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सामाजिक न्याय

बाल संदिग्धों के आकलन हेतु दिशा-निर्देश

  • 17 Apr 2023
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

NCPCR, पोस्को, JJB, अनुच्छेद 21, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत (DPSP)

मेन्स के लिये:

बाल संदिग्धों के आकलन हेतु दिशा-निर्देश।

चर्चा में क्यों? 

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights- NCPCR) ने यह निर्धारित करने हेतु आकलन के लिये दिशा-निर्देश जारी किये हैं कि आपराधिक मामलों में बच्चे को नाबालिग माना जाना चाहिये या नहीं। बच्चों द्वारा किये गए आपराधिक मामले किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत ‘जघन्य’ अपराध श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।

प्रमुख बिंदु

  • बाल संदिग्धों का आकलन विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा किया जाना चाहिये, जिसमें बाल मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक, एक चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्त्ता शामिल हों।
    • आकलन में बच्चे की उम्र, विकासात्मक अवस्था और परिपक्वता स्तर के साथ-साथ आघात या दुर्व्यवहार के किसी भी विवरण को ध्यान में रखा जाना चाहिये।
  • टीम को बच्चे की संज्ञानात्मक क्षमता और उस पर लगे आरोपों को समझने की क्षमता पर भी विचार करना चाहिये।
  • बाल संदिग्धों को कानूनी सहायता और बाल कल्याण एजेंसियों द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी।
  • किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board- JJB) संदिग्ध बच्चे का प्रारंभिक मूल्यांकन करने के लिए ज़िम्मेदार होगा।
    • JJB को बच्चे को पहली बार उसके सामने लाए जाने की तारीख से तीन महीने के भीतर इस आकलन को पूरा करना होगा।
    • यदि JJB यह निर्धारित करता है कि बच्चे का परीक्षण एक वयस्क के रूप में किये जाने की आवश्यकता है, तो वह मामले को बाल न्यायालय में स्थानांतरित किया जाएगा। JJB अनिवार्य रूप से आकलन प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यह निर्धारित करता है कि मामला किशोर न्यायालय या वयस्क न्यायालय में चलाया जाना चाहिये या नहीं।

JJ अधिनियम, वर्ष 2015 के तहत अपराधों की श्रेणियाँ और उनका विभेदीकरण:

  • JJ अधिनियम, वर्ष 2015 बच्चों द्वारा किये गए अपराधों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करता है: छोटे अपराध, गंभीर अपराध और जघन्य अपराध।  
    • छोटे अपराधों में वे शामिल हैं जिनके लिये किसी भी कानून के तहत अधिकतम कारावास तीन वर्ष तक की कैद है
    • गंभीर अपराधों में वे अपराध शामिल हैं जिनके लिये न्यूनतम कारावास तीन वर्ष से अधिक लेकिन सात वर्ष से अधिक नहीं है।
    • जघन्य अपराधों में वे शामिल हैं जिनके लिये भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य कानून के तहत न्यूनतम सात वर्ष या उससे अधिक का कारावास है।
  • एक विशिष्ट प्रावधान है जिसके तहत जघन्य अपराध की जाँच की शुरुआत बच्चे की उम्र के आधार पर की जाती है और इस प्रारंभिक आकलन के लिये दो आवश्यक शर्तों को पूरा करने की आवश्यकता होती है:
    • अपराध अधिनियम में परिभाषित ‘जघन्य’ की श्रेणी में होना चाहिये।
    • जिस बच्चे ने कथित रूप से अपराध किया है उसकी आयु 16-18 वर्ष के बीच होनी चाहिये।

दिशा-निर्देशों की आवश्यकता: 

  • भलाई सुनिश्चित करना:  
    • जिन बच्चों पर जघन्य अपराध करने का आरोप लगाया जाता है, वे कमज़ोर होते हैं, अतः उनकी शारीरिक और भावनात्मक भलाई सुनिश्चित करने हेतु विशेष देखभाल एवं ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है।
    • आकलन किसी भी अंतर्निहित मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों, आघात या दुर्व्यवहार की पहचान करने में मदद कर सकता है जिसके लिये हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है।
  • संज्ञानात्मक क्षमता निर्धारित करना:  
    • बच्चों के संज्ञानात्मक विकास के विभिन्न स्तर होते हैं, जो उनके खिलाफ आरोपों को समझने और कानूनी कार्यवाही में भाग लेने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
    • यह आकलन उनकी समझ के स्तर को निर्धारित करने में मदद कर सकता है और यह सुनिश्चित कर सकता है कि उन्हें उन कार्यों हेतु गलत तरीके से ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है जिन्हें वे पूरी तरह से समझ नहीं सकते हैं।
  • कानूनी निर्णय:  
    • बाल संदिग्धों का आकलन न्यायाधीशों और कानूनी पेशेवरों को महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर सकता है, जिन्हें किसी मामले में आगे बढ़ने के तरीके के बारे में निर्णय लेने की आवश्यकता हो सकती है।
      • उदाहरण के लिये आकलन यह निर्धारित करने में मदद कर सकता है कि क्या कोई बच्चा परीक्षण हेतु तैयार है या क्या अन्य उपाय, जैसे पुनर्वास या परामर्श अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights- NCPCR): 

  • NCPCR बाल अधिकार संरक्षण आयोग (CPCR) अधिनियम, 2005 के तहत मार्च 2007 में स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
  • यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में है।
  • आयोग का प्राथमिक कार्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी देशों में निर्मित सभी कानून, नीतियाँ, कार्यक्रम और प्रशासनिक तंत्र, बाल अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय संविधान एवं बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुरूप हों।
  • यह शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत एक बच्चे के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से संबंधित शिकायतों की जाँच करता है।
  • यह यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (Protection of Children from Sexual Offences- POCSO) अधिनियम, 2012 के कार्यान्वयन की निगरानी करता है।

बच्चों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान: 

  • संविधान प्रत्येक बच्चे को गरिमा के साथ जीने का अधिकार (अनुच्छेद 21), व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21), निजता का अधिकार (अनुच्छेद 21), समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) और/या उसके विरुद्ध भेदभाव का अधिकार (अनुच्छेद 15), शोषण के खिलाफ अधिकार (अनुच्छेद 23 एवं 24) की गारंटी देता है।
  • 6-14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिये मुफ्त और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A)।
  • राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों एवं विशेष रूप से अनुच्छेद 39 (f) के तहत राज्य की यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी है कि बच्चों के जीवन के विकास, उन्हें स्वतंत्रता एवं सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिये अवसर और संसाधन प्रदान किये जाएँ। साथ ही बच्चों और किशोरों के शोषण तथा उन्हें भौतिक एवं नैतिक परित्याग से बचाना राज्य का कर्त्तव्य है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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