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सामाजिक न्याय

राजस्व गाँव

  • 17 Jul 2020
  • 13 min read

प्रीलिम्स के लिये:

 ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006’, राजस्व गाँव  

मेन्स के लिये:

जनजातीय समुदाय की समस्याएँ एवं इस दिशा में सरकार के प्रयास 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ओडिशा सरकार द्वारा ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006’ (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006 के तहत पाँच आदिवासी वन गाँवों को राजस्व गॉंव के रूप में रूपांतरित करने के लिये एक अधिसूचना जारी की गई है।

प्रमुख बिंदु:

  • अधिसूचना में गंगामुंडा (Gangamunda), खजुरिनाली (Khajurinali), चालुझरन (Chalujharan), कंकड़गढ़ तहसील में भालुतांगर (Bhalutangar) तथा कामाख्यायनगर तहसील में करदाबानी गाँव (Karadabani) को शामिल किया गया है।
  • इन गाँवों की कुल आबादी लगभग 3,000 के आस-पास है।

वन गॉंव:

  • वन संसाधन मूल्यांकन (Forest Resources Assessment-FRA) के अनुसार, वन गाँव उन बस्तियों को कहा जाता है जो किसी भी राज्य सरकार के वन विभाग द्वारा वनों के संचालन के लिये वन के अंदर स्थापित किये गए हैं या फिर इन्हें वन आरक्षण प्रक्रिया के माध्यम से वन गाँवों में बदल दिया गया है।
  • वन गाँव में सरकार द्वारा  फिक्स डिमांड होल्डिंग (Fixed Demand Holdings) एवं अनुमति दी गई खेती योग्य भूमि और अन्य उपयोग के लिये सभी प्रकार की तुंग्या बस्तियाँ (Taungya Settlements) तथा भूमि शामिल होती हैं ।
    • तुंग्या वन प्रबंधन की एक प्रणाली है जिसमें भूमि को साफ किया जाता है और उसपर  शुरू में खाद्य फसलों को लगाया जाता है। 

राजस्व गाँव: 

  • ‘महापंजीयक और जनगणना आयुक्त’ के अनुसार, एक राजस्व गाँव भारत में एक छोटा प्रशासनिक क्षेत्र होता है जिसकी सुस्पष्ट परिभाषित सीमा होती है। 
  • एक राजस्व गाँव में कई गाँव शामिल हो सकते हैं। प्रत्येक राजस्व गाँव का नेतृत्व गाँव प्रशासनिक अधिकारी द्वारा किया जाता होता है। 
    • केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा वर्ष 2013 में वन गाँवों को राजस्व गाँव के रूप में रूपांतरित करने के लिये दिशा-निर्देश बनाए गए थे। ओडिशा सरकार द्वारा वर्ष 2015 में अपने स्वयं के दिशा-निर्देश जारी किये परंतु वे  बहुत स्पष्ट नहीं थे।
    • वर्ष 2017 में दोबारा राज्य द्वारा दिशा-निर्देशों का एक और सेट जारी किया गया जिसके बाद से रुपांतरण का काम शुरू किया गया। 
    • वर्ष 2017 के जारी दिशा-निर्देशों के बाद, राज्य में राजस्व गाँव में परिवर्तित होने वाला पहला वन गाँव अंगुल ज़िले का बादामुल गाँव (Badmul in Angul District) था।

राजस्व गाँव का महत्त्व:

  • वन भूमि पर होने के कारण ये गाँव सभी सरकारी सुविधाओं जैसे- स्वच्छ पानी और बिजली इत्यादि से वंचित हैं अतः राजस्व गाँव के रूप में मान्यता प्राप्त होने पर ये   सभी गाँव सरकार द्वारा दी जाने वाली सभी आधारभूत सुविधाओं जैसे- बिजली पानी इत्यादि की सुविधाओं को प्राप्त करने के हकदार होंगे।
  • ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006’अधिनियम के तहत जारी अधिसूचना आदिवासी को आजीविका के लिये स्‍व–कृषि या निवास के लिये व्‍यक्ति विशेष या समान पेशा के तहत वन भूमि पर रहने का अधिकार देगा।
  • राजस्व गाँव में रूपांतरित होने के बाद वन अधिकार समिति का निर्माण किया जाता है जो आदिवासी समुदायों के हितों के संरक्षण के लिये कार्य करती है।

भारत में जनजातीय समुदाय की समस्या:

  • सामान्यतया जनजातियाँ ऐसे ऐसे क्षेत्रों में निवास करती हैं जहाँ बुनियादी सुविधाओं की पहुँच मुश्किल है।
  • जनजातीय समुदाय अपनी अलग सामाजिक सांस्कृतिक, भूमि से अलगाव, अस्पृश्यता की भावना इत्यादि के कारण  सामाजिक संपर्क स्थापित करने में अपने-आप को असहज महसूस करती हैं। 
  • इस समुदाय में शिक्षा, मनोरंजन, स्वास्थ्य तथा पोषण संबंधी सुविधाओं का अभाव देखा जाता है।
  • जनजातीय समुदायों का एक बहुत बड़ा वर्ग निरक्षर है जिसके चलते सरकार की योजनाओं इत्यादि की जानकारी इन तक नहीं पहुँच पाती है  जो इस समुदाय के सामाजिक रूप से पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण है।

जनजाति समुदाय से संबंधित मुद्दे:

  • ‘इनर लाइन परमिट’ (ILP) का मुद्दा छठी अनुसूची में शामिल पूर्वोत्तर भारत के जनजाति बहुल राज्य असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा में एक ज्वलंत समस्या बनकर उभरा।
    • कोई भी भारतीय नागरिक इन राज्यों में बिना परमिट के प्रवेश नहीं कर सकता है जब तक कि वह उस राज्य से संबंधित नहीं हो और न ही वह ILP में निर्दिष्ट अवधि से अधिक रह सकता है। ILP जनजातीय समुदायों के हितों की सुरक्षा से संबंधित है।  
  • मणिपुर राज्य विधानसभा द्वारा विधेयक पारित गया जो राज्य में बाहरी लोगों को ज़मीन खरीदने या बसने, या स्वदेशी लोगों को अधिक अधिकार देने से संबंधित था।
    • इस विधेयक के विरोध में मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करने वाली कुकी  और नागाओं जनजाति समुदाय द्वारा हिंसक विरोध प्रदर्शन किया गया। 
  • त्रिपुरा में ‘सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम’ (Armed Forces Special Powers Act- AFSPA) को हटाना के फैसले के चलते पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी इसे हटाने को लेकर विवाद बना हुआ है।
  • नक्सलवाद की समस्या झारखंड, ओडिशा एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जनजातीय समुदाय के विकास में एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
  • ‘ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन’ (All Bodo Students Union- ABSU) द्वारा असम से अलग जनजाति बहुल बोडोलैंड की माँग।

जनजाति समुदाय के संरक्षण हेतु संवैधानिक प्रावधान:

  • भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के संरक्षण के लिये अनुच्छेद 338 तथा (338-क) में प्रावधान किया गया है-
    • संबंधित अनुच्छेदों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के संरक्षण के लिये आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। 
    • आयोग का कार्य अनुसूचित जाति एवं जनजातियों से संबंधित विषयों का अन्वेषण करना, उन पर निगरानी रखना तथा उनके रक्षोपायों का मूल्यांकन करना है। 
    • अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेना, उस पर सलाह देना तथा प्रगति का मूल्यांकन करना इत्यादि।   
  • संवैधानिक की अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान किया गया है वही अनुसूची 6 में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उपबंध किया गया है।
  • अनुच्छेद 17 समाज भी इस समुदाय के हितों को अस्पृश्यता की भावना से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • नीति निदेशक तत्त्वों का अनुच्छेद 46 राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे।

प्रमुख योजनाएँ:

  • एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना के माध्यम से दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदाय के विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान की जा रही है।
  • ओडिशा राज्य सरकार शीघ्र ही आदिवासी समुदाय की विशेष भाषा के संरक्षण के किये शब्दकोश (डिक्शनरी) जारी की जाएगी जिसका प्रयोग आदिवासी बाहुल इलाकों में प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्रदान करने में किया जा सकेगा। 

अनुसूची 6 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये वेंकटचलिया आयोग की सिफारिशें 

  • अल्पसंख्यकों के लिये सुरक्षा उपाय करें तथा केंद्रीय धन का प्रयोग राज्य सरकारों के माध्यम से फंडिंग करने के बजाय योजना के व्यय पर किया जाए। 
  • ज़िला परिषदों को विभिन्न सरकारी विभागों से केंद्र पोषित परियोजनाओं को लागू करने की अनुमति दें।
  • भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा ऑडिट के माध्यम से ग्राम सभाओं को पुनर्जीवित करना।
  • राष्ट्रीय आव्रजन परिषद की स्थापना जो कार्य परमिट, राष्ट्रीय प्रवासन कानून और नागरिकता अधिनियम से संबंधित मामलों पर रिपोर्ट करे। 

अनुसूची 6 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये रामचंद्रन समिति की सिफारिशें:

  • ज़िला परिषद की शक्तियों की न्यूनतम सीमा को समाप्त करने की आवश्यकता है।
  • योजनाओं के कार्यान्वयन और भागीदारी में सभी हितधारकों के साथ महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना आवश्यक है।
  • राज्यों एवं ज़िला परिषदों के बीच कार्यात्मक जिम्मेदारियों में टकराव की स्थिति को खत्म करना।
  • गाँव और बस्ती के स्तर पर विकेंद्रीकृत भागीदारी योजना बनाने के लिये लगभग 10-20 सदस्यों की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई ग्राम विकास समिति की स्थापना करने की आवश्यकता है।
  • क्षेत्रीय परिषदों को वित्त पोषित करने के लिये राज्य वित्त आयोग को गठित करने की आवश्यकता।
  • राज्यपाल द्वारा समय-समय पर राज्य सरकार और ज़िला परिषद की एक उच्च स्तरीय समीक्षा समिति का नेतृत्व करना चाहिये।
  • निरंतर निगरानी, लेखा परीक्षा और सुधार के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये एक प्रणाली की आवश्यकता व्यक्त की।
  • छठी अनुसूची क्षेत्र में विभिन्न निकायों के कामकाज की समीक्षा, निरीक्षण कर केंद्र सरकार को रिपोर्ट करें।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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