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सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई हेतु उपयुक्त प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के लिये ‘टेक्नोलॉजी चैलेंज’ का शुभारंभ

  • 13 Jul 2018
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई हेतु उपयुक्त प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के लिये ‘टेक्नोलॉजी चैलेंज’ का शुभारंभ किया है, जिसका उद्देश्य सेप्टिक टैंक/मेनहोल इत्यादि में मानव प्रवेश की ज़रूरत को समाप्त करना है।

प्रमुख बिंदु

  • यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न के अनुरूप है जिन्होंने 4 मई, 2018 को अपनी अध्यक्षता में आयोजित एक बैठक में सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिये उनमें मानव प्रवेश की ज़रूरत को समाप्त करने हेतु नवीनतम प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के लिये एक ‘टेक्नोलॉजी चैलेंज’ की शुरुआत किये जाने की इच्छा जताई थी।
  • आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने यह ज़िम्मेदारी मिलने के बाद अब ‘टेक्नोलॉजी चैलेंजः सीवरेज प्रणालियों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिये उपयुक्त समाधानों की पहचान करने’ का निर्णय लिया है।
  • यह चैलेंज महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन का एक हिस्सा होगा, जिसका आयोजन 2 अक्टूबर, 2018 को किया जाएगा।

‘टेक्नोलॉजी चैलेंज’ पहल 

  • सीवर ड्रेन और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिये उनमें मानव प्रवेश की ज़रूरत को समाप्त करना इस पहल का अंतिम लक्ष्य है। 
  • भारत सरकार के आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिये उनमें मानव प्रवेश की ज़रूरत को समाप्त करने में मददगार अभिनव प्रौद्योगिकियों को उपलब्ध कराने के लिये इच्छुक अन्वेषकों, व्यक्तियों, कंसोर्टियम के साझेदारों, कंपनियों, अकादमिक संस्थानों, अनुसंधान एवं विकास केंद्रों, सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों (NGO) और नगरपालिका निकायों से प्रस्ताव आमंत्रित किये हैं।

‘टेक्नोलॉजी चैलेंज’ पहल का उद्देश्य 

  • अभिनव तकनीक एवं व्यावसायिक प्रक्रियाओं की पहचान करना|
  • ऐसे व्यावसायिक मॉडल का अनुमोदन करना जो विभिन्न आकार, भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी वाले शहरों के लिये उपयुक्त हो|
  • परियोजनाओं से जुड़े चुनिंदा शहरों में चयनित प्रौद्योगिकियों/समाधानों का प्रायोगिक परीक्षण करना एवं उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करना|
  • अन्वेषकों/निर्माताओं और लाभार्थियों यथा-शहरी स्थानीय निकायों (ULB), नागरिकों के बीच की खाई को पाटना|

आकलन की प्रक्रिया 

  • इसमें भाग लेने वालों द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले तकनीकी समाधानों के आकलन एवं परीक्षण के लिये एक ज्यूरी गठित का गठन किया जाएगा, जिसमें आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के विशेषज्ञ, आईआईटी/आईआईएम की फैकल्टी और अग्रणी सिविल सोसायटी समूहों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। 

प्रस्ताव पर संशय 

  • मैनुअल स्केवेंजर्स से जुड़े संगठन के कार्यकर्त्ताओं ने प्रस्ताव के बारे में संशय (संदेह) जाहिर किया है।
  • सीवर और सेप्टिक टैंकों को साफ करने वाली मशीनें पहले से ही वैश्विक स्तर पर उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें भारतीय परिस्थितियों में अनुकूलित करने की ज़रूरत है  और सरकार को बड़े पैमाने पर ज़मीन पर तकनीक का उपयोग करने के लिये राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की ज़रूरत है|
  • सरकार दूसरों को ऐसी समस्या का समाधान के लिये क्यों कह रही है जिसने इतने सालों से इस समुदाय के लोगों को पूरी तरह से उपेक्षित किया है? व्यक्तियों, कंपनियों और गैर-सरकारी संगठनों को यह कार्य सौंप कर  सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से बचना चाहती है|
  • देश के विभिन्न हिस्सों में गैर-सरकारी संगठनों और विश्वविद्यालयों द्वारा कुछ छोटे पैमाने पर बनाई गई प्रौद्योगिकी परियोजनाएँ पहले से मौजूद हैं, लेकिन कोई देशव्यापी सरकारी विभाग या एजेंसी नहीं है जो मैन्युअल स्केवेंजिंग को खत्म करने की ज़िम्मेदारी ले सके।
  • यह चुनौती भ्रम पैदा करती है कि समाधान व्यावसायिक मॉडल के माध्यम से उपलब्ध कराया जा रहा है। यह एक समस्या है क्योंकि आप स्वच्छता को व्यवसाय में लाने की कोशिश कर रहे हैं।
  • विडंबना यह है कि जब मैनुअल स्केवेंजर की मौत हो जाती है तो सरकार मुआवज़ा देकर अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती है  लेकिन ऐसी मौतों को रोकने के लिये कोई समुचित उपाय नहीं करती है। 
  • कानून द्वारा अनिवार्य उपकरण और चिकित्सा सहायता न तो ठेकेदार और न ही नगर पालिका द्वारा प्रदान किया जाता है|
  • इसके समाधान हेतु प्रौद्योगिकी पर विचार करने के पूर्व हमें कानून के प्रावधानों को लागू करने की आवश्यकता है। अन्यथा ये  सभी नवाचार ज़मीनी स्तर पर सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाएंगे|
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