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कार्बन वाॅच एप: चंडीगढ़

  • 24 Feb 2021
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में चंडीगढ़ ने ‘कार्बन वाॅच’ नाम से एक मोबाइल एप्लीकेशन लॉन्च किया है, इसका उद्देश्य एक व्यक्ति के कार्बन फुटप्रिंट का आकलन करना है। इसके साथ ही चंडीगढ़ इस तरह की पहल शुरू करने वाला पहला केंद्रशासित प्रदेश/राज्य बन गया है। 

  • कार्बन फुटप्रिंट का आशय किसी विशेष मानवीय गतिविधि द्वारा वातावरण में जारी ग्रीनहाउस गैसों, विशेष रूप से कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा से है।

प्रमुख बिंदु

एप्लीकेशन के बारे में

  • यह एप्लीकेशन मुख्य तौर पर व्यक्तिगत कार्यों पर ध्यान केंद्रित करेगा और इसमें कुल चार श्रेणियों यथा- जल, ऊर्जा, अपशिष्ट उत्पादन और परिवहन से संबंधित विवरण के आधार पर कार्बन फुटप्रिंट की गणना की जाएगी।
  • यह उत्सर्जन के राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय औसत स्तर एवं व्यक्तिगत उत्सर्जन से संबंधित सूचना प्रदान करेगा। 
  • यह आम लोगों को उनके कार्बन फुटप्रिंट से संबंधित सूचनाएँ प्रदान करने के साथ-साथ कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के तरीकों पर भी सुझाव देगा।
  • यह लोगों को उनकी विशिष्ट जीवनशैली के कारण होने वाले उत्सर्जन, प्रभाव और उससे निपटने के लिये संभावित उपायों के बारे में भी जागरूक करेगा।

कार्बन फुटप्रिंट

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कार्बन फुटप्रिंट जीवाश्म ईंधन के कारण उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा पर आम लोगों की गतिविधियों के प्रभाव को मापने का एक उपाय है, इसे CO2 उत्सर्जन के भार के रूप में व्यक्त किया जाता है।
  • आमतौर पर इसे प्रतिवर्ष उत्सर्जित CO2 (टन में) के रूप में मापा जाता है। यह एक ऐसी मात्रा है जिसके लिये CO2 समतुल्य गैसें (मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें) पूरक के रूप में कार्य कर सकती हैं।
  • इस अवधारणा को किसी एक व्यक्ति, एक परिवार, एक घटना, एक संगठन, यहाँ तक ​​कि एक संपूर्ण राष्ट्र पर लागू किया जा सकता है।

कार्बन फुटप्रिंट बनाम इकोलॉजिकल फुटप्रिंट

  • कार्बन फुटप्रिंट, इकोलॉजिकल फुटप्रिंट से अलग होता है। जहाँ एक ओर कार्बन फुटप्रिंट उन गैसों के उत्सर्जन को मापता है, जो ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती हैं, वहीं इकोलॉजिकल फुटप्रिंट ‘बायो-प्रोडक्टिव स्पेस’ के उपयोग को मापने पर केंद्रित है।

उच्च कार्बन फुटप्रिंट का प्रभाव

  • जलवायु परिवर्तन को उच्च कार्बन फुटप्रिंट का महत्त्वपूर्ण प्रभाव माना जा सकता है। ग्रीनहाउस गैसें, चाहे वे प्राकृतिक हों अथवा मानव निर्मित, पृथ्वी को और अधिक गर्म करने में योगदान देती हैं।
    • वर्ष 1990 से वर्ष 2005 तक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 31 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, जबकि वर्ष 2008 से उत्सर्जन ने विकिरण वार्मिंग में 35 प्रतिशत की वृद्धि की है। 
    • विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के दृष्टिकोण से 2011-2020 अब तक का सबसे गर्म दशक था।
  • संसाधनों का ह्रास: वनों की कटाई से लेकर एयर कंडीशनिंग के उपयोग तक अत्यधिक कार्बन फुटप्रिंट व्यापक पैमाने पर संसाधनों के ह्रास में योगदान देते हैं। 

कार्बन फुटप्रिंट कम करने के उपाय

  • 4A [उपयोग के लिये मना करना (Refuse) कम करना (Reduce), पुन: उपयोग (Reuse) तथा पुनर्चक्रण (Recycle)] की अवधारणा को अपनाना इस दिशा में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है।
  • सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना, अधिक कुशलता से  वाहन चलाना अथवा यह सुनिश्चित करना कि वर्तमान वाहन ठीक स्थिति में रहें।
  • व्यक्ति और कंपनियाँ द्वारा कार्बन क्रेडिट खरीदकर अपने कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कुछ कमी की जा सकती है, उनके द्वारा खरीदे गए कार्बन क्रेडिट का उपयोग वृक्षारोपण या नवीकरणीय ऊर्जा से संबंधित परियोजनाओं में निवेश के लिये किया जा सकता है।
  • पेरिस समझौते जैसे जलवायु परिवर्तन कन्वेंशनों के कार्यान्वयन और जलवायु परिवर्तन से संबंधित भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही पहलों में और तेज़ी लाने की आवश्यकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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