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सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021

  • 08 Jun 2022
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया मध्यस्थ, आईटी अधिनियम की धारा 69ए

मेन्स के लिये:

सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नीतियों के निर्माण और कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दे, सरकारी नीतियांँ और हस्तक्षेप

चर्चा में क्यों?

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में प्रस्तावित संशोधनों के एक समूह पर सार्वजनिक टिप्पणी के लिये एक मसौदा प्रस्ताव जारी किया।

नियम:

  • यह सोशल मीडिया का सक्रिय होना अनिवार्य करता है:
    • प्रमुख तौर पर IT नियम (2021) सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अपने प्लेटफॉर्म पर सामग्री के संबंध में अधिक सक्रिय रहने के लिये बाध्य करता है।
  • शिकायत अधिकारी की व्यवस्था:
    • उन्हें एक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने और निर्धारित समय-सीमा के भीतर गैर-कानूनी और अनुपयुक्त सामग्री को हटाने की आवश्यकता होती है।
      • प्लेटफॉर्म के निवारण तंत्र का शिकायत अधिकारी उपयोगकर्त्ताओं की शिकायतों को प्राप्त करने और समाधान करने के लिये ज़िम्मेदार है।
    • उससे अपेक्षा की जाती है कि वह 24 घंटे के भीतर शिकायत की प्राप्ति को स्वीकार करे और 15 दिनों के भीतर उचित तरीके से उसका निपटान करे।
      • प्लेटफॉर्म पर किसी अन्य माध्यम से पहुंँच स्थापित करने और प्रसार को अक्षम किया जाना चाहिये।
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की गोपनीयता नीतियों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि उसके कंप्यूटर संसाधन सेवाओं का उपयोग करने वाला व्यक्ति किसी भी ऐसी सामग्री को न होस्ट करे, न वितरित करे, न प्रदर्शित करे और न अपलोड करे, न प्रकाशित करें एवं न शेयर करे, जो पेटेंट नियमों या कॉपीराइट अधिकारों का उल्लंघन करने वाली हो; किसी लागू कानून का उल्लंघन करती हो; भारत की एकता, अखंडता, रक्षा, सुरक्षा, संप्रभुता को नुकसान पहुंँचाने वाली हो. साथ ही भारत के मित्रतापूर्ण विदेश संबंधों को खराब करने वाली, किसी दूसरे देश का अपमान करने वाली, लोक व्यवस्था बिगाड़ने वाली व किसी अपराध की जांँच को बाधित करने वाली हो।

वापस लिये गए मसौदे में प्रस्तावित परिवर्तन:

  • शिकायत अपीलीय समिति:
    • इसने एक अतिरिक्त स्तर की निगरानी का प्रस्ताव रखा, जिसका नाम 'शिकायत अपीलीय समिति' है, यह समिति शिकायत निवारण अधिकारी के फैसलों के विरुद्ध उपयोगकर्त्ताओं की शिकायतों का निपटारा करेगी।
    • मोटे तौर पर यदि कोई उपयोगकर्त्ता शिकायत निवारण अधिकारी द्वारा प्रदान किये गए संकल्प से संतुष्ट नहीं है, तो वह सीधे न्यायालय जाने के बज़ाय शिकायत अपीलीय समिति में निर्णय के खिलाफ अपील कर सकता है।
      • हालांँकि इसने किसी अन्य न्यायालय में अपील करने के उपयोगकर्त्ता के अधिकार को नहीं छीना।
  • सभी अपीलीय आदेशों को संकलित किया जाना चाहिये:
    • मसौदे में यह निर्धारित किया गया था कि इस सभी अपीलीय आदेशों का पालन किया जाना चाहिये।
    • 'निगरानी' पर सुझाया गया प्रश्न इस तथ्य से उपजा है कि 'शिकायत अपीलीय समिति' का गठन केंद्र सरकार द्वारा किया जाना था, जिसे अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को नियुक्त करने का अधिकार प्राप्त था।

सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021:

  • अभिव्यक्ति को दबाने के लिये सरकार मध्यस्थ के रूप में:
    • इसने सरकार को इंटरनेट पर स्वीकार्य भाषण का मध्यस्थ बना दिया और किसी भी अभिव्यक्ति को दबाने के लिये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को प्रोत्साहित किया जो सरकार के लिये उपयुक्त नहीं हो सकता है।
  • शिकायत का समाधान करने दायित्व सोशल मीडिया पर:
    • मसौदे में यह दायित्व सौंपा गया है कि सभी सोशल मीडिया मध्यस्थ रिपोर्टिंग के 72 घंटों के भीतर सभी शिकायतों का समाधान करें।
    • अतः छोटी समय-सीमा ने शीघ्रता संबंधी दृष्टिकोण की आशंकाओं को जन्म दिया।

कानूनी चुनौतियाँ:

  • विधायी दिशा-निर्देशों के नियम 9 के उप-खंड 1 और 3 को लागू करने पर वर्ष 2021 में रोक लगा दी गई थी।
  • ये उप-खंड समाचार और समसामयिक सामग्री और/या क्यूरेट की गई सामग्री से निपटने वाले ऑनलाइन प्रकाशकों के लिये 'आचार संहिता' से संबंधित हैं।
    • उप-खंडों में कहा गया था कि संस्थाएँ शिकायतों (उनके मंच से संबंधित) से निपटने के लिये एक त्रि-स्तरीय तंत्र की सदस्यता लेती हैं ताकि उनकी संहिता का पालन किया जा सके।
  • इसमें प्रकाशकों (स्तर I) द्वारा स्व-विनियमन, प्रकाशकों के स्व-विनियमन निकाय (स्तर II) और अंत में केंद्र सरकार (स्तर III) द्वारा निरीक्षण तंत्र शामिल है।
  • मुंबई उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि यदि लोगों को इंटरनेट पर सामग्री विनियमन के वर्तमान दायरे में लाया जाता है तो यह "लोगों को विचार की स्वतंत्रता से वंचित करेगी और भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करने के उनके अधिकार सीमित करेगी। नैतिक संहिता उनके सिर पर डैमोकल्स की तलवार (Sword of Damocles) के रूप में लटकी हुई है।”

आगे की राह

  • प्लेटफ़ॉर्म को अधिक जानकारी साझा करना उस देश में प्रतिकूल साबित हो सकता है जहाँ नागरिकों के पास अभी भी किसी भी पक्ष द्वारा की गई ज़्यादतियों से खुद को बचाने के लिये डेटा गोपनीयता कानून नहीं है।
  • उसके बाद यदि विनियमन अभी भी आवश्यक समझा जाता है, तो इसे कानून के माध्यम से लागू किया जाना चाहिये, जिस पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 A के अंतर्गत कार्यकारी नियम बनाने की शक्तियों पर भरोसा करने के बजाय संसद में बहस की जाती है।

स्रोत: द हिंदू

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