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आयुर्वेद और सर्जरी

  • 07 Dec 2020
  • 11 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सरकार ने एक अधिसूचना के माध्यम से कुछ विशिष्ट सर्जिकल प्रक्रियाओं को सूचीबद्ध किया, जिनके लिये आयुर्वेद के स्नातकोत्तर मेडिकल छात्र को प्रशिक्षित किया जाएगा।

  • भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) ने केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद (CCIM) द्वारा जारी इस अधिसूचना का विरोध किया है।
  • भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) आधुनिक चिकित्सकीय प्रणालियों का उपयोग करने वाले डॉक्टरों का स्वैच्छिक राष्ट्रीय संगठन है, जो कि डॉक्टरों के हितों की रक्षा करते हुए संपूर्ण मानव समाज के कल्याण के लक्ष्य को आगे बढ़ा रहा है।

प्रमुख बिंदु

  • आयुर्वेद में सर्जरी का इतिहास
    • ऋग्वेद, अब तक के ज्ञात सबसे पुरानी वैदिक संस्कृत रचनाओं में से एक है, जिसमें अश्विनी कुमारों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें देव वैद्य के रूप में जाना जाता था, ये वैदिक काल के प्रमुख सर्जन थे और उन्होंने कई दुर्लभ पौराणिक शल्यक्रियाएँ की थीं।
    • भारत में आयुर्वेद से संबंधित कई ग्रंथ और संहिताएँ हैं, जिनमें चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग संग्रह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
      • चरक संहिता और अष्टांग संग्रह मुख्य तौर पर औषधि ज्ञान से संबंधित हैं, जबकि सुश्रुत संहिता मुख्य रूप से शल्य ज्ञान (Surgical Knowledge) से संबंधित है।
      • सुश्रुत को भारत में शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है और उनकी रचनाएँ सुश्रुत संहिता के रूप में संकलित हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक में 120 प्रकार के उपाकर्मों (Upakarmas) और 300 प्रकार की सर्जिकल प्रक्रियाओं का वर्णन किया है। उन्होंने सर्जरी को 8 प्रकार की श्रेणियों में वर्गीकृत किया है।
      • सुश्रुत ने सर्जरी को चिकित्सा की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण शाखा माना है। उनके मुताबिक, इसके अंतर्गत चिकित्सकीय उपकरणों के माध्यम से तात्कालिक प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता है, इसलिये चिकित्सा की अन्य प्रणालियों की तुलना में इसका महत्त्व काफी अधिक है।
  • मौजूदा विवाद: यह पूरा विवाद आयुर्वेद में स्नातकोत्तर शिक्षा की शल्य (सामान्य सर्जरी) और शालाक्य (आँख, कान, नाक, गला, सर, गर्दन और दंत चिकित्सा आदि से संबंधित सर्जरी) धाराओं से संबंधित छात्रों को 58 निर्दिष्ट सर्जिकल प्रक्रियाओं को करने की अनुमति देने से जुड़ा है।
  • पक्ष में तर्क
    • आयुर्वेद में सर्जरी की दो शाखाएँ हैं- शल्य तंत्र और शालाक्य तंत्र। नियम के मुताबिक, आयुर्वेद के सभी स्नातकोत्तर छात्रों को इन शाखाओं का अध्ययन करना होता है और जो लोग इन विषयों का विशिष्ट अध्ययन करते हैं, वे आयुर्वेद सर्जन बन जाते हैं।
    • आयुर्वेद में स्नातकोत्तर शिक्षा को इंडियन मेडिसिन सेंट्रल काउंसिल (स्नातकोत्तर आयुर्वेद शिक्षा) विनियम, 2016 द्वारा विनियमित किया जाता है।
      • यह विनियम आयुर्वेद के सभी स्नातकोत्तर छात्रों को शल्य, शालाक्य, प्रसूति और स्त्री रोग जैसी शाखाओं में विशेषज्ञता हासिल करने की अनुमति देता है।
      • इन तीन शाखाओं के छात्रों को एमएस (MS) यानी ‘मास्टर इन सर्जरी इन आयुर्वेद’ की उपाधि दी जाती है।
    • आयुर्वेद के छात्रों के लिये शिक्षा, इंटर्नशिप और सीखने की प्रक्रिया मॉडर्न चिकित्सा के छात्रों के समान ही है।
      • आयुर्वेद के छात्रों को सुश्रुत के सर्जिकल सिद्धांतों और प्रथाओं को सिखाने के अलावा चिकित्सा विधिक (मेडिको लीगल) मुद्दों, सर्जिकल नैतिकता और सूचित सहमति (Informed Consent) आदि में भी प्रशिक्षित किया जाता है।
    • यद्यपि अधिकांश आयुर्वेदिक सर्जिकल प्रक्रियाएँ लगभग आधुनिक सर्जिकल प्रक्रियाओं के समान ही हैं, किंतु दोनों शाखाओं में सर्जरी के बाद होने वाली देखभाल की प्रक्रिया में काफी अंतर है।
    • जयपुर में राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान का दावा है कि अस्पताल में प्रत्येक वर्ष कम-से-कम 1,000 प्रमुख सर्जरी की जाती हैं। आयुर्वेद चिकित्सकों के मुताबिक यह हालिया अधिसूचना केवल एक स्पष्टीकरण के तौर पर है।
      • प्रायः रोगियों को यह स्पष्ट नहीं होता है आयुर्वेदिक चिकित्सक के पास किसी सर्जरी प्रक्रिया को करने की क्षमता है अथवा नहीं। इस तरह यह अधिसूचना रोगियों की दुविधा को समाप्त करेगी।
  • विरोध
    • भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) के चिकित्सकों का दावा है कि केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद (CCIM) द्वारा जारी अधिसूचना यह गलत धारणा उत्पन्न करती है कि आधुनिक सर्जरी करने में आयुर्वेद चिकित्सकों का कौशल एवं प्रशिक्षण, आधुनिक चिकित्सा पद्धति का उपयोग करने वाले चिकित्सकों के समान ही है, जो कि पूर्णतः भ्रामक है तथा आधुनिक चिकित्सा के अधिकार क्षेत्र पर एक अतिक्रमण है।
    • केवल इसलिये कि आयुर्वेद संस्थानों द्वारा आधुनिक चिकित्सा पद्धति से संबंधित पुस्तकों का प्रयोग किया जाता है अथवा वे आधुनिक चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों की मदद से सर्जरी करते हैं, उन्हें इस प्रकार का अतिक्रमण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
    • भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) के चिकित्सकों ने केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद (CCIM) से यह स्पष्ट करने को कहा है कि किस प्रकार आयुर्वेद के साहित्य में वर्णित प्रत्येक प्रक्रिया आधुनिक सर्जिकल प्रक्रियाओं के समान है।
    • सर्जरी के लिये चिकित्सकों को तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, जो कि उन्नत प्रशिक्षण और कार्यशालाओं आदि के माध्यम से प्रदान की जाती है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक चिकित्सा में प्रशिक्षण, अनुसंधान और ज्ञान के आदान-प्रदान हेतु कार्यशालाओं का बुनियादी ढाँचा आयुर्वेद के संस्थानों की तुलना में काफी बेहतर है।
      • सरकार द्वारा वित्तपोषित आयुर्वेदिक शिक्षण संस्थान गुणवत्ता प्रशिक्षण प्रदान करने के लिये आवश्यक बुनियादी ढाँचे, कुशल श्रमशक्ति और सहायक कर्मचारियों से सुसज्जित नहीं हैं।
  • स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढाँचे में अंतराल
    • अमेरिका स्थित ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट द्वारा इस वर्ष की शुरुआत में किये गए शोध के अनुसार, देश में प्रति 1,000 लोगों पर केवल 0.55 बिस्तर मौजूद हैं।
    • वर्ष 2019 में सरकार ने संसद को सूचित किया था कि प्रत्येक 1,445 भारतीयों के लिये देश में केवल एक आधुनिक चिकित्सक मौजूद है।
      • विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदंडों के अनुसार प्रति 1,000 लोगों पर एक चिकित्सक का होना अनिवार्य है।
      • सर्जन समेत एलोपैथिक डॉक्टरों की कमी है इस तथ्य के कारण भी काफी जटिल हैं क्योंकि भारत में अधिकांश मेडिकल कॉलेज दक्षिण के राज्यों में स्थित हैं। इसके अलावा कई चिकित्सक ऐसे है जो स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा प्रदान करने के इच्छुक नहीं होते हैं।

आगे की राह

  • सरकार के लिये स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिये आवश्यक कदम उठाना काफी महत्त्वपूर्ण है, हालाँकि यहाँ यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि आयुर्वेद चिकित्सकों को सर्जरी की अनुमति देते समय सुरक्षा मानकों के साथ समझौता न किया जाए।
  • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) विधेयक 2017 में सरकार ने आयुष डॉक्टरों को आधुनिक दवाओं के प्रयोग की अनुमति देने हेतु दो-वर्षीय ब्रिज कोर्स शुरू करने की बात की थी। ध्यातव्य है कि यह कोर्स स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करने के लिये महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है, अतः सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिये।
  • सरकार को साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण द्वारा स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र के बुनियादी ढाँचे में मौजूद इस अंतर को समाप्त करने के रचनात्मक तरीकों का पता लगाना चाहिये।
  • भारत को चिकित्सा बहुलवाद के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिये, जो कि पहले से ही कई देशों जैसे- चीन और जापान आदि में वास्तविक रूप प्राप्त कर चुका है।
  • देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता है ताकि एक ऐसी स्वास्थ्य विकसित की जा सके जो किसी भी प्रकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल का सामना करने, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज़ प्रदान करने और सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम हो।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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