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भारतीय अर्थव्यवस्था

चक्रीय अर्थव्यवस्था में हो रहे परिवर्तन

  • 05 Feb 2026
  • 104 min read

प्रिलिम्स के लिये: चक्रीय अर्थव्यवस्था, नीति आयोग, एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्स, ई-अपशिष्ट, विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व

मेन्स के लिये: सतत विकास के लिये उपकरण के रूप में चक्रीय अर्थव्यवस्था, शहरीकरण के दौर में भारत में अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियाँ, महत्त्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा संक्रमण, संसाधन सुरक्षा

स्रोत: पीआईबी

नीति आयोग ने इंटरनेशनल मैटेरियल रिसाइक्लिंग कॉन्फ्रेंस (IMRC) में तीन थीमेटिक रिपोर्टें जारी कीं, जिनका उद्देश्य एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्स (ELVs), अपशिष्ट टायर, ई-अपशिष्ट और लिथियम-आयन बैटरियों में चक्रीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना है। यह सम्मेलन मैटेरियल रिसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MRAI) द्वारा जयपुर में आयोजित किया गया था।

  • ये रिपोर्टें भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिये मौजूद चुनौतियों और नीतिगत समाधान मार्गदर्शिकाएँ प्रस्तुत करती हैं। 

सारांश

  • नीति आयोग की रिपोर्टों में यह सामने आया है कि तेज़ शहरीकरण, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) का विकास और डिजिटलीकरण के कारण एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्स (ELVs), अपशिष्ट टायर, अपशिष्ट तथा लिथियम-आयन बैटरियों का अपशिष्ट तेज़ी से बढ़ रहा है, जिससे औपचारिक रिसाइक्लिंग, मानक निर्माण और विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) के लागू करने में कमी सामने आ रही है।
  • बुनियादी ढाँचे के विस्तार, अनौपचारिक रिसाइकलरों के औपचारिकीकरण, मज़बूत EPR (विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व) और उच्च-मूल्य वाले पुनर्चक्रण के माध्यम से एक सशक्त 'चक्रीय अर्थव्यवस्था' ढाँचे को अपनाकर भारत के अपशिष्ट संकट को संसाधन सुरक्षा, हरित नौकरियों तथा जलवायु लचीलेपन के स्रोत में बदला जा सकता है।

चक्रीय अर्थव्यवस्था में हो रहे परिवर्तन पर नीति आयोग की रिपोर्ट के  मुख्य बिंदु क्या हैं?

एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्स (ELVs)

  • तेज़ शहरीकरण और बढ़ती वाहन संख्या, जिसमें इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की तेज़ी से बढ़ती संख्या भी शामिल है, भारत में एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्स (ELVs) के निर्माण की गति को बढ़ा रही है।
    • इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की बिक्री वर्ष 2016 में 50,000 से बढ़कर 2024 में 2.08 मिलियन हो गई है और सरकार का लक्ष्य 2030 तक कुल वाहन बिक्री में 30% EV हिस्सेदारी प्राप्त करना है, जिससे भविष्य में एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्स (ELVs) की मात्रा बढ़ेगी।
    • एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्सों (ELVs) की संख्या वर्ष 2025 में 2.3 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2030 तक 5 करोड़ होने का अनुमान है, जिससे पर्यावरणीय दबाव और सामग्री पुनर्प्राप्ति की चुनौतियाँ और बढ़ जाएँगी।
  • स्वचालित परीक्षण केंद्र (ATS) और पंजीकृत वाहन स्क्रैपिंग सुविधाओं (RVSFs) की सीमित उपलब्धता औपचारिक स्क्रैपिंग और चक्रीय अर्थव्यवस्था के परिणामों को प्रभावित कर रही है।
    • औपचारिक स्क्रैपिंग इकाइयों की कम आर्थिक क्षमता, प्रक्रियाओं में देरी और उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी के कारण अनौपचारिक विघटन (डिसमेंटलिंग) प्रथाएँ बनी हुई हैं।

भारत में अपशिष्ट टायर की चक्रीय अर्थव्यवस्था

  • वाहन स्वामित्व और EV अपनाने में वृद्धि से टायर की खपत बढ़ रही है, जिसके परिणामस्वरूप एंड-ऑफ-लाइफ टायर (ELTs) में तेज़ी से वृद्धि हो रही है।
  • टायर पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र वर्तमान में असंगठित है, जहाँ अनुगामी क्षमता का अभाव, मानकों की अनिश्चितता और अनौपचारिक क्षेत्र का वर्चस्व एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
  • मानकों में अस्पष्टता और बाज़ार नियामक बाधाओं के कारण रिकवर किया हुआ कार्बन ब्लैक (rCB) तथा टायर रिट्रेडिंग जैसी उच्च-मूल्य वाली पुनर्चक्रण तकनीकों का व्यापक अंगीकरण बाधित हो रहा है।
    • टायर अपशिष्ट का डाउनसाइक्लिंग आयात प्रतिस्थापन और हरित रोज़गार सृजन के अवसरों को खोने का कारण बनता है।

भारत में ई-अपशिष्ट और लिथियम-आयन बैटरी

  • डिजिटलीकरण और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के कारण भारत में ई‑अपशिष्ट और लिथियम-आयन बैटरी अपशिष्ट तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
    • ई‑अपशिष्ट का निर्माण वर्ष 2024 में 6.19 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) से बढ़कर वर्ष 2030 तक 14 MMT होने का अनुमान है, जिससे रिसाइक्लिंग और पर्यावरण प्रबंधन पर दबाव काफी बढ़ जाएगा।
    • लिथियम-आयन बैटरियों की मांग वर्ष 2025 में 29 GWh से बढ़कर वर्ष 2035 तक 248 GWh होने का अनुमान है, जो EV अपनाने और ऊर्जा भंडारण की आवश्यकताओं द्वारा प्रेरित है।
  • अनौपचारिक रिसाइक्लिंग, जिसमें असुरक्षित तरीकों का उपयोग किया जाता है, इस क्षेत्र पर हावी है, जिससे प्रदूषण, स्वास्थ्य जोखिम और आर्थिक नुकसान उत्पन्न होते हैं।
  • ई‑अपशिष्ट हेतु विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) का दायरा केवल सीमित धातुओं तक ही केंद्रित है। साथ ही शिथिल निगरानी के कारण अवैध रिसाइकलरों की सक्रियता और फर्जी प्रमाणपत्रों का प्रचलन एक गंभीर चुनौती बना हुआ है।
    • अप्रभावी रिसाइक्लिंग भारत की महत्त्वपूर्ण खनिजों के आयात पर निर्भरता को बढ़ा देती है, जिससे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है।

चक्रीय अर्थव्यवस्था क्या है?

  • परिचय: चक्रीय अर्थव्यवस्था एक ऐसा आर्थिक ढाँचा है जिसका मुख्य लक्ष्य संसाधन-दक्षता तथा स्थिरता पर आधारित उत्पादन प्रक्रियाओं के माध्यम से वस्तुओं एवं सेवाओं का सृजन करना है। इसमें कच्चे माल, जल और ऊर्जा जैसे संसाधनों की खपत एवं क्षय को न्यूनतम करना तथा अपशिष्ट उत्पादन को सीमित करना अंतर्निहित है।
    • रेखीय अर्थव्यवस्था (लेना–बनाना–निपटाना) के विपरीत, चक्रीय अर्थव्यवस्था में सामग्रियों के संदर्भ में छह 'R' शामिल हैं: कम उपयोग (Reduce), पुनः उपयोग (Reuse), पुनर्चक्रण (Recycle), नवीनीकरण (Refurbishment), पुनःप्राप्ति (Recover) और मरम्मत (Repair)।

भारत के लिये चक्रीय अर्थव्यवस्था का महत्त्व 

  • संसाधन संकट: भारत में विश्व की 18% जनसंख्या निवास करती है, लेकिन केवल ~7% खनिज संसाधन और ~4% स्वच्छ जल का भंडार है, जिसके चलते निष्कर्षण-केंद्रित रैखिक विकास मॉडल आर्थिक रूप से अस्थिर है।
    • रैखिक खपत से आयातित धातुओं, जीवाश्म ईंधन और निर्माण सामग्री पर निर्भरता बढ़ती है, जबकि चक्रीय अर्थव्यवस्था प्राथमिक आयातों के स्थान पर घरेलू द्वितीयक सामग्रियों के उपयोग को प्रोत्साहित करती है।
  • अपशिष्ट उत्पादन में विस्फोट: भारत प्रतिदिन ~1.68 लाख टन नगरीय ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है, जिसके 2050 तक वार्षिक 436 मिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान है। यह संकेत देता है कि चक्रीय हस्तक्षेप के अभाव में विकास सीधे अपशिष्ट में परिणत हो रहा है।
  • अवशेष अपशिष्ट का प्रभुत्व: केवल लगभग 55-60% अपशिष्ट का ही प्रसंस्करण होता है, जबकि शेष अवशेष अपशिष्ट बन जाता है जिसे लैंडफिल में डाला या फेंका जाता है, जिससे पुनर्प्राप्त करने योग्य सामग्री मूल्य स्थायी रूप से नष्ट हो जाता है।
    • भारत में 2,100 से अधिक डंपसाइट्स हैं, जो 10,000 हेक्टेयर से अधिक शहरी भूमि को अवरुद्ध किये हुए हैं; चक्रीय प्रसंस्करण के माध्यम से इस भूमि को आवास और अवसंरचना के लिये पुनः उपयोग योग्य बनाया जा सकता है।
  • जलवायु प्रभाव: नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट से ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन के 2030 तक लगभग 41 मिलियन टन CO₂-समतुल्य तक पहुँचने का अनुमान है, मुख्यतः लैंडफिल मीथेन के कारण। 
    • चक्रीय अर्थव्यवस्थाएँ स्रोत और निपटान दोनों चरणों में उत्सर्जन कम करके इसके प्रभाव को कम कर सकती हैं।
  • निर्माण क्षेत्र का दबाव: भारत के बुनियादी ढाँचे के तेज़ विस्तार से भारी मात्रा में निर्माण और विध्वंस (C&D) अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जिसमें से लगभग 95% पुनर्चक्रण योग्य है, फिर भी चक्रीयता की कमी से रेत खनन, सीमेंट उत्सर्जन और पारिस्थितिक क्षति बढ़ जाती है।
  • जल संकट: शहरी भारत में मलजल उत्पादन के 2050 तक प्रतिदिन 1.2 लाख मिलियन लीटर (MLD) तक बढ़ने का अनुमान है। उपचारित अपशिष्ट जल के चक्रीय पुनः उपयोग से स्वच्छ जल की निकासी कम होती है।
  • रोज़गार क्षमता: पूंजी-गहन निष्कर्षण उद्योगों के विपरीत, पुनर्चक्रण और बायो-मीथेनाइज़ेशन जैसी चक्रीय गतिविधियाँ 1 करोड़ से अधिक मानव-दिवस रोज़गार उत्पन्न कर सकती हैं।

भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था को समर्थन प्रदान करने वाली पहलें

गतिशीलता में चक्रीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्स (ELV)

  • समयबद्ध आधार पर अधिकृत उपचार सुविधाओं (ATS) और पंजीकृत वाहन स्क्रैपिंग सुविधाओं (RVSF) का विस्तार करना, जिसमें राष्ट्रव्यापी कवरेज सुनिश्चित करने के लिये निजी संचालन वाले सार्वजनिक उपक्रम-नेतृत्व वाले मॉडल शामिल हों।
  • वाहन का पंजीकरण रद्द करना सख्ती से जमा प्रमाण-पत्र (CoD) से संबंधित है, जिसे आधार-आधारित स्वामित्व हस्तांतरण और लीकेज रोकने के लिये स्वचालित जुर्माने द्वारा समर्थित किया जाए।
  • अनौपचारिक विखंडनकर्त्ताओं को पुराने पर्यावरणीय दायित्वों की एकमुश्त माफी के माध्यम से औपचारिक स्वरूप देना, ताकि चरणबद्ध एकीकरण, तकनीकी सहायता और अनुपालन को प्रोत्साहित किया जा सके।

अपशिष्ट टायरों की चक्रीय अर्थव्यवस्था

  • टायर पायरोलिसिस ऑयल (TPO) के उपयोग को केवल रिफाइनरियों या स्वीकृत औद्योगिक अनुप्रयोगों तक सीमित करना और कार्बन अवशेष का केवल पुनर्प्राप्त कार्बन ब्लैक (rCB) में रूपांतरण अनिवार्य करना।
    • TPO और rCB के लिये राष्ट्रीय मानकों को अधिसूचित करना और डाउनसाइक्लिंग रोकने के लिये मूल्य-वर्द्धित अनुप्रयोगों में उनके उपयोग हेतु दिशा-निर्देश जारी करना।
  • उदयम असिस्ट के माध्यम से अनौपचारिक पुनर्चक्रणकर्त्ताओं को औपचारिक बनाना, लक्षित वित्तीय सहायता प्रदान करना, एकमुश्त दायित्व माफी देना और पुनर्नवीनीकृत/रिसाइकल्ड टायर उत्पादों के लिये GST और हार्मोनाइज़्ड  सिस्टम ऑफ नोमेनक्लेचर (HSN) कोड को युक्तिसंगत बनाना।

ई-अपशिष्ट एवं लिथियम-आयन बैटरियाँ

  • उन्नत पुनर्चक्रण में निवेश को प्रोत्साहित करने हेतु वर्तमान धातुओं से परे अतिरिक्त उच्च-मूल्य तथा महत्त्वपूर्ण खनिजों को शामिल करते हुए विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के दायरे का विस्तार किया जाए।
    • लिथियम-आयन बैटरियों के लिये रसायन-आधारित धातु संरचना को अधिसूचित किया जाए तथा BIS मानकों (IS 16046) को अद्यतन कर संरचना परीक्षण एवं शुद्धता मानकों को अनिवार्य बनाया जाए।
    • अपशिष्ट बैटरियों तथा ई-अपशिष्ट के संग्रहण, भंडारण, परिवहन, नवीनीकरण एवं पुनर्चक्रण हेतु विस्तृत दिशानिर्देश जारी किये जाएँ।
  • आधुनिक प्रौद्योगिकी से युक्त साझा पुनर्चक्रण सुविधाओं का सृजन किया जाए, अनौपचारिक पुनर्चक्रणकर्त्ताओं को औपचारिक प्रशिक्षण एवं मान्यता प्रदान की जाए तथा नगर-आधारित PPP प्रणालियों (ULB-आधारित PPPs) के माध्यम से अपशिष्ट संग्रहण में वृद्धि की जाए।

निष्कर्ष

नीति आयोग की रिपोर्ट सामूहिक रूप से इस बात पर बल देती हैं कि भारत का अपशिष्ट संकट अब केवल स्वच्छता से संबंधित विषय नहीं रह गया है; यह संसाधन प्रबंधन, जलवायु, शहरी शासन तथा आर्थिक चुनौती का भी रूप ले चुका है। चक्रीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण को अपनाकर शेष अपशिष्ट को पर्यावरणीय दायित्व से रूपांतरित कर सतत विकास, हरित रोज़गार तथा जलवायु सहनशीलता का प्रेरक तत्त्व बनाया जा सकता है, जिससे भारत का विकास-पथ उसके सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के प्रति प्रतिबद्धताओं के अनुरूप संरेखित होता है।

दृष्टि मेन्स  प्रश्न:

प्रश्न.  भारत की अपशिष्ट समस्या केवल स्वच्छता से संबंधित विषय नहीं है, बल्कि यह एक आर्थिक एवं शासनगत चुनौती भी है। चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. चक्रीय अर्थव्यवस्था से क्या तात्पर्य है?
चक्रीय अर्थव्यवस्था लीनियर टेक-मेक-डिस्पोज़ मॉडल के विपरीत, 6R अर्थात् रिड्यूस, रीयूज़, रीसायकल, रिफर्बिश, रिकवर और रिपेयर को फॉलो करके वेस्ट और रिसोर्स के इस्तेमाल को कम करती है।

2. भारत में एंड-ऑफ-लाइफ वेहिकल्स (ELV) को लेकर चिंता क्यों बढ़ती जा रही है?
तीव्र शहरीकरण और इलेक्ट्रिक वाहनों सहित वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण ELV की संख्या वर्ष 2025 में 23 मिलियन से बढ़कर वर्ष 2030 तक 50 मिलियन होने का अनुमान है, जिससे पुनर्चक्रण प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है।

3. भारत के अपशिष्ट टायर रिसाइक्लिंग सिस्टम में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
यह क्षेत्र अनौपचारिकता, खराब ट्रेसबिलिटी, मानकों की कमी और रिकवर्ड कार्बन ब्लैक (rCB) जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों के कम उपयोग से ग्रस्त है।

4. भारत के लिये ई-अपशिष्ट और लिथियम-आयन बैटरी की रिसाइक्लिंग इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है?
अकुशल रिसाइक्लिंग से प्रदूषण, स्वास्थ्य जोखिम और आयातित महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता बढ़ती है, जिससे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है।

5. चक्रीय अर्थव्यवस्था में होने वाले बदलाव को सुदृढ़ करने के लिये नीति आयोग ने कौन-से प्रमुख उपाय सुझाए हैं?
इन सुझावों में स्क्रैपेज इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार, EPR को मज़बूत करना, अनौपचारिक पुनर्चक्रणकर्त्ताओं को औपचारिक बनाना, मानकों में सुधार करना और साझा पुनर्चक्रण सुविधाओं का निर्माण करना शामिल है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत  वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: ( 2025)

कथन-I: चक्रीय अर्थव्यवस्था ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करती है।   

कथन-II: चक्रीय अर्थव्यवस्था आगत के रूप में कच्चे माल के प्रयोग को कम करती है।   

कथन-III: चक्रीय अर्थव्यवस्था उत्पादन प्रक्रिया में अपव्यय को कम करती है।   

उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?

(a) कथन II और कथन III दोनों सही हैं तथा वे दोनों कथन I की व्याख्या करते हैं

(b) कथन II और कथन III दोनों सही हैं किंतु उनमें से केवल एक, कथन I की व्याख्या करता है

(c) कथन II और कथन III में से केवल एक सही है तथा वह कथन I की व्याख्या करता है

(d) न तो कथन II और न ही कथन III सही है

उत्तर: (a)


प्रश्न. भारत में निम्नलिखित में से किसमें एक महत्त्वपूर्ण विशेषता के रूप में ‘विस्तारित उत्पादक दायित्व’ आरंभ किया गया था? (2019)

(a) जैव चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 1998

(b) पुनर्चक्रित प्लास्टिक (निर्माण और उपयोग) नियम, 1999

(c) ई-अपशिष्ट (प्रबंधन और हस्तन) नियम, 2011

(d) खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011

उत्तर: (c)

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