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जैव विविधता और पर्यावरण

भारत में PBR और जैवविविधता प्रबंधन

  • 25 May 2023
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (PBR), जैवविविधता प्रबंधन समितियाँ (BMC), जैवविविधता अधिनियम 2002, पर्यावरण के लिये जीवनशैली, जैवविविधता पर अभिसमय (CBD), नागोया प्रोटोकॉल

मेन्स के लिये:

भारत में जैवविविधता प्रबंधन की स्थिति

चर्चा में क्यों? 

पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (PBR) के अद्यतन और सत्यापन हेतु राष्ट्रीय अभियान गोवा में शुरू किया गया था जो भारत की समृद्ध जैवविविधता के प्रलेखन एवं संरक्षण में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा आयोजित किया गया था।

  • अभी तक देश में 2,67,608 PBR तैयार किये जा चुके हैं।

पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर:

  • परिचय:  
    • पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर जैवविविधता के विभिन्न पहलुओं के एक व्यापक रिकॉर्ड के रूप में कार्य करता है, जिसमें आवासों का संरक्षण, भूमि संरक्षण, लोक किस्में और कृषि उपप्रजातियाँ, घरेलू पशुओं की नस्लें और सूक्ष्म जीव शामिल हैं।
    • जैवविविधता प्रबंधन समितियाँ (BMC), जैवविविधता अधिनियम, 2002 के तहत जैवविविधता के संरक्षण, टिकाऊ उपयोग और प्रलेखन को बढ़ावा देने के लिये बनाई गई हैं।
      • राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में स्थानीय निकाय BMC का गठन करते हैं, जिन्हें स्थानीय समुदायों के परामर्श से पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर तैयार करने का काम सौंपा जाता है।
  • महत्त्व:  
    • यह जैवविविधता के संरक्षण में सहायता करता है, जो प्रकृति में संतुलन बनाए रखने की महत्त्वपूर्ण कुंजी है। यह स्थानीय समुदायों को आनुवंशिक संसाधनों और संबद्ध पारंपरिक ज्ञान से प्राप्त लाभों को साझा करने में भी सक्षम बनाता है।
    • यह जैवविविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के कार्यान्वयन का समर्थन करता है, जिसका उद्देश्य जैविक संसाधनों तक पहुँच को विनियमित करना और उचित एवं समान साझा लाभ सुनिश्चित करना है।
    • ऊर्घ्वगामी अभ्यास होने के नाते यह सांस्कृतिक और प्राकृतिक जैवविविधता के बीच के अंतराल को समझने का एक साधन भी है। 
      • यह समावेशी दृष्टिकोण के माध्यम से विकेंद्रीकृत विधि की परिकल्पना करता है।
    • यह ग्लासगो में COP26 में भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा पेश की गई “पर्यावरण के लिये जीवनशैली' ([Lifestyle for the Environment- LiFE)” की अवधारणा के अनुरूप है।
      • यह अवधारणा विश्व स्तर पर व्यक्तियों और संस्थानों से पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण के लिये संसाधनों के विवेकपूर्ण और उचित उपयोग को बढ़ावा देने का आह्वान करती है।

भारत में जैवविविधता प्रबंधन की स्थिति:

  • परिचय:  
    • पृथ्वी के केवल 2.4% भूमि क्षेत्र के साथ भारत दुनिया की दर्ज प्रजातियों का 7-8% हिस्सा है।  
    • विश्व के 36 जैवविविधता हॉटस्पॉट में से चार भारत में हिमालय, पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा क्षेत्र और सुंडालैंड में स्थित हैं। 
      • इनमें से दो इंडो-बर्मा क्षेत्र और सुंदरलैंड पूरे दक्षिण एशिया में वितरित हैं तथा भारत की औपचारिक सीमाओं के भीतर उपयुक्त रूप से समाहित नहीं हैं।
  • भारत में जैवविविधता शासन:
    • भारत का जैवविविधता अधिनियम (BDA), 2002, नागोया प्रोटोकॉल के साथ घनिष्ट तालमेल को दर्शाता है और इसका उद्देश्य जैवविविधता पर सम्मेलन (CBD) के प्रावधानों को लागू करना है।
      • नागोया प्रोटोकॉल ने आनुवंशिक संसाधनों के वाणिज्यिक उपयोग और अनुसंधान को सुनिश्चित करने के लिये सरकार तथा ऐसे संसाधनों का संरक्षण करने वाले समुदायों के साथ इसके लाभों को साझा करने की मांग की।
    • BDA को भारत की विशाल जैवविविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में सराहा गया, क्योंकि इसने अपने प्राकृतिक संसाधनों पर देशों के संप्रभु अधिकार को मान्यता दी।
      • यह यथासंभव विकेंद्रीकृत तरीके से जैव-संसाधनों के प्रबंधन के मुद्दों को संबोधित करना चाहता है। 
    • इसमें तीन स्तरीय संरचनाओं की भी परिकल्पना की गई है:
      • राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैवविविधता प्राधिकरण (NBA)। 
      • राज्य स्तर पर राज्य जैवविविधता बोर्ड (SSB)।
      • स्थानीय स्तर पर जैवविविधता प्रबंधन समितियाँ(BMCs)। 
    • यह अधिनियम जैवविविधता से संबंधित ज्ञान पर बौद्धिक संपदा अधिकार का दावा करने वाले किसी भी व्यक्ति के संबंध में देश के रुख को भी मज़बूत करता है।
  • जैवविविधता संरक्षण से संबंधित चुनौतियाँ:
    • आक्रामक प्रजातियाँ: आक्रामक विदेशी प्रजातियों में पौधे, जानवर और रोगजनक शामिल हैं जो एक पारिस्थितिकी तंत्र में गैर-देशीय के रूप में होते है जो पर्यावरणीय नुकसान का कारण बनते हैं या पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
      • CBD की रिपोर्ट के अनुसार, आक्रामक विदेशी प्रजातियों ने सभी जानवरों के विलुप्त होने में लगभग 40% योगदान दिया है।
    • ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन: यह पौधों और जानवरों की प्रजातियों हेतु खतरा उत्पन्न करता है क्योंकि कई जीव वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता के प्रति संवेदनशील होते हैं जो उनके विलुप्त होने का कारण बन सकता है।
      • कीटनाशकों का उपयोग, उद्योगों से क्षोभमंडलीय ओज़ोन, सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड में वृद्धि भी प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण में योगदान देते हैं।
    • समुद्री जैवविविधता संबंधित बाधाएँ: कुशल प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन की कमी के कारण माइक्रोप्लास्टिक्स महासागरों में जमा हो रहे हैं और समुद्री जीवन को बाधित कर  रहे हैं एवं जानवरों में यकृत, प्रजनन तथा जठरांत्र संबंधी क्षति का कारण बन रहे हैं जो प्रत्यक्ष रूप से समुद्री जैवविविधता को प्रभावित कर रहे हैं।
    • आनुवंशिक परिवर्तन की चुनौतियाँ: आनुवंशिक रूप से संशोधित पौधे पारिस्थितिक तंत्र और जैवविविधता के विघटन हेतु उच्च जोखिम उत्पन्न करते हैं क्योंकि इंजीनियरिंग जीन से उत्पन्न बेहतर लक्षण किसी एक जीव के पक्ष में हो सकते हैं।
      • इसलिये यह अंततः जीन प्रवाह की प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित कर सकता है एवं स्थानीय प्रजातियों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

जैवविविधता अभिसमय (CBD):  

  • 5 जून, 1992 को ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो में पृथ्वी शिखर सम्मेलन में जैवविविधता अभिसमय (CBD) पर संवाद किया गया, साथ ही राष्ट्रों द्वारा इस पर हस्ताक्षर किये गए।
    • यह अभिसमय 29 दिसंबर, 1993 को लागू हुआ। भारत 18 फरवरी, 1994 को अभिसमय का एक पक्षकार बन गया। वर्तमान में इस अभिसमय के 196 पक्षकार हैं।
  • CBD एक कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है और इसके 3 मुख्य उद्देश्य हैं: 
    • जैवविविधता का संरक्षण।
    • जैवविविधता के घटकों का सतत् उपयोग।
    • आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और न्यायसंगत विभाजन।
  • CBD का सचिवालय मॉन्ट्रियल, कनाडा में स्थित है। 

आगे की राह 

  • समुदाय आधारित संरक्षण: संरक्षण के प्रयासों में स्थानीय लोगों सहित स्थानीय समुदायों को शामिल करने की आवश्यकता है। निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उन्हें शामिल करके समुदाय-प्रबंधित संरक्षण क्षेत्रों की स्थापना एवं जैवविविधता संरक्षण से संबंधित उनके पारंपरिक ज्ञान तथा प्रथाओं को पहचान कर उनकी सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करना चाहिये।
  • प्रौद्योगिकी और डेटा-संचालित संरक्षण: जैवविविधता परिवर्तनों की निगरानी और ट्रैक करने, उच्च प्राथमिकता वाले संरक्षण क्षेत्रों की पहचान करने तथा संरक्षण हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिये रिमोट सेंसिंग, ड्रोन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती हुई तकनीकों का उपयोग करने की आवश्यकता है।
  • संपूर्ण जीवमंडल/बायोस्फीयर की रक्षा: संरक्षण केवल प्रजातियों के स्तर तक सीमित नहीं होना चाहिये बल्कि स्थानीय समुदायों सहित पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण होना चाहिये।
    • जैवविविधता की रक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये भारत को अधिक बायोस्फीयर रिज़र्व्स की आवश्यकता है।

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, पिछले वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. दो महत्त्वपूर्ण नदियाँ- जिनमें से एक का स्रोत झारखंड में है (और जो ओडिशा में दूसरे नाम से जानी जाती है) तथा दूसरी जिसका स्रोत ओडिशा में है, समुद्र में प्रवाह से पूर्व एक ऐसे स्थान पर संगम बनती है जो बंगाल की खाड़ी से कुछ ही दूर है। यह वन्यजीवन तथा जैवविविधता का प्रमुख स्थल है और सुरक्षित क्षेत्र है। निम्नलिखित में वह स्थल कौन-सा है? (2011) 

(a) भितरकनिका
(b) चाँदीपुर-ऑन-सी
(c) गोपालपुर-ऑन-सी
(d) सिमलीपाल

उत्तर: (a) 


प्रश्न. भारत की जैवविविधता के संदर्भ में सीलोन फ्रॉगमाउथ, कॉपरस्मिथ बार्बेट, ग्रे-चिन्ड मिनिवेट और ह्वाइट-थ्रोटेड रेडस्टार्ट क्या है?

(a) पक्षी
(b) प्राइमेट
(c) सरीसृप
(d) उभयचर

उत्तर: (a) 


मेन्स

प्रश्न. भारत में जैवविविधता किस प्रकार अलग-अलग पाई जाती है? वनस्पतिजात और प्राणीजात के संरक्षण में जैवविविधता अधिनियम, 2002 किस प्रकार सहायक है? (2018) 

स्रोत: पी.आई.बी.

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