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जीव विज्ञान और पर्यावरण

‘रिकवरी कार्यक्रम’ में शामिल चार नई प्रजातियाँ

  • 07 Jul 2018
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ(एनबीडब्ल्यूएल)की स्थायी समिति ने चार प्रजातियों को गंभीर रूप से लुप्तप्राय(Critically Endangered) प्रजातियों के रूप में केंद्र के ‘रिकवरी कार्यक्रम’(Recovery Programme)में शामिल किया है। 

प्रमुख बिंदु

  • ये चार प्रजातियाँ- नॉर्दन रिवर टेरापिन(Northern River Terrapin), क्लाउड तेंदुए (Clouded Leopard), अरब सागर हंपबैक व्हेल (Arabian Sea Humpback Whale) और रेड पांडा (Red Panda) हैं।
  • ध्यातव्य है कि इन प्रजातियों को पर्यावरण, वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वन्यजीव प्रभाग की सिफारिश के आधार पर इस कार्यक्रम में जोड़ा गया है।

‘रिकवरी कार्यक्रम’ में शामिल 17 प्रजातियाँ

हिम तेंदुए, बस्टर्ड(फ्लोरिकांस समेत, डॉल्फिन, हंगुल, नीलगिरि ताहर, समुद्री कछुए, डुगोंग, एडिबल नेस्ट स्विफ्टलेट(Edible Nest Swiftlet), एशियाई जंगली भैंस, निकोबार मेगापोड, मणिपुर ब्रो-एंटीलेड हिरण, गिद्ध, मालाबार सिवेट, इंडियन राइनोसेरोस, एशियाटिक शेर, स्वैप हिरण और जेरडन के कूरसर (Jerdon’s Courser)।

संबंधित तथ्य 

नॉर्दन रिवर टेरापिन:

  • यह पूर्वी भारत में बहने वाली नदियों में पाए जाने वाले कछुए की एक प्रजाति है।
  • यह बांग्लादेश, कंबोडिया, भारत, इंडोनेशिया और मलेशिया की एक स्थानिक प्रजाति है तथा माँस और कवच के लिये इसका शिकार किया जाता है।

क्लाउड तेंदुए:

  • यह हिमालय के तलहटी क्षेत्रों में पाया जाता है।
  • यह प्रजाति अपने आवासीय विनाश तथा चमड़े के लिये शिकार किये जाने के कारण संकट की स्थिति में है।
  • आईयूसीएन की रेड डाटा सूची में इस प्रजाति को ‘सुभेद्य’(Vulnerable) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • वर्ष 2016 की रेड डाटा सूची के मूल्यांकन के अनुसार इसकी आबादी में गिरावट की प्रवृत्ति देखी गई है।

अरब सागर हंपबैक व्हेल:

  • यह व्हेल की एक प्रमुख प्रजाति है जो सभी प्रमुख महासागरों में पाई जाती है।
  • यह प्रजाति भारतीय तटों के साथ श्रीलंकाई तट तक, अरब सागर से होकर ओमान तट की ओर प्रवास करती है।
  • नावों के अत्यधिक आवागमन तथा शिकार किये जाने के कारण इस प्रजाति पर संकट मंडरा रहा है।

लाल पांडा:

  • यह सिक्किम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश के पर्वतीय जंगलों के घने बाँस-झुंडों में पाए जाते हैं।
  • माँस और दवाइयों के लिये  इनका शिकार किया जाता है ।
  • आईयूसीएन ने रेड डाटा सूची में इसे 'लुप्तप्राय' (‘Endangered’) के रूप में वर्गीकृत किया है।
  • वर्ष 2015 की रेड डाटा सूची के मूल्यांकन के अनुसार इस प्रजाति की आबादी में गिरावट की प्रवृति दर्ज की गई है।
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