस परिप्रेक्ष्य में दक्षिण एशियाई भूभाग के लिये यह अनिवार्य है कि वह इस क्षेत्र की प्रमुख समस्या (निर्धनता) के विरुद्ध सामूहिक संघर्ष के लिये नवीन प्रौद्योगिकीय प्रगति के अनुकूल बने।

दक्षिण एशिया में प्रौद्योगिकीय चुनौतियाँ

  • यह भूभाग जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएँ , गरीबी, निरक्षरता और सामाजिक एवं लैंगिक असंतुलन जैसी कई साझा समस्याओं की साझेदारी करता है। 
  • डिजिटल डिवाइड: चूँकि यह विश्व के निर्धनतम भूभागों में से एक है इसलिये इस क्षेत्र की विभिन्न देशों के मध्य पहुँच और वहनीयता के मामले में एक व्यापक डिजिटल अंतराल भी पाया जाता है।  
    • भारत में विश्व के दूसरे सबसे बड़े ऑनलाइन बाज़ार की उपस्थिति के बावजूद इसकी आबादी के 50% के पास इंटरनेट सुविधा नहीं है; बांग्लादेश के लिये यह आँकड़ा 59% और पाकिस्तान के लिये 65% है।  
  • महिलाओं और बच्चों का बहिर्वेशन: मौद्रिक और स्वास्थ्य सहायता योजनाओं के ऑनलाइन वितरण के साथ दक्षिण एशियाई महिलाओं का 51% भाग महामारी के दौरान सामाजिक सुरक्षा उपायों के लाभ से वंचित रह गया।   
    • बच्चे भी इसका शिकार हुए जहाँ 88% बच्चों के पास इंटरनेट संचालित होम स्कूलिंग तक पहुँच नहीं थी।
    • यह व्यवधान बच्चों को स्थायी रूप से स्कूल से बाहर कर सकता है, बालिकाओं को आयु-पूर्व विवाह के जोखिम में डाल सकता है और गरीब बच्चों को बाल श्रम की ओर धकेल सकता है जिससे अर्थव्यवस्था को भविष्य में अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।
  • डिजिटल समाधानों में अंतर के कारण कारोबारों पर प्रभाव: कई दक्षिण एशियाई कंपनियाँ नोवल कोरोनावायरस महामारी की वित्तीय अराजकता से बचने के लिए ई-कॉमर्स या अन्य क्लाउड-आधारित तकनीकों को अपनाने में विफल रहीं। 
    • इस भूभाग में बिक्री में 64% की गिरावट दर्ज की गई, जहाँ लघु कंपनियों और महिलाओं के नेतृत्त्व में संचालित फर्मों का प्रदर्शन सबसे बदतर रहा।  
    • कोविड-19 के कारण कार्य-शैली में परिवर्तन के साथ युवाओं के बीच कौशल का चरम अंतर बना रहेगा जिससे बेरोज़गारी की समस्या बढ़ेगी।

इस क्षेत्र के विकास में डिजिटल रूपांतरण की भूमिका:

  • विकास आधारित एजेंडा: क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और बिग डेटा जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाने के साथ डिजिटल रूपांतरण एक वैश्विक अनिवार्यता है और यही सफलता की कुंजी है।   
    • बैंकिंग से लेकर विनिर्माण और खुदरा क्षेत्र तक डिजिटल प्रौद्योगिकी की भूमिका इतनी महत्त्वपूर्ण है कि इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती, जबकि विभिन्न देश अपने विकास एजेंडे के संचालन के लिए डिजिटल क्रांति का ही सहारा लेते हैं।
    • दक्षिण एशिया में महामारी के बाद के विकास क्रम को ई-कॉमर्स बढ़ावा दे सकता है, जो व्यापार के नए अवसर और बड़े बाज़ारों तक पहुँच प्रदान करेगा। 
    • भारत में ई-कॉमर्स वर्ष 2030 तक एक मिलियन रोज़गार अवसरों का सृजन कर सकता है और वर्ष 2026 तक यह 200 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक का हो सकता है।
    • फिनटेक (Fintech) वित्तीय समावेशन को सुदृढ़ कर उल्लेखनीय विकास कर सकता है और गरीबी को कम कर सकता है।  
    • एक समयबद्ध, समावेशी और संवहनीय डिजिटल रूपांतरण न केवल उत्पादकता और विकास की वृद्धि कर सकता है बल्कि भूभाग के कुछ सामाजिक-आर्थिक विभाजन के लिये रामबाण के रूप में भी कार्य कर सकता है।
  • एशियाई अर्थव्यवस्थाओं का उदाहरण: एशियाई डिजिटलीकरण में सबसे आगे सिंगापुर, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश हैं जिन्हें वैश्विक प्रौद्योगिकी केंद्र (global technological hubs) के रूप में मान्यता प्राप्त है। 
    • स्मार्टफोन की संख्या एवं इंटरनेट तक पहुँच में वृद्धि और विश्वसनीय डिजिटल भुगतान मंचों की उपलब्धता के कारण चीन का ई-कॉमर्स उद्योग वर्ष 2024 में 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच जाएगा।
    • दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ या आसियान (ASEAN) देशों की अर्थव्यवस्थाओं में डिजिटल उछाल एक "साझा बाज़ार" पहल को आगे बढ़ा रहा है , क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा दे रहा है और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा मज़बूत कर रहा है।    

आगे की राह

  • एक सुदृढ़ डिजिटल अवसंरचना की आवश्यकता: डिजिटल रूपांतरण के लाभांश को पा सकने के लिये दक्षिण एशिया क्षेत्र को विधिक, विनियामक और नीति अंतराल को संबोधित करने के साथ ही डिजिटल कौशल को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। 
    • एक सुदृढ़ डिजिटल अवसंरचना एक अनिवार्य शर्त है और यही एक वृहत वित्तपोषण अंतराल भी मौजूद है।
    • अकेले भारत को ही शीर्ष पाँच डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकने के लिए 35 मिलियन अमेरिकी डॉलर के वार्षिक निवेश की आवश्यकता है और भूभाग के डिजिटल अवसंरचना वित्तपोषण के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी का लाभ उठाया जाना चाहिये।   
  • उपयुक्त विनियमन की आवश्यकता: चूँकि दक्षिण एशिया में ई-कॉमर्स विनियमन कमज़ोर हैं इसलिये विनियमन बाधाओं को दूर किया जाना चाहिये। 
    • क्षेत्र के विकास को गति देने के लिए ग्राहक संरक्षण, डिजिटल एवं बाज़ा पहुंच विनियमन आदि जैसे मुद्दों को संबोधित करने की आवश्यकता है।  
  • सार्वभौमिक डिजिटल साक्षरता: सार्वभौमिक डिजिटल साक्षरता के बिना कोई डिजिटल क्रांति घटित नहीं होगी।  
    • शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिये सरकारों और व्यवसायों को एक साथ आने की आवश्यकता है ताकि डिजिटल कौशल और ऑनलाइन मंचों की माँग की पूर्ति की जा सके।
  • साइबर सुरक्षा की आवश्यकता: डेटा और व्यक्तिगत सूचनाओं का प्रवाह साइबर सुरक्षा उपायों की आवश्यकता रखता है।   
  • अंतर-क्षेत्रीय व्यापार में वृद्धि करना: दक्षिण एशिया में अभी तक अंतर-क्षेत्रीय व्यापार क्षमता के केवल एक-तिहाई का ही दोहन किया जा सका है और राजस्व में लगभग 23 बिलियन अमेरिकी डॉलर गँवा दिये गए हैं। 
    • सीमा-पार ई-कॉमर्स गतिविधियों के लिये परिवहन से संबंधित बाधाओं और मुद्रा प्रवाह पर नियामक बाधाओं जैसे मुद्दों को संबोधित कर दक्षिण एशिया यूरोपीय संघ के ‘डिजिटल सिंगल मार्केट प्रस्ताव’ का अनुकरण कर सकता है।
  • परस्पर सहयोग की आवश्यकता: दक्षिण एशिया को गतिरोध से बाहर निकालने और साझा समृद्धि के डिजिटल भविष्य की ओर आगे धकेलने के लिये सभी स्तरों पर समेकित सहयोग की आवश्यकता है। 
    • विनियामक एवं भौतिक अवसंरचना, विभिन्न कौशल और क्षेत्रीय सहयोग का सही मिश्रण एक डिजिटल यूटोपिया की ओर ले जा सकता है, जबकि इसकी कमी एक अराजक भविष्य की ओर ले जा सकती है।
    • उन लोगों के लिये पर्याप्त समर्थन की आवश्यकता है जो डिजिटल प्रगति के दायरे से बाहर गिरने का जोखिम रखते हैं।
    • एक साझा "डिजिटल विजन" इस क्षेत्र को चौथी औद्योगिक क्रांति की ओर जा सकने का सही मार्ग प्रदान कर सकती है।

निष्कर्ष

महामारी के दौरान दक्षिण एशियाई राष्ट्रों ने कोविड-19 आपातकालीन कोष में योगदान, स्वास्थ्य निगरानी पर आँकड़े एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान, अनुसंधान निष्कर्षों की साझेदारी और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिये एक ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म के विकास के रूप में संकट से सामूहिक संघर्ष का दृष्टिकोण प्रकट किया। 

यदि दक्षिण एशियाई राष्ट्र अपने दृष्टिकोण को साकार कर सकते हों तो एक सफल डिजिटल क्रांति के लिये साझेदारी निश्चय ही प्रशंसनीय है। इसके लिये भूभाग के राजनीतिक नेतृत्त्व के उच्चतम स्तर पर दूरदृष्टि, विवेक और प्रतिबद्धता की आवश्यकता होगी।

अभ्यास प्रश्न: दक्षिण एशियाई भूभाग द्वारा महामारी के बाद डिजिटल जीवन का अंगीकरण भविष्य में  उसकी समृद्धि को आकार दे सकता है। चर्चा कीजिये।  

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