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भारत में बढ़ता अग्नि प्रवण वनों का क्षेत्रफल

  • 03 Jan 2020
  • 5 min read

प्रीलिम्स के लिये:

भारतीय वन सर्वेक्षण

मेन्स के लिये:

वन संसाधन, प्राकृतिक आपदाएँ, भारतीय वन सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्ष

चर्चा में क्यों?

हाल ही में प्रकाशित भारतीय वन सर्वेक्षण (Forest Survey of India-FSI) के अध्ययन के अनुसार भारत के कुल वन क्षेत्र में से लगभग 21.4% में अत्यधिक अग्नि प्रवणता देखी गई है।

मुख्य बिंदु:

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  • यह जानकारी वर्ष 2004 से 2017 के बीच पूरे भारत में वनाग्नि बिंदु (Forest Fire Point-FFP)के सामानांतर भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा किये गए अध्ययन पर आधारित है, जिसे FSI द्वारा भारत वन स्थिति रिपोर्ट -2019 शीर्षक से प्रकाशित किया गया।
  • पिछले 13 वर्षों के अध्ययनों के दौरान भारत में कुल 2,77,758 वनाग्नि बिंदुओं की पहचान की गई
  • इन FFPs की पहचान मॉडरेट रेसोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोराडियोमीटर (Moderate Resolution Imaging Spectroradiometer-MODIS) के द्वारा सम्पूर्ण वन क्षेत्र को 5 किमी. X 5 किमी. के वर्ग विभक्त करके की गयी।
  • अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार संपूर्ण वनावरण के क्षेत्रफल का 3.89% हिस्सा उच्च अग्नि प्रवण (Extremely Fire Prone) क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया।
  • साथ ही लगभग 6.01% क्षेत्रफल को अत्यधिक अग्नि प्रवण (Very Highly Fire Prone) क्षेत्र, तथा 11.50% क्षेत्रफल को अधिक अग्नि प्रवण (Highly Fire Prone) क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है।
  • MODIS द्वारा इकट्ठा की गयी सूचना के आधार पर नवंबर 2018 से जून 2019 के बीच विभिन्न राज्यों में 29,547 बार वनाग्नि की चेतावनियाँ जारी की गई।
  • इसी दौरान मिज़ोरम जैसे छोटे राज्य में वनाग्नि की 2,795 चेतावनिया जारी की गई।
  • भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के सात राज्यों में वनाग्नि के सबसे अधिक मामले देखे गए, इस राज्यों में नवंबर 2018 से जून 2019 के बीच वनाग्नि की 10,210 चेतावनियाँ जारी की गई, जो पूरे देश में जारी चेतावनियों का एक-तिहाई हिस्सा था।
  • भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (Zoological Survey of India) के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वनाग्नि के बढ़ाते मामलों का सबसे बड़ा कारण स्थानांतरण कृषि या झूम कृषि (Lash-and-Burn) है।
  • इस क्षेत्र में ज़्यादातर वनाग्नि के मामले जनवरी से मार्च के बीच में देखे जाते हैं। उत्तर-पूर्व के वन मध्य भारत के शुष्क पर्णपाती वनों से विपरीत उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन की श्रेणी में आते हैं जिनमें आसानी से आग लगना संभव नहीं है।

अध्ययन के अन्य तथ्य:

  • अध्ययन में पाया गया कि एक तरफ जहाँ पूरे देश में वनावरण के क्षेत्र में वृद्धि हुई है वहीं उत्तर-पूर्व विशेषकर मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड के वनावरण क्षेत्रफल में कमी आई है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, वनावरण क्षेत्रफल में आई इस कमी का कुछ हद तक संबंध इस क्षेत्र में बढ़ रहे वनाग्नि के मामलों से भी है।
  • इस अध्ययन में मध्य भारत के राज्यों में भी वनाग्नि की चेतावनियों में वृद्धि देखी गई, मध्य प्रदेश (2,723), महाराष्ट्र (2,516), ओडिशा (2,213) और छत्तीसगढ़ में 1,008 वनाग्नि के मामले।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य भारत में अधिकतर वनाग्नि के मामलों कारण मानवीय हैं, जिसमें लोगों द्वारा बीड़ी, सिगरेट अथवा अन्य ज्वालशील पदार्थों को वन क्षेत्रों के नज़दीक लापरवाही से छोड़ देना है।
  • इसके अतिरिक्त वनाग्नि के प्राकृतिक कारकों में आकाशीय बिजली प्रमुख है।

निष्कर्ष :

विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन वनाग्नि के मामलों की आवृत्ति एवं तीव्रता को बढ़ाता है। अनियंत्रित वनाग्नि की आवृति बढ़ने से वनावरण के रूप में प्रकृति को अपूर्णीय क्षति होती है, जिससे वनों पर निर्भर पर्यावरणीय एवं सामाजिक तंत्र को भी नुकसान पहुँचता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के साथ-साथ प्रकृति के ह्रास के मानवीय कारणों को नियंत्रित किया जाए, जिससे मानव और प्रकृति के बीच का संतुलन बना रहे।

स्रोत: द हिंदू

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