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जीव विज्ञान और पर्यावरण

भारत में चीतों की विलुप्ति का कारण

  • 16 Dec 2019
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये

प्रोजेक्ट चीता

मेन्स के लिये

भारत में चीतों की विलुप्ति का कारण तथा सरकार द्वारा उनके संरक्षण हेतु प्रयास

चर्चा में क्यों?

सितंबर 2019 में नई दिल्ली में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (United Nations Convention to Combat Desertification-UNCCD COP 14) में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य की तरफ से यह कहा गया कि चीतों की विलुप्ति का मुख्य कारण मरुस्थलीकरण है।

  • इसके बाद चीता की विलुप्ति के कारणों पर चर्चा तेज़ हो गई तथा पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा कहा गया कि चीता की विलुप्ति का मुख्य कारण उसका शिकार होना था।

मुख्य बिंदु:

  • विशेषज्ञों के अनुसार, चीता भारतीय जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ा वन्यप्राणी है। यह संभवत: एकमात्र स्तनपायी जंतु है जिसे पूरे विश्व में चीता कह कर बुलाया जाता है। चीता शब्द संस्कृत के 'चित्राकु' शब्द का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है धब्बेदार।
  • वन क्षेत्रों से जुड़े हुए चरागाहों में रहने वाला संसार का यह सबसे तेज़ गति का प्राणी मानव जाति के लालच का शिकार हुआ। अपनी खूबसूरत और आकर्षक खाल के लिए यह शुरू से ही शिकारियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है।

चीतों की विलुप्ति का कारण:

  • चीतों की विलुप्ति के दो विशेष कारण थे। पहला- जानवरों के शिकार के लिये चीता को पालतू बनाया जाना तथा दूसरा- कैद में रहने पर चीता प्रजनन नहीं करते।
  • अपनी तेज़ गति तथा बाघ व शेर की तुलना में कम हिंसक होने की वजह से इसको पालना आसान था। तत्कालीन राजाओं और ज़मीदारों द्वारा इसका प्रयोग अक्सर शिकार के लिये होता था जिसमें ये अन्य जानवरों को पकड़ने में उनकी मदद करते थे।
  • चीते को पालने का मुख्य कारण इनका सहज स्वभाव था और ये कुत्तों की भाँति आसानी से पाले जा सकते थे। बाघ, शेर तथा तेंदुए के विपरीत यह कम उग्र जानवर है।

ऐतिहासिक स्रोतों में चीते का उल्लेख :

  • इतिहास में पहली बार चीता पालने का साक्ष्य संस्कृत ग्रंथ मनसोल्लास में मिलता है।
  • मनसोल्लास 1129 ई. में रचित महत्त्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है। इसके रचयिता चालुक्यवंश के राजा सोमेश्वर तृतीय थे। इसे 'अभिलाषितार्थचिन्तामणि' भी कहते हैं।
  • ऐसा कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर ने 49 वर्षों के शासनकाल के दौरान अपने शाही चिड़ियाघर में लगभग 9000 चीते रखे थे।
  • वर्ष 1613 में मुगल सम्राट जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-जहाँगीरी में कैद में रखे गए किसी चीता द्वारा शावक को जन्म देने का दुर्लभ वर्णन किया है। यह अब तक का पहला तथा अंतिम साक्ष्य है जिसमें किसी ऐसी घटना का वर्णन किया गया है।
  • मध्यकालीन भारत में शिकार के लिये चीता का प्रयोग पूरे प्रायद्वीप में लोकप्रिय था तथा इसका प्रयोग काले हिरणों (Black Bucks) के शिकार के लिये किया जाने लगा। इसके अलावा कई साक्ष्यों से पता चलता है कि उस समय चीतों को पकड़ने तथा प्रशिक्षित करने के लिये अनेक सेवक मौजूद रहते थे।
  • किसी जंगल से पकड़ कर लाए गए चीते को छह महीने के अंदर प्रशिक्षित किया जा सकता था। इनको पिंजड़ों में रखने की बजाय ज़ंजीर से बांध कर रखा जाता था।
  • राजाओं, ज़मीदारों तथा बाद में अंग्रेज़ अफसरों के शिकार के लिये चीता तथा उनके शावक बड़ी संख्या में जंगलों से लाए जाने लगे एवं यह सिलसिला 18वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अपने चरम पर पहुँच गया।
  • औपनिवेशिक-कालीन स्रोतों की मानें तो एक प्रशिक्षित चीते की कीमत 150 रुपए से 250 रुपए के बीच थी तथा जंगल से पकड़े गए किसी चीते की कीमत 10 रुपए से ऊपर कुछ भी हो सकती थी।
  • चीता के हमले से किसी इंसान की मृत्यु का साक्ष्य वर्ष 1880 में मिलता है। जब विशाखापत्तनम के गवर्नर के एजेंट ओ. बी. इरविन की मृत्यु शिकार के दौरान एक चीते के हमले से हो गई थी जो कि विजयानगरम के राजा का पालतू चीता था।
  • इसके बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा चीते को हिंसक जानवर घोषित किया गया तथा इसको मारने वालों को पुरस्कार दिया जाने लगा।
  • आधिकारिक तौर पर माना जाता है कि वर्ष 1947 में छत्तीसगढ़ की एक छोटी रियासत कोरिया के राजा रामानुज प्रताप सिंह ने भारत के अंतिम तीन चीतों का शिकार किया था।
  • वर्ष 1951-52 में भारत सरकार द्वारा चीता को विलुप्त मान लिया गया था परंतु उसके बाद भी कोरिया तथा सरगुजा में चीतों के होने के प्रमाण मिले थे।
  • भारत के बाहर एशियाई चीते पाकिस्तान के बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान आदि क्षेत्रों में पाए गए। लेकिन वर्तमान में एशियाई चीतों की एक छोटी संख्या ईरान के ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में पाई जाती है।
  • चीतों की दूसरी प्रजाति अफ्रीका में भी पाई जाती है। भारत के चीते जहाँ झाड़ियों, जंगलों तथा अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में रहते थे, वहीं अफ्रीकी चीते विशाल मैदानी हिस्सों में रहते हैं।

चीतों के पुनर्स्थापन के लिये सरकार के प्रयास:

  • वर्ष 1970 में भारत सरकार ने ईरान से चीतों को मंगाने की पेशकश की थी और बदले में ईरान को बाघ तथा एशियाई शेर देने का वादा किया था।
  • लेकिन प्रारंभिक बातचीतों के बावजूद यह समझौता नहीं हो सका क्योंकि ईरान में चीतों की संख्या बेहद कम थी तथा ये हज़ारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए थे।
  • हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने चीतों की संख्या बढ़ाने की इच्छा प्रदर्शित की है। इसके लिये सरकार अफ्रीकी प्रजाति के चीतों को भारत लाने पर विचार कर रही है। इस परियोजना को प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah) नाम दिया गया है।
  • प्रोजेक्ट चीता के तहत मध्य प्रदेश के कूनों पालपुर वन्यजीव अभयारण्य और नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य के अलावा राजस्थान के जैसलमेर ज़िले में शाहगढ़ का चयन किया गया है। इन अभयारण्यों में अफ्रीकी प्रजाति के चीते लाए जाएंगे। इनके लिये नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से बात चल रही है।
  • भारत के संकटप्राय घास के मैदानों, सवाना तथा शुष्क क्षेत्रों में जैव-पारिस्थितिकी को पुनर्जीवित करने के लिये चीते की प्रजाति को पुनर्स्थापित करना आवश्यक है।

स्रोत: द हिंदू

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