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जीव विज्ञान और पर्यावरण

आक्रामक खरपतवार

  • 12 Oct 2019
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये:

कवल वन्यजीव अभयारण्य, कार्टाजेना प्रोटोकॉल, आइची लक्ष्य, जैविक विविधता पर सम्मेलन, रामसर कन्वेंशन, CITES,आक्रामक खरपतवार प्रजाति आदि के प्रमुख तथ्य

मेन्स के लिये:

विदेशी आक्रामक खरपतवार प्रजातियों से निपटने के लिये भारत और विश्व के प्रयास

चर्चा में क्यों?

तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के घास के मैदानों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आक्रामक खरपतवार प्रजाति यथा- हाईपिस (Hyptis), कैसिया तोरा (Cassia Tora) और पार्थेनियम (Parthenium) के प्रसार होने का पता चला है।

प्रमुख बिंदु

  • ये आक्रामक खरपतवार घास के मैदानों को बढ़ने नहीं देते हैं, जिसके कारण शाकाहारियों की आबादी में कमी आती है।
  • घास के मैदानों की संख्या में कमी से क्षेत्र में बाघों की आबादी के अस्तित्व को खतरा हो सकता है।

आदिलाबाद में बाघों का बसेरा ( कवल वन्यजीव अभयारण्य)

  • कवल टाइगर रिजर्व भारत के तेलंगाना राज्य में मनचेरियल डिस्ट्रिक्ट (पुराना आदिलाबाद जिला) के जन्नाराम मंडल में स्थित है।
  • भारत सरकार द्वारा इस अभयारण्य को वर्ष 2012 में वन्यजीव टाइगर रिजर्व घोषित किया गया।
  • गोदावरी और कदम नदियों के लिये यह अभयारण्य जलागम का क्षेत्र है, जो अभयारण्य के दक्षिण की ओर बहती हैं।

आक्रामक प्रजातियों को नियंत्रित करने के लिये किये गए उपाय

  • आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण के लिये कई रणनीति बनाई गई हैं।
    • प्लांट क्वारंटाइन (भारत में आयात का विनियमन) आदेश, 2003 का उपयोग भारत में प्रवेश करने वाले आक्रामक कीट प्रजातियों (आयातित पौधा / रोपण सामग्री) के खतरे से निपटने के लिये किया जाता है।
    • पर्यावरण और वन मंत्रालय, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत जंगली जानवरों और उनसे जुड़ी अन्य सामग्री के निर्यात के लिये संगरोध प्रमाण पत्र (Quarantine Certificates) के साथ अनुमोदन जारी करता है।
  • हानिकारक कीड़े और परोपजीवी अधिनियम 1914 का उद्देश्य भारत में ऐसे कवक या अन्य कीटों के एक प्रांत से दूसरे प्रांत में स्थानांतरण को रोकना है जो फसलों के लिये विनाशकारी हो सकते हैं।
  • भारत ने जैव विविधता पर सम्मेलन (Convention on Biological Diversity-CBD) द्वारा तैयार राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीतियाँ और कार्य योजनाओं (National Biodiversity Strategies and Action Plans-NBSAP) के तहत जैव विविधता और आइची (Aichi) लक्ष्य प्राप्त करने के लिये योजनाओं को संशोधित और नवीनीकृत किया है।
    • भारत ने आइची (Aichi) लक्ष्य 9 को अपना लिया है।
    • आइची (Aichi) लक्ष्य 9 के तहत विदेशी आक्रामक प्रजातियों के मार्गों की पहचान सुनिश्चित करना है तथा पहचान की गई प्रजातियों को नष्ट करते हुए उन मार्गों का प्रबंधन करना है जिन मार्गों से उनका आगमन होता है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किये गये प्रयास

  • जीविका पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल, 2000 (Cartagena Protocol on Biosafety, 2000)
    • इस प्रोटोकॉल का उद्देश्य आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप संशोधित जीवों द्वारा उत्पन्न संभावित जोखिमों से जैव विविधता की रक्षा करना है।
  • जैविक विविधता पर सम्मेलन (Convention on Biological Diversity-CBD)
    • यह रियो डी जनेरियो में 1992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में अपनाए गए प्रमुख समझौतों में से एक था।
    • कन्वेंशन का अनुच्छेद 8 (h) उन विदेशी प्रजातियों का नियंत्रण या उन्मूलन करता है जो प्रजातियों के पारिस्थितिकी तंत्र, निवास स्थान आदि के लिये खतरनाक हैं।
  • CITES (वन्यजीव और वनस्पति की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन)
    • CITES (The Convention of International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) एक अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन है।
    • इसका उद्देश्य वन्यजीवों और पौधों के प्रतिरूप को किसी भी प्रकार के खतरे से बचाना है तथा इनके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को रोकना है।
    • यह आक्रामक प्रजातियों से संबंधित उन समस्याओं पर भी विचार करता है जो जानवरों या पौधों के अस्तित्व के लिये खतरा उत्त्पन्न करती हैं।
  • रामसर कन्वेंशन, 1971 (Ramsar Convention, 1971)
    • रामसर कन्वेंशन अंतर्राष्ट्रीय महत्तव के वेटलैंड्स के संरक्षण और स्थायी उपयोग के लिये एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
    • यह अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर आर्द्र-भूमि पर आक्रामक प्रजातियों के पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक प्रभाव को भी संबोधित करता है तथा उनसे निपटने के लिये नियंत्रण और समाधान के तरीकों को भी खोजता है।

आगे की राह

  • विदेशी कीटों और खरपतवारों के प्रवाह की सूची, निगरानी तथा जाँच के लिये और अधिक शोध होना चाहिये।
  • भारत की संगरोध प्रणाली को सुधारने तथा कठोर बनाने की आवश्यकता है।
    • नेपाल ने इस साल बिहार में तीव्र एंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (Acute Encephalitis Syndrome-AES) के प्रकोप के बाद भारत से कृषि उत्पादों को फाइटोसैनेटिक प्रमाण पत्र (Phytosanitary Certificate) के बिना प्रवेश से रोक दिया।

तीव्र एंसेफेलाइटिस सिंड्रोम

(Acute Encephalitis Syndrome-AES)

  • बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले में एक्यूट एंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (Acute Encephalitis Syndrome-AES) के कारण कई बच्चों की मौत हो गई, जिसे स्थानीय स्तर पर चम्की बुखार (दिमागी बुखार) के रूप में जाना जाता है।
  • AES मच्छरों द्वारा प्रेषित एंसेफेलाइटिस की एक गंभीर स्थिति है, इसकी मुख्य विशेषता तीव्र बुखार और मस्तिष्क में सूजन आना है।
    • एंसेफेलाइटिस को प्राय: जापानी बुखार भी कहा जाता है, क्योंकि यह जापानी एंसेफेलाइटिस (जेई) नामक वायरस के कारण होता है।

स्रोत- द हिंदू

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