मुख्य परीक्षा
आपदा पीड़ित पहचान (DVI) हेतु NDMA दिशा-निर्देश
- 05 Feb 2026
- 77 min read
चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने सामूहिक मृत्यु घटनाओं के दौरान मानव अवशेषों की वैज्ञानिक पहचान तथा सम्मानजनक सुपुर्दगी सुनिश्चित करने हेतु आपदा पीड़ित पहचान (DVI) हेतु भारत के प्रथम राष्ट्रीय दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOP) जारी की हैं।
- ‘समग्र आपदा पीड़ित पहचान एवं प्रबंधन पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन दिशा-निर्देश’ शीर्षक से जारी यह दस्तावेज़ 2001 के गुजरात भूकंप के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर प्रकाशित किया गया।
आपदा पीड़ित पहचान (DVI) पर NDMA दिशा-निर्देशों के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
- DVI दिशा-निर्देशों की आवश्यकता: एयर इंडिया दुर्घटना (अहमदाबाद), संगारेड्डी रासायनिक कारखाना विस्फोट (तेलंगाना), आकस्मिक बाढ़ (उत्तराखंड) तथा दिल्ली में लाल किले के निकट कार बम विस्फोट जैसी कई प्रमुख आपदाओं के बाद ये दिशा-निर्देश अत्यंत आवश्यक हो गए, जहाँ पीड़ितों की पहचान करना कठिन सिद्ध हुआ।
- मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) का अभाव, प्रशिक्षित मानव संसाधन एवं अवसंरचना की कमी तथा पारंपरिक पहचान विधियों की सीमाओं ने उन्नत फॉरेंसिक तकनीकों की आवश्यकता को रेखांकित किया।
- सबसे महत्त्वपूर्ण रूप से, ये दिशा-निर्देश मृतकों की गरिमा सुनिश्चित करने, समय पर विधिक निष्कर्ष प्रदान करने तथा प्रभावित परिवारों को भावनात्मक संवरण दिलाने जैसी मानवीय और विधिक अनिवार्यताओं को संबोधित करते हैं।
NDMA के DVI दिशा-निर्देशों के प्रमुख प्रावधान
- ‘चार-चरणीय’ पहचान प्रक्रिया: दिशा-निर्देशों में पहचान की सटीकता सुनिश्चित करने तथा किसी प्रकार की अव्यवस्था को रोकने के लिये एक व्यवस्थित चार-चरणीय प्रोटोकॉल अनिवार्य किया गया है:
- व्यवस्थित पुनर्प्राप्ति: आपदा स्थल से मानव अवशेषों को सावधानीपूर्वक निकालना।
- पोस्ट-मार्टम आँकड़ों का संकलन: प्राप्त अवशेषों से उँगलियों के निशान, DNA, दंत विवरण तथा शारीरिक चिह्नों जैसे आँकड़े एकत्र करना।
- एंटी-मार्टम आँकड़ों का संकलन: पीड़ितों के परिजनों से चिकित्सा अभिलेख, दंत इतिहास और शारीरिक विवरण प्राप्त करना।
- समंजन (Reconciliation): शव सौंपने से पूर्व पोस्ट-मार्टम आँकड़ों का एंटी-मार्टम अभिलेखों से वैज्ञानिक रूप से मिलान कर पहचान की पुष्टि करना।
- राष्ट्रीय दंत डेटा रजिस्ट्री: एक प्रमुख अनुशंसा दंत रजिस्ट्री की स्थापना है, जिससे अन्य विधियाँ असफल होने की स्थिति में दाँतों और जबड़ों (जो अत्यधिक स्थायी/सतत होते हैं) के माध्यम से पीड़ितों की पहचान की जा सके।
- फॉरेंसिक पुरातत्व और ओडॉन्टोलॉजी: दिशा-निर्देशों में फॉरेंसिक पुरातत्व को शामिल किया गया है, ताकि आपदा के महीनों या वर्षों बाद भी मानव अवशेषों की पहचान की जा सके तथा दंत अभिलेखों को सटीक पहचान का प्रमुख साधन बनाकर फॉरेंसिक ओडॉन्टोलॉजी को सुदृढ़ किया गया है।
- सामूहिक शव-परीक्षा नहीं: सामूहिक मृत्यु घटनाओं में दिशा-निर्देश सभी पीड़ितों पर भौतिक शव-परीक्षा (ऑटोप्सी) करने के विरुद्ध सलाह देते हैं।
- सांस्कृतिक संवेदनशीलता: पहचान की प्रक्रिया में पीड़ितों की सामुदायिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिये तथा परिवारों के लिये भावनात्मक सहयोग और परामर्श को भी सम्मिलित किया जाना चाहिये।
- कार्यान्वयन: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने दिशानिर्देशों के राष्ट्रव्यापी क्रियान्वयन हेतु एक सुदृढ़ योजना तैयार की है, जिसके अंतर्गत आपदा पीड़ितों की पहचान हेतु विशिष्ट राज्य-स्तरीय फोरेंसिक दलों की स्थापना की जायेगी।
- इसमें संबंधित फोरेंसिक क्षेत्रों के विशेषज्ञों के लक्षित प्रशिक्षण पर भी बल दिया गया है, ताकि वे भूस्खलन जैसी जटिल परिस्थितियों का प्रबंधन कर सकें, जहाँ यात्री सूचियाँ या अभिलेख उपलब्ध नहीं होते।
महत्त्व
- दिशानिर्देश इंटरपोल के आपदा पीड़ित पहचान मानकों से प्रेरित हैं, जिनकी संरचना भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप की गई है।
- ये दिशानिर्देश आपदा शासन एवं संस्थागत तैयारी को सुदृढ़ करते हैं, पीड़ित परिवारों की गरिमा और अधिकारों का संरक्षण करते हैं तथा आपदा प्रतिक्रिया तंत्र में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आचारनीति का समावेश करते हैं।
- इसके अतिरिक्त, ये दिशानिर्देश जलवायु-प्रेरित आपदाओं, नगरीय दुर्घटनाओं तथा औद्योगिक जोखिमों से उत्पन्न भारत-विशिष्ट चुनौतियों का समाधान करने हेतु रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं।
आपदा पीड़ितों की पहचान में क्या चुनौतियाँ हैं?
- अपघटन: भारत की उच्च आर्द्रता तथा उष्ण जलवायु में शव अत्यंत तीव्र गति से विघटित हो जाते हैं, जिससे कुछ ही घंटों में दृश्य पहचान असंभव हो जाती है।
- अवशेषों की स्थिति: प्रायः आपदा के दौरान शव आग लगने से झुलस जाते हैं, प्रस्फुटन से खंडित हो जाते हैं या सामूहिक मृत्यु की घटनाओं में एक-दूसरे के साथ मिश्रित हो जाते हैं, जिससे उन्हें पृथक करना और पहचानना अत्यंत कठिन हो जाता है।
- विस्थापन: बाढ़ या भूस्खलन जैसी घटनाओं में शव घटना-स्थल से कई किलोमीटर दूर बहकर चले जाते हैं अथवा मलबे के नीचे गहराई में दब जाते हैं, जिससे उनका पुनर्प्राप्ति कार्य अत्यधिक जटिल हो जाता है।
- अवसंरचनात्मक कमी: शवों को पहचान हेतु संरक्षित रखने के लिये शवगृहों, शीत परिवहन व्यवस्था एवं भंडारण सुविधाओं का अभाव है।
- समन्वय संबंधी समस्याएँ: आपदा-स्थल पर प्रायः अनेक एजेंसियों (स्थानीय, राज्य, केंद्र) के सैकड़ों कर्मी बिना एकीकृत नियंत्रण प्रणाली के कार्यरत रहते हैं, जिसके कारण अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
- डेटा की कमी: डेंटल रिकॉर्ड जैसे केंद्रीयकृत डेटा-स्रोतों की अनुपस्थिति में अज्ञात शवों को लापता व्यक्तियों से मिलान कर पाना अत्यंत कठिन हो जाता है।
आपदा पीड़ित पहचान को सुदृढ़ करने के उपाय क्या हैं?
- “पूर्व-आपदा” सार्वजनिक डेटा भंडार: आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता (ABHA) को ऑप्शनल बायोमेट्रिक मार्कर (जैसे हाई-रिज़ोल्यूशन डेंटल स्कैन अथवा शल्य प्रत्यारोपण सीरियल नंबर) से जोड़ना प्रस्तावित डेंटल रजिस्ट्री को वास्तविक समय में प्रभावी बना सकता है।
- “डिजिटल फोरेंसिक” का एकीकरण: दिशानिर्देशों को और सुदृढ़ बनाया जा सकता है यदि स्मार्टवॉच, मोबाइल फोन तथा क्लाउड-बेस्ड हेल्थ डाटा (जैसे हार्ट रेट पैटर्न, स्टेप काउंट, बायोमेट्रिक लॉक) जैसे डिजिटल संकेतों का उपयोग त्वरित प्रारंभिक पहचान के लिये किया जाये।
- इन उपकरणों में प्रयुक्त बायोमेट्रिक लॉक, फोरेंसिक दल के आगमन से पूर्व त्वरित प्राथमिक पहचानकर्त्ता के रूप में कार्य कर सकते हैं।
- इसके अतिरिक्त, क्षतिग्रस्त खोपड़ियों अथवा आंशिक अवशेषों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित चेहरे की पुनर्निर्माण तकनीक पारंपरिक फोरेंसिक सॉइल मॉडलिंग की तुलना में अधिक त्वरित एवं वस्तुनिष्ठ विकल्प प्रदान करती है।
- पोर्टेबल DNA लैब: वर्तमान में सैंपल को सेंट्रल लैब में भेजा जाता है, जिसके कारण विलंब होता है। यदि सेना अथवा पुलिस द्वारा वैश्विक स्तर पर प्रयुक्त रैपिड DNA मशीनें (मजबूत, पोर्टेबल यूनिट) आपदा-स्थलों पर तैनात की जाएँ, जो केवल 90 मिनट में DNA प्रोफाइल तैयार कर सकती हैं, तो पीड़ित परिवारों के प्रतीक्षा समय में व्यापक कमी आयेगी।
- टेंपर-प्रूफ रिकॉर्ड: सामूहिक मृत्यु की घटनाओं में सैंपल अनेक चरणों (पुलिस, परिवहन, प्रयोगशाला, भंडारण) से होकर गुजरते हैं।
- ब्लॉकचेन आधारित चेन ऑफ कस्टडी लेजर लागू करने से मानव अवशेषों से संबंधित डेटा अपरिवर्तनीय, पारदर्शी तथा विधिक रूप से ग्राह्य बन जायेगा, जिससे किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ अथवा लापरवाही के आरोपों की संभावना समाप्त होगी।
- अंतर्राष्ट्रीय DVI कूटनीति: पड़ोसी देशों तथा प्रमुख पर्यटन साझेदारों के साथ पूर्व स्वीकृत आपदा पीड़ित पहचान (DVI) संबंधी ट्रीटी स्थापित करने से बायोमेट्रिक डेटा तथा DNA प्रोफाइल का त्वरित आदान-प्रदान संभव होगा, जिससे नौकरशाही विलंब से बचा जा सकेगा।
निष्कर्ष
NDMA के आपदा पीड़ित पहचान (DVI) दिशा-निर्देश एक ऐतिहासिक 'पैराडाइम शिफ्ट' (दृष्टिकोण में बदलाव) को चिह्नित करते हैं, जो एक वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ और मानवीय ढाँचे की ओर ले जाते हैं। ये दिशा-निर्देश 'नेशनल डेंटल डेटा रजिस्ट्री' जैसे मानकीकृत प्रोटोकॉल के माध्यम से 'मृतकों की गरिमा' सुनिश्चित करते हैं। उन्नत फॉरेंसिक को अधिकार-आधारित दृष्टिकोण के साथ जोड़कर, भारत न केवल अपनी संस्थागत तैयारी को सुरक्षित करता है, बल्कि प्रभावित परिवारों के लिये आवश्यक कानूनी और भावनात्मक समाधान भी सुनिश्चित करता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत के आपदा शासन ढाँचे को सुदृढ़ बनाने में NDMA के आपदा पीड़ित पहचान (DVI) दिशा-निर्देशों के महत्त्व की समीक्षा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. आपदा पीड़ित पहचान (DVI) क्या है?
DVI एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो बड़े पैमाने पर मृत्यु घटनाओं में मृतकों की पहचान स्थापित करने के लिये फोरेंसिक विधियों जैसे DNA, दंत अभिलेख और फिंगरप्रिंट्स का उपयोग करती है।
2. NDMA के DVI दिशानिर्देश क्यों आवश्यक थे?
हाल की आपदाओं ने SOPs की कमी, कमज़ोर अवसंरचना और केवल दृश्य पहचान की सीमाओं को रेखांकित किया, जिससे वैज्ञानिक और मानकीकृत प्रोटोकॉल आवश्यक हो गए।
3. NDMA द्वारा निर्धारित चार-चरणीय पहचान प्रक्रिया क्या है?
इसमें शामिल हैं: व्यवस्थित रिकवरी, पोस्ट-मॉर्टम डेटा संग्रह, पूर्व-मृत्यु डेटा संग्रह और पुष्ट पहचान के लिए समन्वय।
4. नेशनल डेंटल डेटा रजिस्ट्री क्यों महत्त्वपूर्ण है?
दांत और जबड़े बहुत टिकाऊ होते हैं, इसलिये जब शव सड़े, जल गए या टुकड़े-टुकड़े गए हों, तब दंत अभिलेख पहचान के लिये निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
5. NDMA दिशा-निर्देश वैश्विक मानकों के साथ किस प्रकार सुमेलित हैं?
ये दिशा-निर्देश इंटरपोल के DVI मानकों से प्रेरित हैं और 'सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन' के अनुरूप हैं, जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को सुनिश्चित करते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स:
प्रश्न. आपदा प्रबंधन में पूर्ववर्ती प्रतिक्रियात्मक उपागम से हटते हुए भारत सरकार द्वारा आरंभ किये गए अभिनूतन उपायों की विवेचना कीजिये। (2020)
प्रश्न. आपदा प्रभावों और लोगों के लिये उसके खतरे को परिभाषित करने हेतु भेद्यता एक अत्यावश्यक तत्त्व है। आपदाओं के प्रति भेद्यता का किस प्रकार और किन-किन तरीकों के साथ चरित्र-चित्रण किया जा सकता है? आपदाओं के संदर्भ में भेद्यता के विभिन्न प्रकारों पर चर्चा कीजिये। (2019)
प्रश्न. भारत में आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डी० आर० आर०) के लिये 'सेंडाई आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्रारूप (2015-2030)' हस्ताक्षरित करने से पूर्व एवं उसके पश्चात् किये गए विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिये। यह प्रारूप 'ह्योगो कार्रवाई प्रारूप, 2005' से किस प्रकार भिन्न है? (2018)