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जैव विविधता और पर्यावरण

वर्ष 2020 के बाद वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क में अंतराल

  • 21 Jun 2022
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये:

रासायनिक प्रदूषक, जलवायु शमन लक्ष्य। 

मेन्स के लिये:

पोस्ट-2020 ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क में अंतराल और सिफारिशें। 

चर्चा में क्यों? 

पर्यावरण वैज्ञानिकों, पारिस्थितिकीविदों और नीति विशेषज्ञों के एक समूह ने माना है कि वर्ष 2020 के बाद वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क का मसौदा उन रासायनिक प्रदूषकों की समग्रता का हिसाब देने में विफल है जो वैश्विक स्तर पर पारिस्थितिक तंत्र को खतरे में डालते हैं। 

फ्रेमवर्क में अंतराल: 

  • रासायनिक प्रदूषक: मसौदा समझौता पोषक तत्त्वों, कीटनाशकों और प्लास्टिक को शामिल करके सीमित हो जाता है, क्योंकि अधिक चिंता और महत्त्व के कई रसायनों को समूह से बाहर रखा जाता है, जिसमें ऐसे पदार्थ शामिल हैं जो विषाक्त हैं, जैसे पारा और PFAS (प्रति पॉलीफ्लोरोएल्किल पदार्थ) साथ ही फार्मास्यूटिकल्स। 
  • संरक्षित क्षेत्रों के अंदर LNPP: वर्तमान में LNPP (भूमि जहांँ प्राकृतिक प्रक्रियाएंँ प्रबल होती हैं) स्थायी बर्फ और चट्टान को छोड़कर लगभग 56% स्थलीय भूमि को कवर करती है। हालाँकि इस भूमि का केवल 20% ही औपचारिक रूप से संरक्षित है। इसका मतलब यह है कि स्थायी बर्फ और चट्टान को छोड़कर दुनिया की केवल 11% भूमि LNPP द्वारा संरक्षित क्षेत्रों के अंदर है। समूह को लगता है कि यह एक समस्या है क्योंकि वर्ष 2020 के बाद के ढांँचे में वर्ष 2030 तक कम से कम 30% भूमि की रक्षा करने का प्रस्ताव है। 
    • LNPP उस भूमि को संदर्भित करता है जहांँ कम मानवीय हस्तक्षेप और / या पारिस्थितिक रूप से अपेक्षाकृत यथावत वनस्पति है, जो जैवविविधता को पनपने के लिये स्थान और आवास प्रदान करती है। 

वर्ष 2020 के बाद वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क 

  • परिचय: 
    • यह एक नया फ्रेमवर्क है जो लोगों को प्रकृति और इसकी आवश्यक सेवाओं को परिरक्षित तथा संरक्षित करने के लिये वर्ष 2030 तक दुनिया भर में कार्यों का मार्गदर्शन करेगा। 
    • इसका उद्देश्य सरकारों और पूरे समाज द्वारा जैवविविधता, इसके प्रोटोकॉल और जैवविविधता से संबंधित अन्य बहुपक्षीय समझौतों, प्रक्रियाओं और उपकरणों के उद्देश्यों में योगदान करने के लिये तत्त्काल तथा परिवर्तनकारी कार्रवाई को बढ़ावा देना है। 
    • फ्रेमवर्क परिवर्तन के सिद्धांत के इर्द-गिर्द बनाया गया है जो यह मानता है कि आर्थिक, सामाजिक और वित्तीय मॉडल को बदलने के लिये वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर तत्त्काल नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता है। 
  • लक्ष्य और उद्देश्य: 
    • वर्ष 2050 तक हासिल करने के लिये चार लक्ष्य: 
      • जैवविविधता के विलुप्त होने और गिरावट को रोकने के लिये। 
      • संरक्षण के द्वारा मनुष्यों को प्रकृति की सेवाओं में वृद्धि और बनाए रखने के लिये। 
      • आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से सभी को उचित और समान लाभ सुनिश्चित करना। 
      • उपलब्ध वित्तीय और कार्यान्वयन के अन्य साधनों तथा वर्ष 2050 के विज़न को प्राप्त करने के लिये आवश्यक बीच की अंतराल को पाटना। 
    • 2030 कार्य लक्ष्य: वर्ष 2030 के दशक में तत्काल कार्रवाई के लिये ढांँचे में 21 कार्योंमुख लक्ष्य हैं, जिनमें शामिल हैं: 
      • विश्व के कम से कम 30% भूमि और समुद्री क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत लाना। 
      • आक्रामक विदेशी प्रजातियों की शुरूआत की दर में 50% से अधिक कमी, और उनके प्रभावों को खत्म करने या कम करने के लिये ऐसी प्रजातियों का नियंत्रण या उन्मूलन। 
      • पर्यावरण के लिये नुकसानदेह पोषक तत्वों को कम से कम आधा, और कीटनाशकों को कम से कम दो तिहाई कम करना, और प्लास्टिक कचरे के निर्वहन को समाप्त करना। 
      • प्रति वर्ष कम से कम 10 GtCO2e (गीगाटन समतुल्य कार्बन डाइऑक्साइड) के वैश्विक जलवायु परिवर्तन शमन प्रयासों में प्रकृति-आधारित योगदान, और यह कि सभी शमन तथा अनुकूलन प्रयास जैवविविधता पर नकारात्मक प्रभावों से बचाते हैं। 
      • जैवविविधता के लिये हानिकारक प्रोत्साहनों को पुनर्निर्देशित, पुन: उपयोग, सुधार या समाप्त करना, उचित और न्यायसंगत तरीके से, उन्हें प्रति वर्ष कम से कम 500 बिलियन अमेरिकी डाॅलर तक कम करना। 

अनुशंसाएँ: 

  • वर्ष 2020 के बाद के वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क में लागू की जाने वाली रणनीतियों और कार्रवाई के लिये रासायनिक प्रदूषकों के व्यापक दायरे को लक्षित करने की आवश्यकता है। 
    • दुनिया भर के देश हाल ही में मौजूदा ज्ञान को समेकित करने और नीति निर्माताओं को सूचित करने के लिये रसायनों और कचरे पर एक अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति पैनल बनाने पर सहमत हुए हैं। 
  • दूरदराज़ के आर्कटिक, अंटार्कटिक और हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र सहित दुनिया के हर पारिस्थितिकी तंत्र में पाए जाने वाले रासायनिक प्रदूषकों के अकाट्य प्रमाण, नए जैवविविधता फ्रेमवर्क के वार्ताकारों को इन्हें वैश्विक जैवविविधता के लिये खतरों के रूप में शामिल करने हेतु मज़बूर करना चाहिये।  
  • भोजन की उपलब्धता के लिये जैवविविधता की रक्षा करना महत्त्वपूर्ण है, सभी प्रजातियों की स्वस्थ और लचीली आबादी का समर्थन करने के लिये वर्ष 2030 तक कम-से-कम 5% और 2050 तक 15% की प्राकृतिक प्रणालियों के क्षेत्र, कनेक्टिविटी और अखंडता में शुद्ध लाभ होना चाहिये। 
  • आहार में बदलाव, फसल और पशुधन उत्पादकता में वृद्धि और कृषि भूमि के विस्तार को सीमित करने से वर्ष 2050 तक वैश्विक जैवविविधता, खाद्य सुरक्षा और जलवायु शमन लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी। 

जैवविविधता अभिसमय (CBD) 

  • जैवविविधता अभिसमय (Convention on Biological Diversity- CBD), जैवविविधता के संरक्षण हेतु कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है जो वर्ष 1993 से लागू है। इसके 3 मुख्य उद्देश्य हैं: 
    • जैवविविधता का संरक्षण। 
    • जैविक विविधता के घटकों का सतत् उपयोग। 
    • आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का उचित और न्यायसंगत वितरण। 
  • लगभग सभी देशों ने इसकी पुष्टि की है (अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर तो किये हैं लेकिन पुष्टि नहीं की है)। 
  • CBD का सचिवालय मॉन्ट्रियल, कनाडा में स्थित है जो संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत संचालित होता है। 
  • जैवविविधता अभिसमय के तहत पार्टियांँ (देश) नियमित अंतराल पर मिलती हैं और इन बैठकों को कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (Conference of Parties - COP) कहा जाता है। 
  • वर्ष 2000 में जैव सुरक्षा पर एक पूरक समझौते के रुप में कार्टाजेना प्रोटोकॉल (Cartagena Protocol on Biosafety) को अपनाया गया था। यह 11 सितंबर, 2003 को लागू हुआ। 
    • यह प्रोटोकॉल आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप संशोधित जीवित जीवों द्वारा उत्पन्न संभावित जोखिमों से जैविक विविधता की रक्षा करता है। 
    • आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंँच सुनिशचित तकरने और उनके उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों के उचित एवं न्यायसंगत साझाकरण को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2010 में नागोया प्रोटोकॉल को जापान के नागोया शहर में संपन्न। 
  • नागोया प्रोटोकॉल COP10 में अपनाया गया था। यह 12 अक्तूबर, 2014 को लागू हुआ। 
    • यह प्रोटोकॉल न केवल CBD के तहत शामिल आनुवंशिक संसाधनों और उनके उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों पर लागू होता है, बल्कि आनुवंशिक संसाधनों से जुड़े उस पारंपरिक ज्ञान (Traditional knowledge- TK) को भी कवर करता है जो CBD और इसके उपयोग से होने वाले लाभों से आच्छादित हैं। 
  • COP-10 में आनुवंशिक संसाधनों पर नागोया प्रोटोकॉल को अपनाने के साथ, जैवविविधता को बचाने हेतु सभी देशों द्वारा कार्रवाई के लिये दस वर्ष की रूपरेख को भी अपनाया गया। 
  • वर्ष 2010 में नागोया में CBD की कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP-10) में वर्ष 2011-2020 हेतु ‘जैवविविधता के लिये रणनीतिक योजना’ को अपनाया गया। इसमें पहली बार विषय विशिष्ट 20 जैवविविधता लक्ष्यों- जिन्हें आइची जैवविविधता लक्ष्य के रूप में भी जाना जाता है, को अपनाया गया। 
  • भारत में CBD के प्रावधानों को प्रभावी बनाने हेतु वर्ष 2002 में जैविक विविधता अधिनियम अधिनियमित किया गया। 

स्रोत: डाउन टू अर्थ 

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