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प्रीलिम्स फैक्ट्स

  • 28 Feb, 2020
  • 12 min read
प्रारंभिक परीक्षा

प्रीलिम्स फैक्ट्स: 28 फरवरी, 2020

यार्ड 45006 वज्र

Yard 45006 VAJRA

27 फरवरी, 2020 को चेन्नई में तटीय सुरक्षा बढ़ाने हेतु 6वें तटरक्षक अपतटीय गश्ती पोत (Offshore Patrol Vessel- OPV-6) ‘यार्ड 45006 वज्र’ (Yard 45006 VAJRA) को लाॅन्च किया गया।

Yard-45006-VAJRA

उद्देश्य:

  • इस पोत द्वारा लगभग 7500 किमी. विशाल भारतीय तटरेखा और अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के लगभग 20 लाख वर्ग किमी. के विशाल क्षेत्र को सुरक्षित करने की कोशिश की जाएगी।

मुख्य बिंदु:

  • 6वें अपतटीय गश्ती पोत ‘यार्ड 45006 वज्र’ (Yard 45006 VAJRA) को पहली बार समुद्र में उतारा गया। यह पोत केंद्र सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत लार्सन एंड टुब्रो शिप बिल्डिंग द्वारा डिज़ाइन एवं विकसित की जा रही सात अपतटीय गश्ती पोत प्रोजेक्ट की शृंखला में 6वाँ है।
  • विशेष रूप से अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone-EEZ) में आतंकवाद विरोधी एवं तस्करी विरोधी अभियानों के साथ-साथ इसका इस्तेमाल दिन व रात के समय गश्त के लिये किया जाएगा।

अनन्य आर्थिक क्षेत्र ( Exclusive Economic Zone-EEZ): EEZ बेसलाइन से 200 नॉटिकल मील की दूरी तक फैला होता है। इसमें तटीय देशों को सभी प्राकृतिक संसाधनों की खोज, दोहन, संरक्षण और प्रबंधन का संप्रभु अधिकार प्राप्त होता है।

  • यार्ड 45006 वज्र वैश्विक व्यापार हेतु प्रत्येक वर्ष भारतीय जल क्षेत्र से पारगमन करने वाले लगभग एक लाख व्यापारी जहाज़ों के लिये सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करेगा।

स्थानीय स्व शासन में अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधियों की क्षमता निर्माण का कार्यक्रम

Programme for Capacity Building of Scheduled Tribe Representatives in Local Self Governments

भारत सरकार के जनजाति मामलों के मंत्री ने 27 फरवरी, 2020 को भुवनेश्वर (ओडिशा) में ‘स्थानीय स्व शासन में अनुसूचित जनजाति प्रतिनिधियों की क्षमता निर्माण हेतु कार्यक्रम’ (Programme for Capacity Building of Scheduled Tribe Representatives in Local Self Governments) का शुभारंभ किया।

उद्देश्य:

  • इस क्षमता निर्माण पहल का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं में जनजातीय प्रतिनिधियों के निर्णय लेने की क्षमताओं में सुधार करके उनको सशक्त बनाना है।

मुख्य बिंदु:

  • यह क्षमता निर्माण कार्यक्रम संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों पर ध्यान केंद्रित करेगा जो जनजातीय लोगों के कल्याण एवं उनके अधिकारों के संरक्षण को बढ़ावा देता है।
  • यह कार्यक्रम सरकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन तथा निगरानी के कार्य में पंचायती राज संस्थाओं के जनजाति प्रतिनिधियों की अधिक-से-अधिक भागीदारी सुनिश्चित करेगा।
  • इस क्षमता निर्माण कार्यक्रम के मॉड्यूल को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (United Nations Development Programme) के संयोजन में विकसित किया गया है।

1000 स्प्रिंग इनिशिएटिव्स

1000 Spring Initiatives

भारत सरकार के जनजाति मामलों के मंत्री ने 27 फरवरी, 2020 को भुवनेश्वर (ओडिशा) में ‘स्थानीय स्व- शासन में अनुसूचित जनजाति प्रतिनिधियों की क्षमता निर्माण हेतु कार्यक्रम’ के अवसर पर ‘1000 स्प्रिंग इनिशिएटिव्स’ (1000 Spring Initiatives) और जीआईएस-आधारित स्प्रिंग एटलस से संबंधित सूचनाओं के लिये एक ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च किया गया।

उद्देश्य:

  • इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण भारत के कठिन एवं दुर्गम क्षेत्रों में रह रहे जनजातीय लोगों के लिये सुरक्षित एवं पर्याप्त जलापूर्ति में सुधार करना है।

स्प्रिंग्स (Springs):

  • स्प्रिंग्स मूल रूप से भूजल निर्वहन के प्राकृतिक स्रोत हैं जिनका उपयोग विश्व में पर्वतीय क्षेत्रों के साथ-साथ भारत में भी बड़े पैमाने पर किया जाता रहा है।
  • स्प्रिंग्स वह स्रोत बिंदु है जहाँ किसी जलभृत (Aquifer) से जल निकलकर पृथ्वी की सतह पर बहता है। यह जलमंडल का एक घटक है।
  • हालाँकि 75% से अधिक जनजातीय आबादी वाले मध्य एवं पूर्वी भारत में स्प्रिंग्स का कम उपयोग किया जाता है।

मुख्य बिंदु:

  • इस पहल में पेयजल के लिये पाइपों से जलापूर्ति हेतु बुनियादी ढाँचे का निर्माण करना शामिल है। जिससे सिंचाई और बैकयार्ड पोषण उद्यान (Backyard Nutrition Gardens) के लिये जल की व्यवस्था हो सके, परिणामतः जनजातीय लोगों के लिये स्थायी आजीविका के अवसर उत्पन्न किये जा सकेंगे।
  • यह पहल बारहमासी स्प्रिंग्स के जल का उपयोग करने में सहायता करेगी जिसका उपयोग जनजातीय क्षेत्रों में पानी की कमी को दूर करने के लिये किया जाएगा।

जीआईएस आधारित स्प्रिंग एटलस पर ऑनलाइन पोर्टल

(Online portal on GIS-based Spring Atlas):

  • इस ऑनलाइन पोर्टल को स्प्रिंग्स पर आधारित डेटा तक पहुँच में सुधार करने हेतु लॉन्च किया गया है।
  • वर्तमान में स्प्रिंग एटलस पर 170 से अधिक स्प्रिंग्स का डेटा उपलब्ध है।

स्यनेचोकॉकस एसपी. पीसीसी 7002

Synechococcus sp. PCC 7002

जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव प्रौद्योगिकी के लिये अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (International Centre for Genetic Engineering and Biotechnology- ICGEB) के शोधकर्त्ताओं ने एक समुद्री सूक्ष्मजीव की विकास दर एवं शुगर की मात्रा को बेहतर करने के लिये एक विधि विकसित की है। जिसे स्यनेचोकॉकस एसपी. पीसीसी 7002 (Synechococcus sp. PCC 7002) कहा जाता है।

Synechococcus

मुख्य बिंदु:

  • बायोफ्यूल उत्पादन सहित अधिकांश जैव-प्रौद्योगिकी प्रक्रियाएँ कम लागत, शुगर की सतत् आपूर्ति एवं नाइट्रोजन स्रोत की उपलब्धता पर निर्भर हैं। शुगर सामान्यतः पेड़-पौधों से मिलती है।
    • पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड को शर्करा, प्रोटीन और लिपिड जैसे जैविक घटकों में परिवर्तित करने के लिये प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करते हैं।
    • हालाँकि कुछ बैक्टीरिया जैसे कि सायनोबैक्टीरिया (जिसे नीले-हरे शैवाल के रूप में भी जाना जाता है) भी प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्थिरीकरण करके शुगर का उत्पादन कर सकते हैं।
  • सायनोबैक्टीरिया से शुगर की प्राप्ति भूमि आधारित फसलों की तुलना में बहुत अधिक हो सकती है। इसके अलावा साइनोबैक्टीरियल बायोमास प्रोटीन के रूप में एक नाइट्रोजन स्रोत प्रदान करता है।
  • सायनोबैक्टीरिया ताज़े एवं खारे जल दोनों में पाए जाते हैं। समुद्री साइनोबैक्टीरिया का उपयोग करना बेहतर हो सकता है क्योंकि ताज़े जल के स्रोतों में तेज़ी से कमी हो रही है।
    • हालाँकि समुद्री सायनोबैक्टीरिया आधारित शुगर उत्पादन की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार हेतु उनकी विकास दर एवं शुगर प्राप्ति में उल्लेखनीय सुधार करने की आवश्यकता है।
  • शोधकर्त्ताओं ने एक समुद्री सायनोबैक्टीरियम को सफलतापूर्वक स्यनेचोकॉकस एसपी. पीसीसी 7002 (Synechococcus sp. PCC 7002) विधि से निर्मित किया है। इनमें उच्च विकास दर तथा शुगर (ग्लाइकोजन-Glycogen) प्राप्ति की संभावना अधिक होती है। हवा की उपस्थिति में इनकी विकास दर दोगुनी हो गई जबकि इनकी कोशिकाओं में ग्लाइकोजन की मात्रा में लगभग 50% की वृद्धि हुई।
    • ग्लाइकोजन ग्लूकोज़ की बहुशाखा वाला एक पॉलीसेकेराइड है जो जीव-जंतुओं, कवक एवं बैक्टीरिया में ऊर्जा भंडारण के रूप में कार्य करता है। पॉलीसेकेराइड संरचना जीवों के शरीर में ग्लूकोज़ के मुख्य भंडारण का प्रतिनिधित्व करती है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव प्रौद्योगिकी के लिये अंतर्राष्ट्रीय केंद्र

(International Centre for Genetic Engineering and Biotechnology- ICGEB):

  • ICGEB एक विशिष्ट अंतर सरकारी संगठन है जिसे शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (United Nations Industrial Development Organization- UNIDO) की विशेष परियोजना के रूप में स्थापित किया गया था। किंतु वर्ष 1994 के बाद यह पूरी तरह से स्वायत्त हो गया।
  • इसकी इटली, भारत और दक्षिण अफ्रीका में 46 अत्याधुनिक प्रयोगशालाएँ हैं और 65 से अधिक सदस्य देशों के साथ एक परस्पर संवादात्मक नेटवर्क बनाता है।
  • यह विश्व भर में सतत् वैश्विक विकास की सफलता में योगदान करने हेतु उद्योगों के लिये जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के तहत कार्य करता है।

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