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वन हेल्थ दृष्टिकोण

  • 19 Oct 2022
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

WHO,UNEP।

मेन्स के लिये:

वन हेल्थ अवधारणा और इसका महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में खाद्य और कृषि संगठन (FAO), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), और विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) द्वारा एक नई चतुष्पक्षीय ‘वन हेल्थ संयुक्त कार्य योजना’ शुरू की गई थी।

वन हेल्थ संयुक्त कार्य योजना:

  • परिचय:
    • एक भागीदारी प्रक्रिया के माध्यम से विकसित कार्य योजना, गतिविधियों का एक सेट प्रदान करती है जिसका उद्देश्य मानव-पशु-पौधे-पर्यावरण इंटरफेस पर स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिये ज़िम्मेदार सभी क्षेत्रों में सहयोग, संचार, क्षमता निर्माण और समन्वय को समान रूप से मज़बूत करना है।
    • यह योजना वर्ष 2022-2026 तक वैध है और इसका उद्देश्य वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य चुनौतियों को कम करना है।
  • कार्य योजना के फोकस क्षेत्र:
    • स्वास्थ्य प्रणालियों के लिये स्वास्थ्य क्षमता
    • निरंतर उभरती ज़ूनोटिक महामारी
    • स्थानिक ज़ूनोटिक
    • उपेक्षित उष्णकटिबंधीय और वेक्टर जनित रोग
    • रोगाणुरोधी प्रतिरोध और पर्यावरण
    • खाद्य सुरक्षा जोखिम

One-Health

वन हेल्थ की संकल्पना:

  • परिचय:
    • वन हेल्थ एक ऐसा दृष्टिकोण है जो यह मानता है कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और हमारे चारों ओर के पर्यावरण के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है।
    • वन हेल्थ का सिद्धांत संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO), विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (OIE) के त्रिपक्षीय-प्लस गठबंधन के बीच हुए समझौते के अंतर्गत एक पहल/ब्लूप्रिंट है।
    • इसका उद्देश्य मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य, पौधों, मिट्टी, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र जैसे विभिन्न विषयों के अनुसंधान और ज्ञान को कई स्तरों पर साझा करने के लिये प्रोत्साहित करना है, जो सभी प्रजातियों के स्वास्थ्य में सुधार, उनकी रक्षा व बचाव के लिये ज़रूरी है।

बढ़ता महत्त्व:

यह हाल के वर्षों में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है क्योंकि कई कारकों ने मानव, पशु, पौधों और हमारे पर्यावरण के बीच पारस्परिक प्रभाव को बदल दिया है।

  • मानव विस्तार: मानव आबादी बढ़ रही है और नए भौगोलिक क्षेत्रों तक विस्तृत हो रही है जिसके कारण जानवरों तथा उनके वातावरण के साथ निकट संपर्क की वजह से जानवरों द्वारा मनुष्यों में बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ रहा है।
    • मनुष्यों को प्रभावित करने वाले संक्रामक रोगों में से 65% से अधिक ज़ूनोटिक रोगों की उत्पत्ति के मुख्य स्रोत जानवर हैं।
  • पर्यावरण संबंधी व्यवधान: पर्यावरणीय परिस्थितियों और आवासों में व्यवधान जानवरों में रोगों का संचार करने के नए अवसर प्रदान कर सकता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय यात्रा और व्यापार: अंतर्राष्ट्रीय यात्रा व व्यापार के कारण लोगों, जानवरों और पशु उत्पादों की आवाजाही बढ़ गई है, जिसके कारण बीमारियाँ तेज़ी से दुनिया भर में फैल सकती हैं।
  • वन्यजीवों में वायरस: वैज्ञानिकों के अनुसार, वन्यजीवों में लगभग 1.7 मिलियन से अधिक वायरस पाए जाते हैं, जिनमें से अधिकतर के ज़ूनोटिक होने की संभावना है।
  • इसका तात्पर्य है कि समय रहते अगर इन वायरस का पता नहीं चलता है तो भारत को आने वाले समय में कई महामारियों का सामना करना पड़ सकता है।

आगे की राह

  • कोविड -19 महामारी ने संक्रामक रोग शासन में 'वन हेल्थ' सिद्धांतों के महत्व को विशेष रूप से दुनिया भर में ज़ूनोटिक रोगों को रोकने और नियंत्रित करने के प्रयास में प्रदर्शित किया है।
  • भारत को पूरे देश में इस तरह के एक मॉडल को विकसित करने और दुनिया भर में सार्थक अनुसंधान सहयोग स्थापित करने की आवश्यकता है।
  • अनौपचारिक बाज़ार और बूचड़खानों के संचालन (जैसे, निरीक्षण, रोग प्रसार आकलन) के लिये सर्वोत्तम अभ्यास दिशानिर्देश विकसित करने और ग्रामीण स्तर तक हर चरण में 'वन हेल्थ' को संचालित करने हेतु तंत्र बनाने की आवश्यकता है।
  • जागरूकता पैदा करना और 'वन हेल्थ' लक्ष्यों को पूरा करने के लिये निवेश बढ़ाना समय की मांग है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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