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जैव विविधता और पर्यावरण

विकसित होता भारत का कार्बन बाज़ार

  • 02 Nov 2022
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये:

कार्बन क्रेडिट बाज़ार, NDCs, GHG, क्योटो प्रोटोकॉल, नेट ज़ीरो, PLI स्कीम, एनर्जी कंज़र्वेशन।

मेन्स के लिये:

भारत का विकसित होता कार्बन बाज़ार और इसका महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय देश को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को पूरा करने में मदद के लिये कार्बन क्रेडिट बाज़ार स्थापित करने हेतु कदम उठा रहा है।

कार्बन बाज़ार:

  • कार्बन क्रेडिट:
    • कार्बन क्रेडिट (इसे कार्बन ऑफ़सेट के रूप में भी जाना जाता है) वातावरण में ग्रीनहाउस उत्सर्जन में कमी लाने के सापेक्ष दिया जाने वाला एक क्रेडिट है, जिसका उपयोग सरकारों, उद्योग या व्यक्तियों द्वारा उत्सर्जन के लिये क्षतिपूर्ति के रुप में किया जा सकता है।
    • इसके द्वारा आसानी से उत्सर्जन को कम नहीं कर पाने वाले उद्योग वित्तीय लागत वहन कर अपना संचालन कर सकते हैं।
    • कार्बन क्रेडिट "कैप-एंड-ट्रेड" मॉडल पर आधारित हैं जिसका उपयोग 1990 के दशक में सल्फर प्रदूषण को कम करने के लिये किया गया था।
    • एक कार्बन क्रेडिट, एक मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर है या कुछ बाज़ारों में कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष गैसों (CO2-eq) के बराबर है।
    • नवंबर 2021 में ग्लासगो में COP26 जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन के दौरान वार्ताकारों ने वैश्विक कार्बन क्रेडिट ऑफसेट ट्रेडिंग मार्केट बनाने पर सहमति व्यक्त की।
    • क्योटो प्रोटोकॉल द्वारा ग्रीनहाउस गैस में कमी करने वाले देशों या विकसित देशों के ऑपरेटरों को क्रेडिट प्रदान करने के लिये तीन तंत्र दिये गए हैं:
      • संयुक्त कार्यान्वयन (JI) के तहत घरेलू ग्रीनहाउस कटौती की अपेक्षाकृत उच्च लागत वाला एक विकसित देश दूसरे विकसित देश में परियोजना स्थापित करेगा।
      • स्वच्छ विकास तंत्र (CDM) के तहत विकसित देश विकासशील देश में ग्रीनहाउस गैस कटौती परियोजना को "प्रायोजित" कर सकता है, जहाँ ग्रीनहाउस गैस कटौती परियोजना गतिविधियों की लागत आमतौर पर बहुत कम होती है, लेकिन वायुमंडलीय प्रभाव विश्व स्तर पर बराबर प्रदर्शित होते हैं। विकसित देश को अपने उत्सर्जन में कमी लाने के लक्ष्यों को पूरा करने के लिये क्रेडिट दिया जाएगा, जबकि इससे विकासशील देश को पूंजी निवेश और स्वच्छ प्रौद्योगिकी  का लाभ प्राप्त होगा।
      • अंतर्राष्ट्रीय उत्सर्जन व्यापार (IET) के तहत देश,अपने आवंटित उत्सर्जन लक्ष्य को संतुलित करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट बाज़ार मे व्यापार कर सकते है। कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले देश क्योटो प्रोटोकॉल के अनुबंध बी के तहत अपने क्रेडिट को उन देशों को बेच सकते हैं जिन्होंने उत्सर्जन लक्ष्य से अधिक उत्सर्जन किया है।
  • कार्बन बाज़ार:
    • कार्बन बाज़ार से उत्सर्जन में कमी और निष्कासन को व्यापार योग्य संपत्तियों में बदला जाता है, इस प्रकार उत्सर्जन को कम करने या ऊर्जा दक्षता में सुधार के लिये प्रोत्साहन मिलता है। कार्बन बाज़ार स्वैच्छिक (voluntary) हो सकते हैं।
    • जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के क्योटो प्रोटोकॉल के तहत वर्ष 1997 में कार्बन व्यापार औपचारिक रूप से शुरू हुआ, जिसमें 150 से अधिक राष्ट्र हस्ताक्षरकर्ता थे।
    • समझौते के तहत प्रतिबद्धता वाले पक्ष वर्ष 2008-2012 के बीच अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीमित या कम करने के लिये सहमत हुए जो कि वर्ष 1990 के स्तर से काफी नीचे थे।
    • उत्सर्जन व्यापार जैसा कि क्योटो प्रोटोकॉल में निर्धारित है, यह देशों को उत्सर्जन इकाइयों की अतिरिक्त क्षमता को उन देशों को बेचने की अनुमति देता है जिनके पास अपने लक्ष्य से अधिक उत्सर्जन करते हैं।।

कार्बन बाज़ार का महत्त्व:

  • कार्बन बाज़ार उन संगठनों के लिये नए रास्ते खोलेगा जो कार्बन क्रेडिट के विकास, व्यापार और परामर्श कार्य में लगे हुए हैं, जबकि जीवाश्म-ईंधन उत्पादन क्षमता के विकास को रोक रहे हैं।
  • कार्बन क्रेडिट भारत जैसे विकासशील देशों को देश के कार्बन लक्ष्यों को परिप्रेक्ष्य में रखते हुए आर्थिक गतिविधियों को अंजाम देने में मदद करेगा।
    • वर्ष 2021 में वैश्विक कार्बन क्रेडिट बाज़ार में 164% की वृद्धि हुई और वर्ष 2030 तक इसके 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार करने की उम्मीद है।
  • कार्बन क्रेडिट उन उद्योगों और अन्य क्षेत्रों को पुरस्कृत करने का एक तरीका प्रदान करता है जिन्होंने उत्सर्जन को कम करने एवं जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये तकनीकी नवाचारों को शामिल करते हुए विधियों को विकसित किया है।
  • कार्बन बाज़ार डीकार्बोनाइज़ेशन की दिशा में संचालितअभियान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, लंबी अवधि में शुद्ध शून्य प्राप्त करने के अंतिम लक्ष्य के साथ अल्पावधि में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से उत्सर्जन में कमी को प्रोत्साहित करेगा।
  • कार्बन बाज़ार उत्सर्जन को कम करने के सबसे प्रभावी चालकों में से एक है, जो सबसे कम लागत के साथ उत्सर्जन में कटौती की पेशकश करता है और भारत को 35 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के नुकसान को रोकने में सक्षम बनाता है।

भारतीय उत्सर्जन लक्ष्य:

  • भारत ने अगस्त 2022 में संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) को पेरिस समझौते के तहत अपने अद्यतन NDC को प्रस्तुत किया, जिसमें उसने इस तथ्य पर ज़ोर दिया कि यह वर्ष 2070 में नेट ज़ीरो के दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त करने में एक कदम आगे है।
  • अद्यतन NDC के तहत भारत अपने सकल घरेलू उत्पादों की उत्सर्जन तीव्रता को वर्ष 2005 के स्तर से वर्ष 2030 तक 45% तक कम करने और वर्ष 2030 तक ऊर्जा के गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से अपनी संचयी विद्युत शक्ति स्थापित क्षमता का 50% प्राप्त करने के लिये प्रतिबद्ध है।
  • देश सोलर मैन्युफैक्चरिंग डिवीज़न में अपनी सप्लाई चेन के विस्तार पर काम कर रहा है।

संबंधित भारतीय पहल:

  • PLI योजना:
    • मॉड्यूल में पॉलीसिलिकॉन सेल के निर्माण के लिये उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना शुरू करके आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण।
  • स्वच्छ विकास तंत्र:
    • भारत में क्योटो प्रोटोकॉल के तहत स्वच्छ विकास तंत्र ने अभिकर्त्ताओं के लिये प्राथमिक कार्बन बाज़ार प्रदान किया है।
    • द्वितीयक कार्बन बाज़ार प्रदर्शन-उपलब्धि-व्यापार योजना (जो ऊर्जा दक्षता श्रेणी के अंतर्गत आता है) और नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र द्वारा कवर किया गया है।
  • ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022:
    • यह 100 किलोवाट (kW) से अधिक के कनेक्टेड लोड या 15 किलोवोल्ट-एम्पीयर (kVA) से अधिक की संविदात्मक मांग वाले उपकरणों, औद्योगिक उपकरणों और भवनों के लिये ऊर्जा दक्षता के मानदंडों एवं मानकों को निर्दिष्ट करने हेतु केंद्र को अधिकृत करता है।

आगे की राह

  • भारत राष्ट्रीय स्तर पर कार्बन बााज़ार स्थापित करने की राह पर है, यह स्वैच्छिक कार्बन बााज़ार की शुरुआत के साथ अनुपालन-आधारित बाज़ार की ओर बढ़ रहा है।
  • जलवायु परिवर्तन में कमी के प्रभाव अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, परिवहन, अपशिष्ट, पुनर्रोपण और वनीकरण जैसे क्षेत्रों के अनुकूल होने चाहिये।
  • उपयुक्त विनियमों और नीति द्वारा समर्थित कार्बन क्रेडिट बाज़ार आने वाले दशक के लिये उचित अवसरों के सृजन में मदद करेगा।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स

प्रश्न. कार्बन क्रेडिट की अवधारणा निम्नलिखित में से किससे उत्पन्न हुई है? (2009)

(a) पृथ्वी शिखर सम्मेलन, रियो डी जनेरियो
(b) क्योटो प्रोटोकॉल
(c) मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
(d) जी-8 शिखर सम्मेलन, हेलीजेंडम

उत्तर: (b)


प्रश्न. "कार्बन क्रेडिट" के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा सही नहीं है? (2011)

(a) कार्बन क्रेडिट प्रणाली क्योटो प्रोटोकॉल के संयोजन में सम्पुष्ट की गई थी।
(b) कार्बन क्रेडिट उन देशों या समूहों को प्रदान किया जाता है जो ग्रीन-हाउस गैसों का उत्सर्जन घटाकर उसे उत्सर्जन अभ्यंश के नीचे ला चुके होते हैं।
(c) कार्बन क्रेडिट का लक्ष्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में हो रही वृद्धि पर अंकुश लगाना है।
(d) कार्बन क्रेडिट का क्रय-विक्रय संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा समय-समय पर नियत मूल्यों के आधार पर किया जाता है।

उत्तर: (d)


मेन्स

प्रश्न. क्या कार्बन क्रेडिट के मूल्य में भारी गिरावट के बावजूद जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC) के तहत स्थापित कार्बन क्रेडिट और स्वच्छ विकास तंत्र को बनाए रखा जाना चाहिये? आर्थिक विकास के लिये भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं के संबंध में चर्चा कीजिये। (2014)

प्रश्न. ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चा कीजिये और वैश्विक जलवायु पर इसके प्रभावों का उल्लेख कीजिये। क्योटो प्रोटोकॉल, 1997 के आलोक में ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनने वाली ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को कम करने हेतु नियंत्रण उपायों की व्याख्या कीजिये। (2022)

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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