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नागरिकता (संशोधन) विधेयक और मिज़ोरम

  • 29 Jan 2019
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?


हाल ही में उत्तर-पूर्वी राज्य मिज़ोरम में नागरिकता (संशोधन) विधेयक के विरोध में व्यापक प्रदर्शन हुआ इसमें प्रदर्शनकारियों द्वारा सोशल मीडिया पर ‘नमस्ते चीन, अलविदा भारत’ के पोस्टर का व्यापक प्रदर्शन किया गया जो एक संप्रभु देश भारत के लिये बहुत बड़ी चिंता का विषय है।

  • पूर्वोत्तर राज्यों के बीच जहाँ नागरिकता (संशोधन) विधेयक को लेकर विरोध प्रदर्शन जोर-शोर से चल रहा है वहीं, मिज़ोरम राज्य में मिज़ो ज़िरलाई पावल (Mizo Zirlai Pawl-MZP) के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों को ऐसे नारे एवं पोस्टर के साथ दिखाया गया जिसका मकसद देश को यह बताना था कि वे भारत देश में सुरक्षित नहीं हैं।
  • युवा मिज़ो एसोसिएशन (Young Mizo Association-YMA) की केंद्रीय समिति के महासचिव ने सरकार पर आरोप लगाया कि भारत सरकार द्वारा उनकी बातों एवं अनुरोध पर ध्यान नही दिया जा रहा है।

नागरिकता (संशोधन) विधेयक क्या कहता है?

  • इस विधेयक के अनुसार, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक (गैर-मुस्लिम) धर्मों से संबंधित आप्रवासियों के लिये नागरिकता पात्रता नियमों में ढील देते हुए ‘नागरिकता अधिनियम 1955’ में संशोधन किया गया है।
  • इस विधेयक के अंतर्गत विभिन्न अन्य प्रावधानों के साथ-साथ दिसंबर 2014 तक आए सभी आप्रवासियों को नागरिकता प्रदान करने की बात कही गई है।
  • पूर्वोत्तर के राजनीतिक दलों एवं गैर-राजनीतिक समूहों द्वारा इस क्षेत्र की जनसांख्यिकी पर पड़ने वाले संभावित नकारात्मक प्रभाव के आधार पर इस विधेयक का विरोध करते हुए इसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाया सवाल उठाया गया क्योकिं इनके अनुसार यह नागरिकता शंशोधन धर्म के आधार पर किया जा रहा है।
  • प्रदर्शनकारियों ने असम, मेघालय और त्रिपुरा में बांग्लादेश से आए आप्रवासी हिंदुओं के बारे में भी चिंता व्यक्त की है क्योंकि 1971 में आए इन आप्रवासी हिंदुओं को स्वीकृति देने के लिये असम समझौते के तहत नागरिकता प्राप्त करने के मानदंडों में ढील दी गई थी। इसके आधार पर ही अब नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर को अपडेट किया जा रहा है, जो धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है।

मिज़ोरम की स्थिति अलग कैसे है?

  • मिज़ोरम में बांग्लादेशियों एवं हिंदू आप्रवासियों की समस्या न होकर वहाँ पाई जाने वाली एक आदिवासी जनजाति ‘चकमा’ और बड़े पैमाने पर पाए जाने वाले बौद्ध समूह से संबंधित है।
  • चकमा जनजाति पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों और बांग्लादेश के चटगाँव पहाड़ी इलाकों में पाई जाती है, जिसके साथ मिज़ोरम एक अंतर्राष्ट्रीय सीमा साझा करता है।
  • मिज़ोरम में जहाँ ईसाईयों की 11 लाख आबादी (2011) का 87% हैं, वहीं चकमा आदिवासी लगभग 1 लाख हैं।
  • मिज़ोरम में कुछ वर्गों द्वारा बांग्लादेश से अवैध प्रवास के लिये चाकमा जनजाति को दोषी ठहराया जाता है, जबकि यह समुदाय इस बात से इनकार करता है।
  • वर्तमान में राज्य में जातीय हिंसा एवं आगजनी के मामले सामने आ रहे हैं, मतदाताओं की सूची से चकमा आदिवासियों के नाम हटाने एवं चकमा छात्रों के स्कूल कॉलेज में प्रवेश रोकने का मामला सामने आया है।
  • एक पुस्तक ‘बीइंग मिज़ो’ में चकमा जनजाति के बारे में यह बात सामने आई है कि मिज़ोरमवासी चकमा को गैर-मिज़ो मानते हैं तथा उनके द्वारा इन्हें अवैध आप्रवासी मानते हुए कभी भी अपने समुदाय में शामिल करने का प्रयास नहीं किया गया है और न ही चकमा मिज़ो-वासियों में शामिल होना चाहते हैं।

डेटा बनाम डेटा

  • शीर्ष छात्रों के निकाय ‘मिज़ो ज़िरलाई पावल’ और YMA, जो वर्तमान में इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं ने अपनी जनसंख्या आँकड़ों पर ज़ोर देते हुए अपने अस्तित्व को ज़ोर-शोर से दर्शाया है। वहीं दूसरी तरफ, एक नेता द्वारा इस जनजाति के जनसंख्या आँकड़ों को अवैध बताते हुए आँकड़े प्रस्तुत किये गए जिसके अनुसार, 1901 में मिज़ोरम में सिर्फ 198 चकमा जनजाति के लोग थे जो 1991 में बढ़कर 80,000 हो गए विकास दर में असामान्य वृद्धि दर बांग्लादेश से अवैध आप्रवास को दर्शाता है।
  • चकमा कार्यकर्त्ताओं ने 2015 में मिज़ोरम सरकार द्वारा NHRC (National Human Rights Commission) को सौंपी गई रिपोर्ट का हवाला दिया। इसमें तत्कालीन राज्य उप सचिव (गृह) ने रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि 1901 से 1941 के बीच की जनगणना के आँकड़ों की सत्यता का पता नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि जनगणना निदेशालय, मिज़ोरम के पास उपलब्ध रिपोर्ट में 1951 में चकमा की आबादी 15,297 और 2011 में 96,972 है।

अप्रत्याशित वृद्धि दर के परिणाम


अखिल भारतीय चकमा सोशल फोरम के महासचिव ने बताया है कि 1960 के दशक में संरचनात्मक भेदभाव होने के कारण चकमा जनजाति मिज़ोरम में शामिल न होकर ‘चटगाँव हिल ट्रैक्ट्स’ से चली गई, जिन्हें अरुणाचल प्रदेश में बसाया गया था।

महासचिव ने एक समाचार रिपोर्ट ‘मिज़ो दैनिक वानग्लानी’ 2017 का हवाला दिया, जिसमें तत्कालीन DGP द्वारा कहा गया था कि पिछले पाँच वर्षों में बांग्लादेश से चकमा जनजाति का कोई भी अवैध प्रवास नहीं हुआ है।

विधेयक और चकमा जनजाति


MZP के नेतृत्वकर्त्ता ने बताया कि वे उन चकमा जनजातियों का विरोध नही कर रहे हैं जो दशकों से मिज़ोरम में रह रहे हैं बल्कि उनका विरोध कर रहे हैं जो अवैध रूप से बांग्लादेश से आए हैं। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो वे सभी कानूनी रूप से भारत के नागरिक हो जाएंगे और जिस तरह से चकमा जनजाति की आबादी बढ़ रही है उससे कुछ दिनों में मिज़ोरम के लोग अपनी ही भूमि पर अल्पसंख्यक हो जाएंगे। इसके अलावा यह विधयेक संविधान का भी उल्लंघन करता है।


स्रोत – इंडियन एक्सप्रेस

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