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जीव विज्ञान और पर्यावरण

भारत में मिली मेंढक की एक नई प्रजाति

  • 13 Mar 2019
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में 2 सेमी लंबे तथा विभिन्न रंगों वाले मेंढक की खोज को एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित किया गया।

प्रमुख बिंदु

  • जून 2010 में पहली बार इस मेंढक को केरल के वायनाड में पत्तियों के नीचे पाया गया था।

frog

  • यह एक नई प्रजाति है इसके कई दिलचस्प आकार और रंग पैटर्न पाए गए हैं जो अन्य पश्चिमी घाट के मेंढकों में नहीं देखा जाता।
  • हाल ही में देश और विदेश के वैज्ञानिकों की एक टीम ने जीवों के शारीरिक संरचना, कंकाल और आनुवंशिक विशेषताओं का अध्ययन किया।
  • उन्होंने दुनिया भर के संग्रहालय में संग्रहित समान प्रजातियों के मेंढकों के नमूनों की आपस में तुलना की।
  • इस अध्ययन के अनुसार केरल के वायनाड में पाए जाने वाले मेढकों का आकार अन्य समान आकार के मेंढकों से पूरी तरह से अलग पाया गया।
  • हालाँकि, आनुवंशिक अध्ययनों से एक बात सामने आई है कि वायनाड में पाए जाने वाले मेंढकों के सबसे करीबी परिवार पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले Nycibatrachinae (नायसीबत्ट्राचिने) समूह तथा श्रीलंका में पाए जाने वाले Lankanectinae (लंकानेक्टिने) समूह के मेंढक हैं।

एस्ट्रोबाट्राचस कुरिचियाना
Astrobatrachus kurichiyana

  • वैज्ञानिकों की टीम ने इस नई प्रजाति के मेंढक को एस्ट्रोबाट्राचस कुरिचियाना नाम दिया है क्योंकि विविध रंगों एवं आकार वाला यह छोटा मेंढक एस्ट्रोबाट्राचस वंश का है तथा इसे वहाँ पाए जाने वाले कुरिचियाना जनजातियों द्वारा कुरिचियाना नाम दिया गया था।
  • आनुवंशिक विश्लेषण से पता चलता है कि यह प्रजाति कम-से-कम 60 मिलियन वर्ष पूर्व विकसित हुई हैं।
  • यह मेंढक एक नई प्रजाति के साथ ही नए परिवार से भी संबंधित है।

कुरिचिया जनजाति

  • इस जनजाति को मलाई ब्राह्मण (Malai Brahmins)  या पहाड़ी ब्राह्मण (Hill Brahmins) भी कहा जाता है।
  • वे वायनाड जिले में दूसरे सबसे बड़े आदिवासी समुदाय हैं। ये वायनाड की पहाड़ी जनजातियों के जाति पदानुक्रम में शीर्ष पर हैं।
  • इस समुदाय को कुरिचिया नाम इनकी तीरंदाजी में विशेषज्ञता के लिये कोट्टायम राजा द्वारा दिया गया था यह नाम 'कुरी वीचवन' वाक्यांश से लिया गया है जिसका अर्थ है 'वह जिसने लक्ष्य पाया'।
  • यह भी कहा जाता है कि `कुरिचिया' नाम कुरी या चंदन के पेस्ट से लिया गया है जिसे वे अपने माथे और छाती पर रिवाज के तौर पर लगाते हैं।
  • ये भूमि स्वामी समुदाय हैं और एक मातृसत्तात्मक पारिवारिक प्रणाली का पालन करते हैं।
  • उन्होंने स्लैम और बर्न (शिफ्टिंग) की खेती को पुनम खेती (Punam Cultivation) के नाम से जाना।

स्रोत – इंडियन एक्सप्रेस

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