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जनजाति समुदायों हेतु ‘संयुक्त पत्र’

  • 10 Jul 2021
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारतीय वन अधिनियम, 1927; वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972; ट्राइफेड 

मेन्स के लिये:

जनजाति समुदायों हेतु ‘संयुक्त पत्र’ का महत्त्व 

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में जनजातीय मामलों के मंत्रालय तथा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एक ‘संयुक्त वक्तव्य’ (Joint Communication) पत्र पर हस्ताक्षर किये गए हैं , जिसका उद्देश्य आदिवासी समुदायों को वन संसाधनों के प्रबंधन में अधिक अधिकार प्रदान करना है।

वन संसाधन

  • वन न केवल पेड़ों से आच्छादित जानवरों के आवास स्थल हैं बल्कि वे संसाधनों का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत भी हैं। वे स्वच्छ हवा, लकड़ी, ईंधन, फल, भोजन, चारा आदि के अलावा अनेक संसाधन प्रदान करते हैं। इन्हें वन संसाधन के रूप में जाना जाता है, जिन पर बहुत से लोगों की आजीविका और अस्तित्व निर्भर है।
  • वनों से हमें संसाधन प्राप्त होते हैं, जिसकी वजह से इनका संरक्षण करना और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इन्हीं संसाधनों के कारण वनों का दोहन होता है।
  • वन संरक्षण और बचाव हेतु पहलें:

प्रमुख बिंदु: 

‘संयुक्त पत्र’ के विषय में:

  • ‘संयुक्त पत्र, वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के अधिक प्रभावी कार्यान्वयन और वन में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों (Forest Dwelling Scheduled Tribes- FDSTs) तथा अन्य पारंपरिक वन निवासियों (Traditional Forest Dwellers- OTFDs) की आजीविका में सुधार हेतु उनकी क्षमता का दोहन करने से संबंधित है।
  • राज्य के वन विभाग वन अधिकारों के दावों का सत्यापन, शामिल वन भूमि की मैपिंग और आवश्यक साक्ष्य के प्रावधान, अभिलेखों का प्रमाणीकरण, संयुक्त क्षेत्र निरीक्षण, जागरूकता सृजन आदि का कार्य करेंगे।
    • देश भर में वन अधिकारों की मान्यता में कमी के कारण इसने आदिवासी और वनवासी समुदायों में अपनी भूमि से बेदखल होने की असुरक्षित भावना को जन्म दिया है।
  • राज्य के वन विभाग द्वारा मूल्य शृंखलाओं के संवर्द्धन हेतु परियोजनाएंँ शुरू की जाएंगी, जिसमें प्राथमिक संग्राहकों के क्षमता निर्माण, कटाई के नए तरीके, गैर-इमारती वन उत्पादों (Non​-Timber Forest Products- NTFP) का भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन शामिल है।
  • विशिष्ट गैर-लकड़ी वन उत्पादों हेतु आपूर्ति शृंखला प्लेटफार्म के रूप में ट्राइफेड (TRIFED), आयुष मंत्रालय, एमएफपी (लघु वनोपज) संघों, वन धन केंद्रों (Van Dhan Kendras) आदि के सहयोग से नामित एक नोडल एजेंसी बनाई गई है। 

वनवासी/आदिवासी और MFP:

  • आदिवासी और अन्य वनवासी जैव विविधता के संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और वन क्षेत्र को बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन की दिशा में किये जा रहे प्रयासों में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
  • आदिवासी न केवल अपनी आजीविका हेतु वनों पर निर्भर हैं बल्कि उनकी परंपराएंँ भी वनों से जुड़ी हुई हैं।
  • गैर-इमारती वन उत्पाद या लघु वन उत्पाद (Non-Timber Forest Products or Minor Forest Produce- MFP):
    • MFP में पौधे की उत्पत्ति से संबंधित सभी गैर-लकड़ी वन उत्पाद शामिल हैं जिनमें बांँस, बेंत, चारा, पत्ते, गोंद, मोम, डाई, रेजिन और कई प्रकार के भोजन (नट, जंगली फल, शहद, लाख, टसर आदि) शामिल हैं।
    • यह उन लोगों जो वनों में या उसके आसपास रहते हैं, के जीवन निर्वाह हेतु नकद आय प्रदान करते हैं ।
    • वे अपने भोजन, फलों, दवाओं और अन्य उपभोग की वस्तुओं का एक बड़ा हिस्सा वनों से प्राप्त करते है तथा इन उत्पादों की बिक्री के माध्यम से नकद आय भी प्राप्त करते हैं।
    • NTFP को MFP या गैर-लकड़ी वन उत्पाद ( Non-Wood Forest Produce- NWFP) के रूप में भी जाना जाता है।
      • NTFP को आगे औषधीय और सुगंधित पौधों  Medicinal And Aromatic Plants- MAP), तिलहन, फाइबर तथा फ्लॉस, रेजिन, खाद्य पौधों, बांँस और घास में वर्गीकृत किया जा सकता है।

वनवासियों के लिये पहल:

वन अधिकार अधिनियम, 2006

  • यह अधिनियम पीढ़ियों से जंगलों में निवास कर रहे वन विस्थापित अनुसूचित जनजातियों (Forest Dwelling Scheduled Tribes- FDST) और अन्य पारंपरिक वन विस्थापितों (Other Traditional Forest Dwellers- OTFD) के लिये वन भूमि में वन अधिकारों एवं व्यवसाय को मान्यता देता है।
    • अधिनियम के तहत वन अधिकारों का दावा उस सदस्य या समुदाय द्वारा किया जा सकता है, जिसकी कम-से-कम तीन पीढ़ियाँ (75 वर्ष) मुख्य रूप से अपनी जीविका की ज़रूरतों को पूरा करने हेतु 13 दिसंबर, 2005 से पहले तक  वन भूमि क्षेत्र में निवास करती हो।
  • यह वन में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों (FDST) और अन्य पारंपरिक वनवासियों (OTFD) की आजीविका तथा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए वनों के प्रबंधकीय शासन को मज़बूत करता है।
  • ग्रामसभा को व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) या सामुदायिक वन अधिकार (CFR) या दोनों जो FDST और OTFD को दिये जा सकते हैं, की प्रकृति एवं सीमा को निर्धारित करने के लिये प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है।
  • यह अधिनियम चार प्रकार के अधिकारों को मान्यता देता है:
    • शीर्षक अधिकार: यह एफडीएसटी और ओटीएफडी द्वारा की जा रही खेती वाली भूमि पर इन्हें स्वामित्व का अधिकार देता है लेकिन यह सीमा अधिकतम 4 हेक्टेयर तक ही होगी। स्वामित्व केवल उस भूमि के लिये है जिसमें वास्तव में संबंधित परिवार द्वारा खेती की जा रही है, जिसका तात्पर्य है कि कोई नई भूमि नहीं प्रदान की जाएगी।
    • उपयोग संबंधी अधिकार: गौण वन उत्पादों, चरागाह क्षेत्रों, चरागाही मार्गों आदि के उपयोग का अधिकार प्रदान किया गया है।
    • राहत और विकास संबंधी अधिकार: वन संरक्षण हेतु प्रतिबंधों के अध्ययन, अवैध ढंग से उन्हें हटाने या बलपूर्वक विस्थापित करने के मामले में पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं का अधिकार प्रदान किया गया है।
    • वन प्रबंधन संबंधी अधिकार: इसमें सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा, पुनरुत्पादन, संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार शामिल है, जिसे वे स्थायी उपयोग के लिये परंपरागत रूप से संरक्षित करते रहे हैं।

स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस

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