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कृषि

बीजों के एकरूप प्रमाणन की आवश्यकता

  • 12 Aug 2019
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

आगामी संसद के शीतकालीन सत्र में यह उम्मीद की जा रही है कि बीज अधिनियम, 1966 को प्रतिस्थापित कर बीजों के एकरूप प्रमाणन (Uniform Certification) को अनिवार्य किया जाएगा।

प्रमुख बिंदु :

  • गौरतलब है कि भारत में बिकने वाले सभी बीजों में से आधे से अधिक बीज किसी भी उचित परीक्षण संस्था द्वारा प्रमाणित नहीं किये गए हैं और अक्सर वे खराब गुणवत्ता के होते हैं।
  • कृषि मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, यदि ऐसा होता है तो भारत में कृषि उत्पादकता में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

क्या इस परिवर्तन की आवश्यकता है?

अधिनियम को लागू हुए लगभग 53 वर्ष से भी अधिक समय बीत चुका है और इस अवधि में कृषि तकनीक तथा प्रौद्योगिकी में भी काफी परिवर्तन आया है, इसी के साथ किसानों की अपेक्षाओं में भी काफी बदलाव देखने को मिले हैं। इन्हीं कारणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि आधी सदी पहले लागू किये गए कानूनों को तत्काल संशोधित किये जाने की आवश्यकता है।

क्या परिवर्तन किया जाएगा?

  • इस परिवर्तन का मुख्य उद्देश्य गुणवत्ता विनियमन की प्रक्रिया में एकरूपता सुनिश्चित करना है। वर्ष 1966 का बीज अधिनियम अग्रलिखित वाक्य से शुरू होता है- “बिक्री के उद्देश्य से कुछ बीजों की गुणवत्ता को विनियमित करने के लिये एक अधिनियम” - और इस नए विधेयक का उद्देश्य इस वाक्य से “कुछ” शब्द को हटाकर इसके स्थान पर देश में बेचे जाने वाले तथा आयात व निर्यात किये जाने वाले सभी बीजों को शामिल करना है।
  • आँकड़ों के अनुसार, देश में आवश्यक बीजों में से 30 प्रतिशत बीज किसानों द्वारा खुद ही अपनी फसलों से बचाए जाते हैं, परंतु बाकी बचे हुए बीजों, जो संभवतः बाज़ार से खरीदे जाते हैं, में से मात्र 45 प्रतिशत बीज ही ऐसे हैं जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research) द्वारा प्रमाणित होते हैं।
  • अन्य 55 प्रतिशत बीज, जो कि प्राइवेट कंपनियों द्वारा बेचे जाते हैं, अधिकतर प्रमाणित नहीं होते हैं। सरकार का उद्देश्य इसी श्रेणी को समाप्त करना है और सभी बीजों की प्रमाणिकता को अनिवार्य बनाना है।
  • इस नए विधेयक में कानून का पालन न करने पर लगाए जाने वाले जुर्माने की राशि को भी बढ़ा दिया गया है। पूर्व में यह राशि 500 रुपए (न्यूनतम) से 5000 रुपए (अधिकतम) तक थी, परंतु अब इसे बढ़ाकर अधिकतम 5 लाख रुपए करने पर विचार किया जा रहा है।
  • इसके अलावा केंद्र सरकार पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बीजों को बारकोड करने के लिये एक सॉफ्टवेयर की शुरुआत करने पर भी विचार कर रही है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद

(Indian Council of Agricultural Research)

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भारत सरकार के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है जिसकी स्थापना 16 जुलाई, 1929 को की गई थी।
  • स्थापना के समय इसका नाम इंपीरियल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च था जिसे पूर्व में परिवर्तित कर दिया गया।
  • कृषि अनुसंधान परिषद का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
  • देश भर में फैले 101 भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थानों और 71 कृषि विश्वविद्यालयों सहित यह विश्व में सर्वाधिक विस्तृत राष्ट्रीय कृषि पद्धति है।

स्रोत: द हिंदू

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